Ek Shraapit Ped

एक बड़ी सी कंपनी की तरफ से जॉब ऑफर मिलने के बाद संजय अपना गाँव छोड़कर मुंबई जैसे बड़े शहर में बस जाता है। कुछ ही सालों में सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुए संजय एक बड़ा फ्लैट अपने नाम कर लेता है और उसी फ्लैट में संजय अकेला रहता था। उसकी ज़िंदगी में सब सही चल रहा था, लेकिन एक शाम उसे अपने पुराने दोस्त राघव की शादी में जाना था, जो गाँव में ही रहता था और शादी भी गाँव में ही होने जा रही थी।
संजय ने आधे दिन की छुट्टी लेकर अपने फ्लैट पहुँचा और शादी में जाने के लिए तैयार होने लगा। तैयार होने के बाद संजय अपनी गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठा और गाँव के लिए रवाना हो गया। आज बड़े सालों बाद संजय अपने गाँव जा रहा था। कई घंटों के सफर के बाद संजय अपने गाँव पहुँचने वाला था। गाँव के अंदर से होते हुए संजय की गाड़ी एक सुनसान रास्ते से होकर गुज़र रही थी, जहाँ कुछ ही दूरी पर एक पुराना सूखा पेड़ था। वो पेड़ बाकी पेड़ों से अलग था, उसकी डालियाँ और जड़ें काफी अजीबोगरीब तरीके से फैली हुई थीं। शाम के वक़्त देखने पर वो पेड़ काफी डरावना लग रहा था, पर रात में यह उतना ही खौफनाक दिखता था।
गाड़ी के शीशे से संजय की नज़र जैसे ही उस पेड़ पर पड़ी, वो हल्का सा मुस्कुराते हुए अपने बचपन के दिन याद करने लगा कि कैसे बचपन में उसे यह कहकर डराया जाता था कि आधी रात के समय उस पेड़ के नीचे जाना मना है।
यही सब सोचते हुए संजय अपनी गाड़ी आगे की तरफ बढ़ाता है।
अपने गाँव पहुँचकर संजय की पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं। धीरे-धीरे संजय अपने सभी पुराने साथियों से मिलने लगा। राघव की शादी में संजय के परिवार वाले भी शामिल थे। अपने परिवार से मिलकर संजय को काफी अच्छा लग रहा था, साथ ही हर तरफ शादी का माहौल था।
कुछ ही देर बाद शादी सम्पन्न हो जाती है। शादी सम्पन्न होने के बाद सभी मेहमान जाने लगते हैं। संजय भी जाने की तैयारी कर रहा था कि तभी संजय की माँ ने उसे रोकते हुए कहा, "इतनी रात हो चुकी है, सुबह चले जाना।"
संजय ने जवाब में कहा, "नहीं माँ, कल बहुत काम है, मुझे जाना पड़ेगा।"
तभी संजय की माँ ने गंभीर होते हुए संजय से पूछा, "सुन, यहाँ गाँव आते समय क्या तू उसी सुनसान रास्ते से होकर आया था ना, जहाँ वो सूखा पेड़ है?"
संजय ने हाँ में जवाब दिया।
संजय की माँ ने थोड़ा समझाते हुए कहा, "देख, बहुत रात हो चुकी है। इस समय तू जाएगा तो तुझे उसी रास्ते से गुज़रना होगा।"
संजय ने सवाल करते हुए पूछा, "हाँ, तो इसमें कौन सी बड़ी बात है, माँ?"
