June Ki Aakhri Baarish
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भाग 1 : वह जून, जो कभी ख़त्म नहीं हुआ
"कुछ रिश्ते ख़ून से नहीं, धड़कनों से जुड़े होते हैं। और जब धड़कन का एक हिस्सा चला जाए... तो इंसान ज़िंदा तो रहता है, लेकिन पहले जैसा कभी नहीं रहता।"
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जून की पहली बारिश हो रही थी।
बादलों ने पूरे शहर को अपनी बाँहों में समेट रखा था। सड़कें भीगी हुई थीं, पेड़ों की पत्तियाँ चमक रही थीं और मिट्टी की खुशबू हवा में घुलकर किसी पुराने गीत की तरह दिल को छू रही थी।
नंदिनी खिड़की के पास खड़ी थी।
उसने हथेली बाहर निकाली। बारिश की कुछ बूँदें उसकी उँगलियों पर आकर ठहर गईं।
उसने आँखें बंद कर लीं...
बारिश उसे हमेशा अतीत में ले जाती थी।
एक ऐसा अतीत, जहाँ हर मुस्कान के बीच उसका भाई था।
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"नंदू... जल्दी नीचे आ, केक कटने वाला है!"
आवाज़ सुनते ही दस साल की नंदिनी सीढ़ियों से भागती हुई नीचे उतरी।
पूरा घर रंग-बिरंगी झालरों से सजा था।
माँ रसोई में हलवा बना रही थीं।
पापा कैमरा सँभाल रहे थे।
बीच में खड़ा था आरव...
उसका बड़ा भाई।
चेहरे पर वही शरारती मुस्कान, जो पूरे घर की उदासी चुरा लेने की ताक़त रखती थी।
"इतनी देर क्यों लगा दी?" उसने हँसते हुए पूछा।
नंदिनी ने होंठ फुला लिए।
"मैं नहीं आऊँगी... आपने मेरी चॉकलेट खा ली।"
आरव ने जेब से एक बड़ी डेयरी मिल्क निकाली और उसके हाथ में रख दी।
"मेरी छोटी रानी के बिना जन्मदिन पूरा हो सकता है क्या?"
नंदिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी।
उस दिन घर में जितनी रोशनी बल्बों से नहीं थी, उससे कहीं ज़्यादा उनके चेहरों पर थी।
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हर साल तीन जून ऐसा ही होता था।
घर में हँसी गूँजती थी।
पापा कहते—
"जब तक घर में बच्चों की हँसी है, तब तक भगवान यहीं रहते हैं।"
और सचमुच...
तब लगता था, भगवान उनके घर में ही रहते हैं।
लेकिन शायद...
भगवान कभी-कभी बिना बताए चले भी जाते हैं।
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जन्मदिन के बारह दिन बाद की सुबह।
सूरज तो निकल आया था...
लेकिन उस दिन जैसे रोशनी घर का रास्ता ही भूल गई थी।
माँ पूजा कर रही थीं।
पापा अख़बार पढ़ रहे थे।
नंदिनी स्कूल जाने के लिए जूते पहन रही थी।
तभी फ़ोन बजा।
एक साधारण-सी घंटी...
जिसने अगले कुछ सेकंड में पूरी दुनिया बदल दी।
पापा ने फ़ोन उठाया।
"हैलो..."
दूसरी तरफ़ से क्या कहा गया...
यह आज तक किसी को नहीं पता।
लेकिन अगले ही पल उनके हाथ काँपने लगे।
मोबाइल ज़मीन पर गिर गया।
चेहरा बिल्कुल सफ़ेद पड़ गया।
उनके होंठ हिले...
पर आवाज़ नहीं निकली।
माँ दौड़कर आईं।
"क्या हुआ?"
बहुत देर बाद पापा सिर्फ़ इतना कह पाए—
"आरव..."
और फिर फूट-फूटकर रो पड़े।
उस एक नाम ने पूरे घर को सन्नाटे में बदल दिया।
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लोग आने लगे।
रिश्तेदार...
पड़ोसी...
दोस्त...
सबके चेहरे पर एक जैसा दुःख था।
लेकिन नंदिनी को कुछ समझ नहीं आ रहा था।
वह बार-बार एक ही सवाल पूछ रही थी—
"भैया कहाँ हैं?"
कोई जवाब नहीं देता।
कुछ लोग उसे गले लगा लेते।
कुछ उसके सिर पर हाथ फेरते।
लेकिन जवाब...
किसी के पास नहीं था।
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शाम होने तक दरवाज़े पर एक एम्बुलेंस आकर रुकी।
पूरा मोहल्ला चुप हो गया।
चार लोग धीरे-धीरे एक सफ़ेद कपड़े में लिपटे शरीर को लेकर अंदर आए।
नंदिनी ने भीड़ के बीच से झाँककर देखा।
उसे लगा...
भैया सो रहे हैं।
वह दौड़कर उनके पास पहुँची।
"भैया... उठो ना। देखो, मैं आ गई।"
कोई हरकत नहीं हुई।
उसने फिर आवाज़ दी।
"आपने कहा था अगले रविवार मुझे मेले ले जाओगे... उठो ना..."
कमरे में मौजूद हर आँख नम थी।
लेकिन सबसे दर्दनाक बात यह थी कि...
जिस बच्ची की दुनिया टूट रही थी...
उसे अभी तक यह समझ ही नहीं आया था कि मौत क्या होती है।
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उस रात नंदिनी ने पहली बार भगवान से नाराज़ होना सीखा।
उसने मंदिर के सामने खड़े होकर पूछा—
"अगर अच्छे लोग ही चले जाते हैं...
तो अच्छे बनने का क्या फ़ायदा?"
मंदिर में घंटियाँ बजती रहीं।
लेकिन भगवान ने उस दिन भी कोई जवाब नहीं दिया।
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उस रात के बाद घर वही रहा...
लेकिन घर जैसा कभी नहीं लगा।
दीवारें खड़ी थीं।
कमरे भी थे।
फोटो भी थीं।
लेकिन हँसी...
जैसे किसी ने हमेशा के लिए चुरा ली थी।
माँ हर सुबह दो कप चाय बना देतीं।
एक कप खुद पीतीं...
दूसरा कप ठंडा हो जाता।
पापा देर रात तक दरवाज़ा खुला छोड़ देते।
शायद उन्हें यक़ीन था...
कि उनका बेटा एक दिन कहेगा—
"पापा... देर हो गई, माफ़ कर दीजिए।"
लेकिन कुछ दरवाज़े...
उम्र भर खुले रहते हैं।
और कुछ लोग...
फिर कभी वापस नहीं आते।
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नंदिनी उस दिन बच्ची से बड़ी हो गई।
उसने खेलना छोड़ दिया।
ज़िद करना छोड़ दिया।
और मुस्कुराना भी...
क्योंकि उसे पहली बार समझ आया—
दर्द उम्र नहीं देखता।
और कुछ जून...
ज़िंदगी भर ख़त्म नहीं होते।
भाग 2 : ख़ामोशी की आवाज़
"कुछ दर्द चीखते नहीं... बस इंसान को भीतर ही भीतर ख़ामोश कर देते हैं।"
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आरव के जाने के बाद घर में घड़ी तो पहले की तरह चलती रही...
लेकिन समय जैसे वहीं ठहर गया था।
सुबह होती...
सूरज निकलता...
लोग अपने काम पर जाते...
बच्चे स्कूल जाते...
लेकिन नंदिनी के घर में हर दिन एक ही तारीख़ लगती—
15 जून।
माँ अब पहले जैसी नहीं रहीं।
वह खाना बनातीं...