संजय की माँ ने जवाब में कहा, "तू अनजान बनने का नाटक ना कर। क्यों नहीं समझता तू कि आज भी रात के वक़्त सभी उस रास्ते से जाने से डरते हैं, क्योंकि उस पेड़ में एक बहुत बुरी शक्ति रहती है, एक डायन रहती है जो रात के समय इंसान के खून के पीछे पड़ जाती है। इसलिए कल सुबह चले जाना, कल सुबह तुझे जाने से नहीं रोकूँगी।"
इस बात पर संजय ने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा, "उफ्फ माँ, फिर वही पुरानी बातें? गाँव वाले कुछ भी कहेंगे और आप आसानी से मान लोगी? मैं भी तो इसी गाँव में पला-बढ़ा हूँ और कई बार दोस्तों के साथ उसी रास्ते से गुज़रा हूँ, तब तो कुछ नहीं हुआ मुझे।"
संजय की माँ ने कहा, "तू दिन में दोस्तों के साथ जाया करता था। रात में तुझे किसी ने वहाँ जाने की इजाज़त नहीं दी थी। बस एक रात की बात है, बेटा, मान जा।"
संजय ने अपनी माँ को समझाते हुए कहा, "नहीं माँ, अगर आप वैसे ही यहाँ रुकने के लिए कह देती तो शायद मैं आपके लिए रुक जाता, पर अगर आप ऐसी बातों पर यकीन करके मुझे रोकना चाहती हैं तो मैं माफी चाहता हूँ, पर मैं नहीं रुक पाऊँगा।"
इतना सुनकर संजय की माँ अपने बेटे को चिंता भरी नज़र से देखने लगी। अपनी माँ के चेहरे पर उदासी देखते हुए संजय ने कहा, "आप चिंता ना करिए, शहर पहुँचते ही मैं आपको फोन कर दूँगा।"
इतना कहकर संजय अपनी गाड़ी में बैठकर निकलने लगा।
संजय भले ही गाँव में पला-बढ़ा था, पर उसकी सोच और उसका नज़रिया गाँव वालों से अलग था। वो इन सब सुनी-सुनाई बातों पर बिल्कुल भी यकीन नहीं करता था, पर वो इस बात से अनजान था कि अगले आने वाले पलों में उसके साथ कुछ ऐसा होगा जो उसके नज़रिये को पूरी तरह बदल के रख देगा।
कुछ ही देर बाद संजय अपनी गाड़ी उसी मोड़ पर ले आता है जहाँ थोड़ी दूरी पर वो पुराना सूखा पेड़ था, लेकिन गाड़ी अचानक उसी मोड़ पर अपने आप रुक जाती है। संजय दोबारा से गाड़ी को स्टार्ट करने लगता है, पर गाड़ी जैसे स्टार्ट होने का नाम ही नहीं ले रही थी। गाड़ी से बाहर निकलकर संजय सोच में पड़ गया, "आखिर इस गाड़ी को अचानक से हुआ क्या? इसे भी यहीं रुकना था।" इतना कहकर संजय की नज़र उसी पेड़ पर पड़ी। देखने पर वो पेड़ रात के अंधेरे और चाँद की हल्की रोशनी में काफी खौफनाक दिख रहा था, मानो जैसे वो पेड़ किसी भी ज़िंदा इंसान को निगल जाएगा। उसे देखकर संजय के दिल में एक अजीब सा डर जागने लगा था। अपनी नज़र उस पेड़ से हटाते हुए संजय दोबारा से अपनी गाड़ी की तरफ देखने लगा।
अपनी गाड़ी की तरफ देखने के बाद संजय को अचानक से पायल की छनक की आवाज़ सुनाई देने लगी। उस पायल की छनक ने जैसे संजय को चौंका दिया था। वो डरते हुए हर ओर देखने लगा, लेकिन जब संजय ने गौर किया तो उसे एहसास हुआ कि पायल की आवाज़ कहीं और से नहीं, बल्कि उसी पेड़ के नीचे खड़ी एक औरत से आ रही थी, जो चलते हुए धीरे-धीरे कदमों से संजय की तरफ बढ़ रही थी। संजय उसका चेहरा रात के अंधेरे में देख नहीं पा रहा था, पर न जाने क्यों उसकी चलने की आहट ने संजय को बेचैन कर दिया था। पर अगले पल खुद को थोड़ा शांत करते हुए संजय ने सोचा, "मैं इतना क्यों घबरा रहा हूँ? वो कोई आम औरत भी तो हो सकती है जो इस वक्त मुझसे मदद माँगने के लिए मेरी तरफ बढ़ रही हो।"