लेकिन थाली चार की जगह पाँच निकाल देतीं।
रोटियाँ सेंकते-सेंकते अचानक रुक जातीं।
फिर एक रोटी अलग रख देतीं।
"आरव आएगा तो खा लेगा..."
इतना कहकर खुद ही रो पड़तीं।
नंदिनी चुपचाप वह रोटी वापस डिब्बे में रख देती।
अब उसे समझ आने लगा था...
कुछ इंतज़ार कभी पूरे नहीं होते।
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पापा पहले बहुत हँसते थे।
घर आते ही कहते—
"मेरे शेर कहाँ हैं?"
लेकिन अब...
उनकी आवाज़ जैसे कहीं खो गई थी।
वह देर रात तक बरामदे में बैठे रहते।
हाथ में आरव की पुरानी घड़ी...
जिसकी सुइयाँ चल रही थीं।
बस उसका मालिक रुक गया था।
एक रात नंदिनी ने उन्हें पहली बार रोते देखा।
वह घड़ी को सीने से लगाए धीरे-धीरे कह रहे थे—
"बेटा...
बाप के कंधे बेटे की अर्थी उठाने के लिए नहीं बने होते..."
नंदिनी दरवाज़े के पीछे खड़ी सब सुन रही थी।
उसने पहली बार जाना...
मजबूत दिखने वाले लोग भी टूटते हैं।
बस...
वे अकेले में रोते हैं।
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स्कूल जाना अब उसे अच्छा नहीं लगता था।
पहले हर छुट्टी में वह भागकर घर आती थी, क्योंकि दरवाज़े पर आरव उसका इंतज़ार करता था।
"चल, आज आइसक्रीम खिलाता हूँ।"
अब दरवाज़ा खुलता...
और सामने सिर्फ़ सन्नाटा होता।
दोस्त पूछते—
"तू पहले जैसी क्यों नहीं रही?"
वह मुस्कुरा देती।
क्योंकि कुछ जवाब शब्दों में नहीं दिए जा सकते।
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रक्षाबंधन आया।
पूरा बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से सजा था।
हर दुकान पर बहनें अपने भाइयों के लिए राखियाँ चुन रही थीं।
नंदिनी भी माँ के साथ बाज़ार गई।
उसकी नज़र एक नीले रंग की राखी पर ठहर गई।
बिल्कुल वैसी...
जैसी हर साल आरव को पसंद आती थी।
उसने बिना कुछ कहे वह राखी खरीद ली।
घर आकर उसने आरव की तस्वीर के सामने थाली सजाई।
दीपक जलाया।
राखी हाथ में ली।
और काँपती उँगलियों से तस्वीर पर बाँध दी।
"भैया...
इस बार मिठाई मत माँगना...
मैं खिलाऊँगी तो रो पड़ूँगी..."
इतना कहते ही उसकी आवाज़ टूट गई।
माँ पीछे खड़ी थीं।
उन्होंने पहली बार बेटी को सीने से लगाकर ज़ोर से रोया।
उस दिन घर में दो बहनें नहीं...
दो टूटी हुई आत्माएँ रो रही थीं।
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समय बीतता गया।
लोगों ने कहना शुरू कर दिया—
"अब भूल भी जाओ।"
नंदिनी हर बार सोचती—
क्या लोग सच में भूल जाते हैं?
अगर भूल जाते हैं...
तो फिर हर जून में दिल इतना भारी क्यों हो जाता है?
हर बारिश में उसकी याद क्यों आ जाती है?
हर खुशी अधूरी क्यों लगती है?
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एक शाम बिजली चली गई।
घर में अँधेरा फैल गया।
माँ मोमबत्ती ढूँढ़ रही थीं।
नंदिनी स्टोर रूम में गई।
पुराने बक्से खोलते-खोलते उसकी नज़र एक नीले रंग की डायरी पर पड़ी।
कवर पर धूल जमी थी।
लेकिन उस पर लिखा नाम साफ़ दिखाई दे रहा था—
"आरव"
उसके हाथ काँप उठे।
दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा...