यह सोचते हुए संजय ने जब दोबारा उस पेड़ की ओर देखा, तो अब उसे कोई औरत अपनी तरफ बढ़ती हुई दिखाई नहीं दे रही थी। संजय चौंककर वहीं देखता रहा, पर अब उसे कोई भी नज़र नहीं आ रहा था। वो पायल की आवाज़ भी आनी बंद हो चुकी थी। पर तभी अचानक से एक तेज़ हवा का झोंका संजय को छूकर गुज़रा, जिस वजह से संजय पीछे की तरफ खिसका।
संजय ने डरते हुए कहा, "यह क्या था?" फिर बाद में कुछ सोचते हुए संजय ने खुद से कहा, "एक हवा का झोंका ही तो था, मैं इतना क्यों डर रहा हूँ? लगता है गाँव वालों की बातें मेरे दिमाग पर असर करने लगी हैं, इसलिए मुझे ऐसा महसूस हो रहा है।"
संजय ने गाड़ी में बैठकर उसे फिर से स्टार्ट करने की कोशिश की और इस बार कोशिश करने पर गाड़ी स्टार्ट हो गई। संजय ने राहत की साँस ली और अपने शहर के लिए निकलने लगा।
कुछ घंटे बाद संजय की गाड़ी शहर की तरफ बढ़ने लगी, पर पूरे सफर के दौरान संजय को गाड़ी के अंदर बार-बार ऐसा महसूस हो रहा था जैसे पिछली सीट पर कोई औरत बैठी है। उसे अब किसी की मौजूदगी का एहसास हो रहा था, पर संजय बार-बार अपने मन को समझाए जा रहा था कि यह बस उसके मन का डर है और कुछ नहीं।
अपने फ्लैट पहुँचने के बाद संजय आइने के सामने अपने कपड़े बदलने लगा। उसने जैसे ही अपने कपड़े उतारे, तो वो आइने की तरफ हैरत भरी नज़रों से खुद को देखने लगा। संजय के शरीर पर नाखूनों के निशान थे, जो एकदम ताज़े थे।
संजय को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह उसके साथ क्या हो रहा है।
संजय ने एक पल के लिए सोचा, "कहीं माँ की बात सच तो नहीं?" उसके मन में अचानक से डर और आशंका की भावना पैदा हो गई।
तभी संजय का फोन बज उठा। फोन की स्क्रीन पर संजय की माँ का नंबर फ्लैश कर रहा था। संजय ने खुद को थोड़ा शांत करते हुए फोन रिसीव किया और अपनी माँ से पूछा, "माँ, आप अभी तक सोई नहीं?"
संजय की माँ ने कहा, "तूने कहा था कि तू शहर पहुँचकर मुझे फोन करेगा, पर तेरा फोन आया ही नहीं। इसलिए मैंने तुझे फोन कर लिया, यह पूछने के लिए कि तू सही-सलामत पहुँच चुका है ना?"
संजय ने खुद को नॉर्मल करते हुए कहा, "हाँ माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ, आप फ़िक्र मत करिए।"
इतना कहकर संजय ने अपना फोन रख दिया और अपने कमरे की लाइट ऑफ करके सोने की कोशिश करने लगा।
रात के तीन बजे, संजय गहरी नींद में सोया हुआ था, पर तभी कमरे में संजय को ठंड का एहसास हुआ। उसकी छाती पर एक भारीपन सा महसूस होने लगा और अचानक पायल की छनकने की आवाज़ से संजय की नींद टूट गई। पूरे कमरे में पायल की आवाज़ गूँजने लगी। संजय ने जैसे ही डरते हुए अपनी आँखें खोलीं तो देखा कि एक भयानक चेहरे वाली औरत उसकी छाती पर बैठकर किसी जानवर का कच्चा माँस खा रही थी। अपने लंबे तीखे दाँतों से जानवर के कच्चे माँस को चबाए जा रही थी, जिसकी खून की कुछ बूँदें संजय के कपड़ों पर बह रही थीं।
यह डरावना मंज़र देखकर संजय की आँखें खौफ से बड़ी हो गईं। वो चीखना चाह रहा था पर उसके मुँह से आवाज़ तक नहीं निकल पा रही थी। संजय न तो उठ पा रहा था, न ही चीख पा रहा था, जैसे उसके पूरे शरीर पर किसी और ने कब्ज़ा कर लिया हो। कई देर तक संजय की आँखों के सामने यह सब चलता रहा।
अगली सुबह संजय घबराते हुए नींद से उठा और चारों ओर देखने लगा। उसका पूरा बदन खौफ से पसीने-पसीने हो गया था। संजय को यकीन नहीं हो रहा था कि कल रात उसने जो कुछ भी देखा, क्या वो सच था या एक डरावना सपना?