पूरा घर सुन लेगा।
वह डायरी लेकर अपने कमरे में आई।
धीरे से पहला पन्ना खोला।
पहले पन्ने पर लिखा था—
"अगर कभी मेरी छोटी नंदू यह डायरी पढ़े... तो एक बात याद रखना— ज़िंदगी कभी किसी के जाने से रुकनी नहीं चाहिए। अगर मैं रहूँ, तो मेरे साथ हँसना। अगर मैं न रहूँ... तो मेरे हिस्से की ज़िंदगी भी तुम जीना।"
नंदिनी की आँखों से आँसू पन्नों पर गिरने लगे।
वह पहली बार महसूस कर रही थी...
जैसे उसका भाई उससे बात कर रहा हो।
उसने डायरी को सीने से लगाया...
और बहुत देर तक बस रोती रही।
लेकिन उसी रात...
जब आँसू थम गए...
उसने अपनी मेज़ पर एक खाली कॉपी रखी।
कलम उठाई।
बहुत देर तक सफ़ेद पन्ने को देखती रही।
फिर काँपते हाथों से पहला शब्द लिखा—
"भैया..."
उसे नहीं पता था कि यही एक शब्द...
एक दिन उसकी पहचान बन जाएगा।
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भाग 3 : जब दर्द ने शब्दों का हाथ थाम लिया
"हर लेखक पैदा नहीं होता... कुछ लोग अपने टूटे हुए हिस्सों को जोड़ते-जोड़ते लेखक बन जाते हैं।"
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उस रात नंदिनी सो नहीं पाई।
आरव की डायरी उसके सीने पर रखी थी। बाहर बारिश लगातार हो रही थी। खिड़की से आती ठंडी हवा पन्नों को अपने-आप पलट रही थी, मानो कोई अदृश्य हाथ उन्हें पढ़ रहा हो।
वह उठी।
टेबल लैंप जलाया।
सामने खाली कॉपी रखी।
कलम हाथ में थी...
पर शब्द कहीं खो गए थे।
उसने गहरी साँस ली और पहला वाक्य लिखा—
"आज भी लगता है कि दरवाज़ा खुलेगा और तुम कहोगे—'नंदू, चाय बना दे...'"
बस...
इतना लिखते ही उसके आँसू स्याही में घुल गए।
उस रात उसने पूरी कॉपी नहीं भरी।
सिर्फ़ दो पन्ने लिखे।
लेकिन उन दो पन्नों में जितना दर्द था...
उतना शायद उसने पूरी ज़िंदगी में किसी से नहीं कहा था।
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अब उसकी एक नई आदत बन गई।
जब भी घर सो जाता...
वह जाग जाती।
टेबल लैंप की पीली रोशनी में बैठकर लिखती रहती।
कभी कविता...
कभी ख़त...
कभी ऐसी बातें, जो उसने कभी किसी से नहीं कही थीं।
उसे लगता...
हर शब्द के साथ उसके सीने का बोझ थोड़ा हल्का हो रहा है।
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एक रात माँ की नींद खुली।
उन्होंने देखा...
कमरे की बत्ती जल रही है।
दरवाज़े की दरार से झाँका तो नंदिनी लिख रही थी।
उसकी आँखें लाल थीं।
आँसू लगातार गिर रहे थे...
लेकिन उसके हाथ रुके नहीं।
माँ चुपचाप वापस चली गईं।
सुबह उन्होंने कुछ नहीं पूछा।
बस नाश्ते के साथ एक छोटी-सी डायरी रख दी।
"बेटा...
दिल की बातें हमेशा काग़ज़ समझते हैं।
लिखती रहना।"
नंदिनी ने माँ की तरफ़ देखा।
बहुत दिनों बाद...