यह सब सोचते हुए संजय ने जब अपने कपड़ों की तरफ देखा, तो उनमें कुछ खून के दाग लगे हुए थे, जो साफ बता रहे थे कि यह कोई डरावना सपना नहीं, बल्कि सच था। संजय को अब अपनी माँ की कही हुई बात याद आ रही थी।
संजय को एकदम से अपने कंधे पर भारीपन सा महसूस होने लगा। वो बड़ी मुश्किल से बिस्तर से उठकर आइने के सामने आकर खड़ा हो गया, पर जैसे ही संजय आइने में खुद को देखता है, तो उसके मुँह से चीख निकल जाती है, क्योंकि आइने में वही डरावनी औरत संजय के कंधे पर बैठी हुई थी। वो औरत अपनी सफेद आँखों से संजय को घूर रही थी। संजय का दिल तेज़ी से धड़क रहा था और वो अपने आप को आइने से दूर नहीं कर पा रहा था।
आइने में उस औरत की उपस्थिति संजय के लिए एक भयानक सच्चाई थी, जिसे वो अब नकार नहीं सकता था। संजय की चीख उसके कमरे में गूँज रही थी।
तीन दिन बाद, विशाखा नाम की एक लड़की दरवाज़े की घंटी बजाते हुए बाहर इंतज़ार कर रही थी। वो बेचैन होकर बार-बार डोरबेल बजाए जा रही थी। तभी एक सुरक्षा गार्ड वहाँ आकर डुप्लीकेट चाबी से उस दरवाज़े को खोल देता है।
दरवाज़ा खुलते ही विशाखा और सुरक्षा गार्ड अंदर की तरफ जाते हैं। विशाखा संजय का नाम पुकारते हुए संजय के कमरे में पहुँचती है। कमरे में पहुँचने पर विशाखा ने देखा कि संजय घबराया हुआ, सहमा हुआ कोने में दीवार से लगकर ज़मीन पर बैठा हुआ है।
सुरक्षा गार्ड भी वहाँ आकर संजय की यह हालत देखता है।
विशाखा ने देखा कि संजय की आँखें डर से भरी हुई थीं और उसका चेहरा पीला पड़ गया था। संजय को सहारा देने के लिए विशाखा जैसे ही उसके पास जाने लगी, संजय घबराते हुए अपनी काँपती आवाज़ में बोला, "दूर हटो मुझसे! क्यों मेरी जान के पीछे पड़ी हो?"
विशाखा ने हैरान होकर कहा, "शांत हो जाओ संजय, यह मैं हूँ, विशाखा!" पर संजय अब न कुछ भी सुनने की हालत में था और न बताने की हालत में था। वो बस बार-बार विशाखा को दूर हटने के लिए कह रहा था। वो इतना घबराया हुआ था कि विशाखा को पहचान ही नहीं पा रहा था। विशाखा उसकी आँखों में डर साफ देख सकती थी, इसलिए वो संजय को अपने सीने से लगाकर उसे शांत कराने लगी।
कुछ ही पल में संजय थोड़ा शांत हुआ और विशाखा से कहने लगा, "वो मुझे नहीं छोड़ेगी, वो मुझे अपने साथ ले जाएगी।"
उसकी यह बातें सुनकर सुरक्षा गार्ड को आभास होता है कि यह ज़रूर किसी बुरी आत्मा का चक्कर है। कुछ ही देर में सुरक्षा गार्ड वहाँ से जाने लगा, पर जाने से पहले वो विशाखा से कहता है, "मैडम, बुरा ना मानिएगा, पर मुझे लगता है यह किसी बुरी आत्मा का काम है, शायद कोई डायन इनके पीछे पड़ी है।"
विशाखा भी संजय की तरह इन सब बातों पर यकीन नहीं करती थी। उसने जवाब में कहा, "देखिए, यह भूत-प्रेत जैसा कुछ नहीं होता, और आप इतने दावे के साथ कैसे कह सकते हैं?"
सुरक्षा गार्ड ने जवाब में कहा, "क्योंकि कई दिनों से संजय सर के फ्लैट से रोज़ रात को एक औरत की चिल्लाने की आवाज़ आस-पास रहने वाले लोगों को सुनाई देती थी।"
यह सुनकर विशाखा सोच में पड़ गई। औरत की चिल्लाने की आवाज़? क्या यह वही औरत है जिसके बारे में संजय कह रहा था?
विशाखा संजय की खास दोस्त रह चुकी थी। संजय की यह हालत देखकर वो आज रात संजय के फ्लैट में रुकने का फैसला करती है, ताकि वो जान पाए कि क्या सच में कोई है या यह सब संजय के दिमाग में है।
संजय जैसे ही थोड़ा नॉर्मल होने लगता है, विशाखा उससे सवाल करते हुए पूछती है, "मैं कब से गौर कर रही हूँ कि तुम जबसे गाँव से वापस आए हो, तबसे तुम अजीब बर्ताव कर रहे हो। तुम तीन दिन से न ऑफिस गए और न ही मेरा फोन उठा रहे थे। ऐसा क्या हो गया जिससे तुमने खुद को चार दीवारों में कैद कर लिया था?"
विशाखा की बातें सुनकर संजय की आँखें फिर से डर से भर गईं और वो कुछ पलों के लिए चुप रहा, फिर धीरे से बोला, "धीरे बोलो, वो अभी भी यहीं है।"
विशाखा ने कमरे में आस-पास देखते हुए कहा, "कौन वो? यह कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? क्या हो गया है तुम्हें? मुझे तो यहाँ हमारे अलावा और कोई नज़र नहीं आ रहा।"
संजय ने डरते हुए इशारे में कहा, "वो तुम्हारे ठीक पीछे खड़ी है और तुम्हें गुस्से से घूर रही है।"
यह कहते ही एकदम से विशाखा को अपनी गर्दन पर एक ठंडी हवा का एहसास हुआ। विशाखा तुरंत पीछे पलटी, पर उसे कोई नहीं दिखाई दिया।
अगले पल विशाखा ने संजय के करीब आते हुए कहा, "मेरी तरफ देखो संजय, अगर तुम सच में चाहते हो कि मैं तुम्हारी कोई मदद करूँ तो तुम्हें मुझे बताना होगा कि तीन दिन पहले तुम्हारे साथ क्या हुआ?"
विशाखा की यह बात सुनकर संजय ने वो सब बताया जो उस रात उसके साथ हुआ था। उसने विशाखा को अपने शरीर पर लगे नाखूनों के गहरे निशान भी दिखाए, जिसे देखकर विशाखा कुछ पल के लिए सोच में पड़ गई। साथ में संजय ने यह भी बताया कि वो रोज़ रात को अपने तीखे लंबे दाँतों से उसकी गर्दन पर वार करके उसका खून पीती है। संजय ने अपनी गर्दन से शर्ट का कॉलर हटाते हुए विशाखा को गर्दन पर काटने का ज़ख्म भी दिखाया।
उस ज़ख्म को देखने के बाद विशाखा को अब थोड़ा-बहुत संजय की बातों पर यकीन होने लगा। लेकिन विशाखा के मन में अभी भी कई सवाल थे, जो सोचने पर मजबूर कर रहे थे कि क्या सच में कोई डायन या बुरी आत्मा संजय को परेशान कर रही है? या फिर संजय नींद में खुद को चोट पहुँचाता है? लेकिन संजय के शरीर पर कुछ ऐसी जगह पर चोट के निशान देखने को मिले जो विशाखा को यकीन करने पर मजबूर कर रहे थे कि यह संजय का काम नहीं हो सकता।
यही सब सोचते हुए विशाखा अपना मन पक्का करके आज रात यहीं रुकने का फैसला करती है, ताकि वो जान पाए कि क्या सच में कोई है या यह सब संजय के दिमाग में है।