दोनों की आँखों में दर्द के साथ एक छोटी-सी उम्मीद भी थी।
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धीरे-धीरे उसके शब्द बदलने लगे।
अब उनमें सिर्फ़ आँसू नहीं थे...
हिम्मत भी थी।
वह लिखती—
"जो लोग चले जाते हैं, वे ख़त्म नहीं होते... वे हमारी आदतों में बस जाते हैं। कभी मुस्कान बनकर... कभी बारिश बनकर... कभी किसी अधूरे गीत की तरह..."
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कॉलेज में साहित्य प्रतियोगिता थी।
दोस्तों ने ज़बरदस्ती उसका नाम लिखवा दिया।
वह घबरा गई।
"मैं नहीं पढ़ पाऊँगी..."
"अगर लोगों को पसंद नहीं आया तो?"
उसकी सहेली मुस्कुराई।
"जो दिल से लिखा जाता है... उसे समझने वाले हमेशा मिलते हैं।"
काँपते हाथों से वह मंच पर पहुँची।
पूरा सभागार शांत था।
उसने अपनी रचना पढ़नी शुरू की।
पहले उसकी आवाज़ काँप रही थी...
फिर शब्दों ने उसका साथ पकड़ लिया।
जब आख़िरी पंक्ति आई—
"कुछ लोग मरते नहीं... वे हर दिन हमारी यादों में जीते हैं..."
तो पूरा हॉल खामोश था।
कुछ पल बाद...
तालियों की आवाज़ गूँज उठी।
पहली पंक्ति में बैठी एक बुज़ुर्ग महिला रो रही थीं।
कार्यक्रम ख़त्म होने पर वे नंदिनी के पास आईं।
उन्होंने उसका हाथ पकड़कर कहा—
"बेटी...
मैंने भी अपना बेटा खोया है।
आज पहली बार लगा...
किसी ने मेरे दर्द को शब्द दे दिए।"
नंदिनी की आँखें भर आईं।
उसे उस दिन समझ आया...
दर्द जब सिर्फ़ अपना रहता है, तो बोझ बनता है। लेकिन वही दर्द किसी और के आँसू पोंछ दे... तो वह उद्देश्य बन जाता है।
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उस रात उसने आरव की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।
मुस्कुराकर बोली—
"भैया...
आज पहली बार लगा कि तुमने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।
तुमने मुझे एक रास्ता दिया है।"
खिड़की से हवा आई।
तस्वीर के पास रखा एक सूखा गुलाब धीरे से ज़मीन पर गिर पड़ा।
नंदिनी मुस्कुरा दी।
उसे लगा...
जैसे आरव हमेशा की तरह कह रहा हो—
"शाबाश, मेरी छोटी रानी... अब रुकना मत।"
उसने उसी रात अपनी डायरी के पहले पन्ने पर लिखा—
"यह कहानी सिर्फ़ मेरी नहीं है। यह उन सभी लोगों की कहानी है, जिन्होंने किसी अपने को खोकर भी जीना सीखा है।"
और शायद...
उसी रात एक बहन का दर्द...
एक लेखिका की पहचान बनना शुरू हुआ।
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भाग 4 : जब दर्द पहचान बन गया
"सपनों तक पहुँचने का रास्ता अक्सर तालियों से नहीं, ठुकराए जाने से बनता है।"
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उस दिन के बाद नंदिनी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वह लिखती रही।
सुबह कॉलेज...
शाम को घर के काम...
रात को शब्दों के साथ उसकी लंबी बातें।
अब लिखना उसके लिए शौक़ नहीं था।
वह साँस लेने जैसा हो गया था।
जब भी दिल भारी होता, वह कागज़ खोल लेती।
जब भी किसी की याद आती, वह कहानी बन जाती।
और जब भी आँसू गिरते...