विशाखा ने सोचा, "मैं आज रात यहीं रुककर सच्चाई का पता लगाऊँगी, फिर देखते हैं कि आगे क्या करना है।"
रात होते ही दोनों सोने की तैयारी करते हैं। विशाखा सोने से पहले संजय का फोन ऑन करके चार्जिंग पर लगाती है, क्योंकि कल से संजय का फोन बंद आ रहा था। विशाखा और संजय एक ही कमरे में सोने लगते हैं। संजय भी नींद की गोली खाकर लेट जाता है और विशाखा भी उसके साथ लेट जाती है। थोड़ी देर में दोनों गहरी नींद में सो जाते हैं।
कुछ ही देर में आधी रात हो जाती है। विशाखा भी गहरी नींद में सोई हुई थी, पर तभी विशाखा को कमरे में ठंड का एहसास होने लगता है और अचानक विशाखा अपने आप बिस्तर से घसीटते हुए नीचे ज़मीन पर गिर जाती है, जिस वजह से विशाखा की आँखें खुल जाती हैं और वो अपने आस-पास देखने लगती है। लेकिन जब वो संजय की तरफ देखती है, तो उसकी आँखें हैरानी और खौफ से बड़ी हो जाती हैं। कमरे की खिड़की से आती हुई हल्की रोशनी में विशाखा देखती है कि एक लंबे बाल और भयानक चेहरे वाली औरत संजय की गर्दन से खून पी रही थी। उसके लंबे तीखे दाँत संजय की गर्दन के अंदर तक घुसे हुए थे। यह भयानक दृश्य देखकर विशाखा के हाथ-पैर वहीं जम जाते हैं। एक पल के लिए उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। वो तुरंत घबराते हुए कमरे की लाइट ऑन करने लगती है, पर जैसे ही कमरे की लाइट ऑन होती है, वो साया दिखना बंद हो जाता है।
विशाखा अब भी हैरान भरी नज़र से कमरे के चारों ओर देख रही थी कि तभी अचानक से लाइट अपने आप बंद हो जाती है और उस औरत का भयानक चेहरा ठीक विशाखा के चेहरे के सामने आ जाता है, जिसे देखकर विशाखा चिल्ला पड़ती है।
वो डरावनी औरत विशाखा का गला पकड़ते हुए उसे हवा में फेंकती है। विशाखा कमरे की दीवार से जा टकराती है, जिसके कारण उसका सिर दीवार पर जा लगता है और वो वहीं बेहोश हो जाती है।
अगले दिन विशाखा को होश आता है। होश में आकर विशाखा दौड़ती हुई संजय के पास जाती है। संजय की आँखें अभी भी बंद थीं। विशाखा संजय की गर्दन पर वो निशान देखती है। उसकी गर्दन पर वो काटने के निशान अब और भी गहरे हो चुके थे।
अपनी भीगी आँखों से देखते हुए विशाखा संजय से कहती है, "मुझे माफ करना संजय, तुम मुझसे कहते रहे पर मैंने तुम्हारी किसी भी बात पर यकीन नहीं किया।"
संजय की हालत अब और भी गंभीर हो चुकी थी। उसकी साँसें तो चल रही थीं पर वो होश में नहीं आ पा रहा था।
इसी बीच संजय के फोन पर एक कॉल आता है। वो कॉल किसी और का नहीं, बल्कि संजय की माँ का था। विशाखा उस कॉल को रिसीव करते हुए संजय की माँ से बात करती है।
संजय की माँ चिंतित भरी आवाज़ में कहती हैं, "कब से फोन लगा रही हूँ, तेरा फोन ही नहीं लग रहा था। पता है तेरे लिए कितनी चिंतित हो गई थी मैं?"
विशाखा ने फोन पर बात सँभालते हुए कहा, "जी, मैं विशाखा बोल रही हूँ, संजय की दोस्त। इस वक्त वो आराम कर रहा है।"
संजय की माँ को विशाखा की आवाज़ से शक हो जाता है कि ज़रूर कुछ हुआ है। उन्होंने घबराते हुए पूछा, "क्या हुआ है संजय को? सच-सच बता, मेरा जी घबरा रहा है।"
विशाखा ज़्यादा देर तक छुपा नहीं पाती और फोन पर संजय की माँ को सब बता देती है। संजय की माँ ने कहा, "मैंने इसे मना किया था कि रात में उस इलाके से मत गुज़रना। मैं जानती थी ऐसा ही होगा। वो डायन खून की प्यासी है, वो संजय को नहीं छोड़ेगी।"
विशाखा ने कहा, "नहीं, ऐसा मत कहिए। कोई न कोई तरीका ज़रूर होगा उससे पीछा छुड़ाने का। अगर हमने वक्त रहते कुछ नहीं किया तो संजय की जान भी जा सकती है। आप मुझे बताइए क्या करना है, मैं संजय के लिए कुछ भी कर सकती हूँ।"
संजय की माँ ने गंभीर होते हुए कहा, "अब वो तांत्रिक ही कुछ कर सकता है, बस वो ही है जो उस डायन से पीछा छुड़ा सकता है।"
संजय की माँ घबराते हुए तुरंत उस तांत्रिक के पास जाती हैं और विनती करते हुए कहती हैं, "वो बुरी शक्ति मेरे बेटे की जान के पीछे पड़ी है, एक आप ही हैं जो मेरे बेटे की जान बचा सकते हैं।"
तांत्रिक ने कहा, "उसके लिए तुम्हारे बेटे को उसी पेड़ के नीचे वापस लाना होगा जहाँ से यह सब शुरू हुआ था। वहीं पर यह खेल खत्म होगा, पर वो बुरी शक्ति ऐसा होने नहीं देगी। वो संजय को किसी भी कीमत पर यहाँ आने नहीं देगी।"
संजय की माँ ने घबराते हुए कहा, "ऐसा मत कहिए, शायद कोई और तरीका ज़रूर होगा।"
तांत्रिक ने जवाब में कहा, "हाँ, है एक तरीका, पर इसमें जान का खतरा भी है। क्या तुम यह जोखिम ले पाओगी?"
संजय की माँ सोच में पड़ गईं। तांत्रिक ने आगे कहा, "वक्त नहीं है सोचने के लिए, इसलिए जो भी फैसला लेना है अभी लो।" संजय की माँ मजबूर होते हुए हाँ कर देती हैं।
दूसरी तरफ विशाखा डॉक्टर को बुलाकर संजय का इलाज कराती है, पर इस वक्त कोई भी इलाज या कोई भी दवा संजय पर मरहम का काम नहीं कर रही थी, जिससे विशाखा अब और भी चिंता में आ जाती है।
थोड़ी देर में विशाखा एक पंडित जी को घर में ले आती है। पंडित जी संजय के पास जाकर कुछ देर के लिए अपनी आँखें बंद करते हैं और विशाखा से कहते हैं, "यह बहुत शक्तिशाली डायन है, इसे वश में करना मेरे बस की बात नहीं। पर मैं तुम्हें एक सुरक्षा धागा देता हूँ। यह धागा उस डायन से पीछा तो नहीं छुड़ा पाएगा, पर यह उसे संजय से दूर ज़रूर रखेगा। पर कब तक दूर रखेगा, यह मैं नहीं कह सकता।"
पंडित जी विशाखा के हाथ में वो सुरक्षा धागा थमाकर चले जाते हैं। वो धागा एक लाल रंग का धागा होता है।
विशाखा उस धागे को संजय के गले में पहना देती है और हर तरफ कमरे में भगवान की तस्वीर लगा देती है।
कुछ ही देर में विशाखा को संजय की माँ का फोन आता है। फोन पर संजय की माँ ने कहा, "तुम संजय के पास ही रहना। आज रात तुम्हें उस बुरी शक्ति को संजय के पास जाने से रोकना होगा। अगर तुम उसे नहीं रोक पाई तो वो संजय की जान लेगी।"
विशाखा ने कहा, "चाहे जो हो जाए, मैं अब उसे संजय तक पहुँचने नहीं दूँगी।"
धीरे-धीरे दिन ढल जाता है और शाम भी रात में बदल जाती है। तांत्रिक उसी पेड़ के नीचे खड़ा होता है। कुछ ही देर में संजय की माँ कुछ सामान लेकर वहाँ पहुँच जाती हैं।
तांत्रिक ने कहा, "जो सामान बोला था लाने को, वही सामान लाई हो ना?"