स्याही थोड़ी और गहरी हो जाती।
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कुछ महीनों बाद उसकी सहेली रिया ने कहा—
"तू अपनी रचनाएँ किसी पत्रिका में क्यों नहीं भेजती?"
नंदिनी हँस दी।
"मेरे जैसे हज़ारों लोग लिखते हैं। मेरी लिखी चीज़ कौन पढ़ेगा?"
रिया ने उसकी डायरी बंद करते हुए कहा—
"जिस दर्द ने तुझे बदला है...
वही दर्द किसी और को जीने की वजह देगा।"
यह बात नंदिनी के दिल में उतर गई।
उसने अपनी पहली कहानी एक साहित्यिक पत्रिका में भेज दी।
हर सुबह वह डाकिए का इंतज़ार करती।
हर शाम मोबाइल देखती।
हर बार...
सिर्फ़ इंतज़ार मिलता।
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एक दिन ईमेल आया।
उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
उसने काँपते हाथों से मेल खोला।
पहली ही पंक्ति पढ़कर उसकी आँखें झुक गईं—
"हमें खेद है, आपकी रचना का चयन नहीं हो सका।"
बस...
इतना ही लिखा था।
उसने लैपटॉप बंद कर दिया।
कमरे की लाइट बुझा दी।
और खिड़की के पास जाकर बैठ गई।
बाहर फिर बारिश हो रही थी।
उसे लगा...
शायद उसके शब्द भी उसी बारिश में बह गए।
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रात को उसने आरव की डायरी खोली।
एक पन्ने पर लिखा था—
"हारना तब नहीं होता जब दुनिया तुम्हें मना कर दे... हारना तब होता है, जब तुम खुद पर विश्वास करना छोड़ दो।"
नंदिनी देर तक उस पन्ने को देखती रही।
फिर उसने अपना पहला अस्वीकृति-पत्र मोड़ा नहीं...
संभालकर डायरी में रख दिया।
उसने मुस्कुराकर कहा—
"भैया...
यह हार नहीं...
मेरी शुरुआत है।"
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इसके बाद उसने और मेहनत की।
हर रचना को कई-कई बार पढ़ा।
शब्द बदले।
भावनाएँ सँवारीं।
वह अब सिर्फ़ लिख नहीं रही थी...
वह अपने दर्द को कला में बदल रही थी।
कुछ महीनों बाद...
एक प्रकाशक का फ़ोन आया।
"क्या आप नंदिनी बोल रही हैं?"
"जी..."
"हमने आपकी कहानी पढ़ी।
हम चाहते हैं कि आप इसे किताब का रूप दें।"
कुछ पल तक नंदिनी कुछ बोल ही नहीं पाई।
उसकी आँखें भर आईं।
उसे सबसे पहले जिस इंसान को यह ख़बर सुनानी थी...
वह इस दुनिया में नहीं था।
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उसने धीरे से आरव की तस्वीर के सामने जाकर किताब की पहली पांडुलिपि रखी।
"भैया...
याद है, तुम कहते थे कि मेरी कॉपियों में एक दिन लोग ऑटोग्राफ़ लेंगे?"
वह हल्का-सा हँसी।
"देखो...
तुम फिर सही निकले।"
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कई महीनों की मेहनत के बाद किताब छपकर आई।
उसने काँपते हाथों से पहला पन्ना खोला।
समर्पण में लिखा था—
"उस भाई के नाम... जिसने मुझे उँगली पकड़कर चलना सिखाया, और अपने जाने के बाद गिरकर भी उठना।"
उसकी आँखों से आँसू किताब के पहले पन्ने पर गिर पड़े।
उसे लगा...
जैसे यह किताब स्याही से नहीं...
यादों से लिखी गई हो।
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कुछ ही दिनों में किताब लोगों तक पहुँचने लगी।
एक दिन उसे एक चिट्ठी मिली।
वह एक बारह साल की बच्ची की थी।
उसमें लिखा था—
"दीदी, मेरे पापा अब इस दुनिया में नहीं हैं। मैं बहुत अकेली हो गई थी। आपकी किताब पढ़कर पहली बार लगा कि मैं अकेली नहीं हूँ। अब मैं भी डायरी लिखती हूँ। धन्यवाद..."