संजय की माँ ने हाँ में जवाब दिया। संजय की माँ पेड़ की तरफ देखते हुए घबरा रही थीं। तांत्रिक ने उनके चेहरे पर डर देखते हुए कहा, "घबराओ मत, वो इस वक्त इस पेड़ पर मौजूद नहीं है और यही अच्छा मौका है।"
तांत्रिक ने कुछ ही देर में आग का दायरा बनाकर उसमें आग जलाते हुए मंत्र का जाप करना शुरू किया। लेकिन असली खतरा तो संजय और विशाखा पर मँडरा रहा था और यह बात विशाखा अच्छे से जानती थी। उसने अपने आप को पूरी तरह तैयार कर लिया था।
विशाखा संजय का हाथ थामे उसके पास बैठी हुई थी, पर तभी अचानक कमरों की लाइट्स बार-बार बुझने-जलने लगीं। विशाखा जान गई थी कि वो आ चुकी है। तभी सारे कमरों की बत्ती अचानक बंद हो गई और हर तरफ अंधेरा छा गया। अचानक विशाखा को पायल की झंकार की आवाज़ सुनाई देने लगती है और पूरे कमरों में वो आवाज़ गूँजने लगी, जिसे सुनकर विशाखा के दिल की धड़कन डर से तेज़ हो जाती है।
अब वो पायल की आवाज़ और भी तेज़ होने लगती है। हल्की रोशनी में उस डरावनी औरत की परछाईं कमरे की तरफ बढ़ते हुए विशाखा को दिखाई देती है। वो गुस्से से गुर्राते हुए अंदर बढ़ने की कोशिश करती है, पर वो अंदर नहीं बढ़ पाती, क्योंकि कमरे में भगवान की तस्वीरें लगी हुई थीं, जिस वजह से उस डायन की शक्ति कमज़ोर पड़ गई थी।
अगले पल वो डरावनी औरत अपनी शैतानी ताकत से विशाखा को ज़मीन पर घसीटते हुए कमरे से बाहर ले आती है और वो कमरे में जाने की दोबारा कोशिश करती है, पर विशाखा दौड़ते हुए उस कमरे के पास जाकर दरवाज़ा बाहर से बंद कर देती है। विशाखा की इस हरकत से वो बुरी शक्ति और क्रोधित हो जाती है। वो विशाखा को चोट पहुँचाने की कोशिश करती है, कभी भारी सामान विशाखा पर गिराने की कोशिश करती, तो कभी उसे हवा में फेंकते हुए ज़मीन पर पटक देती है। विशाखा के सिर से अब खून बहने लगा था, पर हर तरह से ज़ख्मी हो जाने के बावजूद भी विशाखा ने अपनी पूरी जान लगाकर उस बुरी शक्ति को संजय के पास जाने से रोका।
दूसरी तरफ, तांत्रिक वहाँ से उठकर अपने हाथ में एक बड़ी कील लेकर उस श्रापित पेड़ के पास जाता है और हथौड़े से उस कील को पेड़ पर ठोकते हुए विशेष मंत्रों का जाप करने लगता है। उस कील के पेड़ के अंदर जाते ही उस डायन पर असर होने लगता है।
विशाखा की आँखों के सामने वो डरावनी औरत तड़पने लगती है और कुछ ही पल में वो बुरी शक्ति काले धुएँ में बदलकर वहाँ से गायब हो जाती है और फिर चारों तरफ शांति छा जाती है।
तांत्रिक ने संजय की माँ से कहा, "अब डरने की बात नहीं है। यह डायन इस कील के ज़रिए इस पेड़ में कैद रहेगी। ध्यान रहे, अगली बार कोई भी इत्र लगाकर यहाँ से न गुज़रे। शायद उस रात तुम्हारे बेटे की इत्र की महक से वो बुरी शक्ति संजय की तरफ खिंची चली आई थी।"
कुछ महीनों बाद, संजय पूरी तरह से ठीक हो जाता है। अब संजय और विशाखा एक-दूसरे के रिश्ते में बँध जाते हैं।
विशाखा की बहादुरी और उसके प्रेम ने संजय की जान बचा ली थी।

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