नंदिनी देर तक वह चिट्ठी सीने से लगाए बैठी रही।
उसने आसमान की ओर देखा।
"भैया...
देखो...
मेरा दर्द अब किसी और की ताक़त बन रहा है।"
बारिश की एक बूँद खिड़की से अंदर आई और किताब के उसी पन्ने पर गिर पड़ी जहाँ लिखा था—
"समर्पण..."
नंदिनी मुस्कुराई।
उसे लगा...
जैसे कहीं दूर...
आरव भी मुस्कुरा रहा हो।
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भाग 5 : कुछ लोग हर बारिश में लौट आते हैं
"कहानियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं... वे बस किसी और के दिल में जीना शुरू कर देती हैं।"
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तीन जून...
वही तारीख़...
जिस दिन कभी घर में गुब्बारे लगते थे।
माँ हलवा बनाती थीं।
पापा केक लेकर आते थे।
और आरव ज़िद करता था—
"पहला टुकड़ा मेरी छोटी रानी खाएगी।"
लेकिन इस बार...
तीन जून अलग था।
आज नंदिनी की पहली किताब का विमोचन था।
सभागार फूलों से सजा हुआ था।
मंच पर उसकी किताब रखी थी।
सैकड़ों लोग सामने बैठे थे।
पत्रकार...
पाठक...
लेखक...
सब उसकी एक झलक का इंतज़ार कर रहे थे।
लेकिन नंदिनी की नज़र...
बार-बार पहली पंक्ति की उस खाली कुर्सी पर जा रही थी।
वह कुर्सी...
जिसे उसने किसी के लिए नहीं...
अपने भाई के लिए छोड़ा था।
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कार्यक्रम शुरू हुआ।
संचालक ने मुस्कुराकर कहा—
"आज हमारे बीच ऐसी लेखिका हैं, जिन्होंने अपने दर्द को शब्दों में बदलकर हज़ारों लोगों के दिलों तक पहुँचाया है..."
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
नंदिनी मंच पर पहुँची।
उसके हाथ में वही किताब थी...
जो कभी आँसुओं की तरह डायरी के पन्नों पर शुरू हुई थी।
उससे पूछा गया—
"आपकी सबसे बड़ी प्रेरणा कौन है?"
हॉल पूरी तरह शांत हो गया।
नंदिनी ने कुछ पल तक कुछ नहीं कहा।
फिर उसने पहली पंक्ति की उस खाली कुर्सी की ओर देखा।
हल्की-सी मुस्कान आई।
और वह बोली—
"मेरी प्रेरणा...
वह इंसान है...
जो आज यहाँ नहीं है...
लेकिन मेरी हर लिखी हुई पंक्ति में आज भी साँस लेता है।"
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"यह किताब मैंने नहीं लिखी...
इसे एक बहन के अधूरे सवालों ने लिखा है...
एक माँ के टूटे हुए दिल ने लिखा है...
एक पिता की ख़ामोशी ने लिखा है...
और उस भाई ने लिखा है...
जिसने जाते-जाते मुझे जीना सिखा दिया।"
पूरा सभागार खड़ा हो गया।
तालियाँ बज रही थीं...
लेकिन उस पल...
तालियों से ज़्यादा आँसुओं की आवाज़ थी।
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कार्यक्रम के बाद लोग उससे मिलने लगे।
कोई किताब पर हस्ताक्षर करवाता।
कोई तस्वीर खिंचवाता।
कोई रोते हुए कहता—
"यह कहानी मेरी भी है।"
उसी भीड़ में लगभग आठ साल का एक छोटा लड़का आया।
उसके हाथ में किताब थी।
उसने मासूमियत से पूछा—
"दीदी...
क्या आपकी कहानी सच है?"
नंदिनी कुछ पल उसे देखती रही।
फिर मुस्कुराकर बोली—
"बेटा...
हर कहानी पूरी तरह सच नहीं होती...
लेकिन हर अच्छी कहानी में किसी का सच्चा दर्द ज़रूर होता है।"
लड़के ने अगला सवाल पूछा—
"क्या आपके भैया आपको देख रहे होंगे?"
नंदिनी की आँखें भर आईं।
उसने आसमान की ओर देखा।
बाहर बादल घिर आए थे।
धीरे से बोली—
"हाँ...
जब भी मैं किसी के चेहरे पर मुस्कान लाती हूँ...
मुझे लगता है...
वो यहीं कहीं हैं।"
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शाम ढल चुकी थी।
लोग जा चुके थे।
सभागार लगभग खाली था।
नंदिनी अकेली बाहर निकली।
और तभी...
बारिश शुरू हो गई।
वही जून की बारिश।
वह बारिश...
जिससे वह सालों तक डरती रही।
आज उसने छाता नहीं खोला।
धीरे-धीरे भीगती हुई सड़क पर चलने लगी।
हर बूँद...
मानो कोई पुरानी याद लेकर गिर रही थी।
उसे अचानक महसूस हुआ...
जैसे कोई उसके साथ चल रहा हो।
उसी चाल से...
जैसे बचपन में आरव चला करता था।
उसने बिना मुड़े कहा—
"भैया...
देखो...
मैं अब रोती नहीं हूँ।"
हवा का एक झोंका आया।
पेड़ों की पत्तियाँ सरसराईं।
और कहीं दूर...
उसे वही हँसी सुनाई दी...
जिसे उसने बरसों पहले खो दिया था।
उसने आँखें बंद कर लीं।
उसे लगा...
किसी ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा है।
जैसे हमेशा फेरता था।
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घर पहुँचकर उसने आरव की तस्वीर के सामने किताब रख दी।
एक दीपक जलाया।
धीरे से बोली—
"भैया...
मैंने अपना वादा निभा दिया।
तुमने कहा था...
'अगर मैं कभी न रहूँ...
तो मेरे हिस्से की ज़िंदगी भी तुम जीना।'
मैंने कोशिश की है...
बहुत कोशिश की है।"
उसकी आँखों से आँसू गिरे...
लेकिन इस बार उनमें शिकायत नहीं थी।
सिर्फ़ अपनापन था।
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उसने खिड़की खोली।
बारिश की कुछ बूँदें कमरे में चली आईं।
हवा से किताब के पन्ने अपने-आप पलटने लगे।
आख़िरी पन्ने पर एक खाली जगह थी।
नंदिनी ने कलम उठाई...
और लिखा—
"कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं।
लेकिन अगर उनका प्यार सच्चा हो...
तो वे कभी हमारी कहानी से नहीं जाते।
वे हर मुस्कान में मिलते हैं...
हर आँसू में मिलते हैं...
और हर जून की आख़िरी बारिश में...
चुपचाप हमारे साथ चलते हैं।"
उसने कलम बंद की।
दीपक की लौ हल्के से काँपी।
और उसी पल...
बादलों के बीच से चाँद की एक किरण कमरे में आकर तस्वीर पर ठहर गई।
नंदिनी मुस्कुरा दी।
बहुत वर्षों बाद...
उसे ऐसा लगा कि जून अब सिर्फ़ उसके भाई को खोने का महीना नहीं रहा।
अब जून...
उसकी हिम्मत का महीना था।
उसकी पहचान का महीना था।
उसके पुनर्जन्म का महीना था।
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"दर्द इंसान को तोड़ भी सकता है... और गढ़ भी सकता है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि वह अपने आँसुओं को अंत बनाता है या शुरुआत।”
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