Khat

उस शाम गाँव के बाहर यूँ ही पेड़ के पास बैठे हुए मैंने देखा, एक उड़ता हुआ सफ़ेद पंछी। सफ़ेद पंछी मतलब कबूतर? हाँ, हाँ, कबूतर। और उसके पंजों में कुछ बँधा हुआ देखा। उसे पाने के लालच में गाँव की तंग, छोटी और सँकरी गलियों से गुज़रते हुए, जहाँ-तहाँ सब्ज़ी की दुकानें और टूटी-फूटी सड़कें थीं, मैं उस पंछी का पीछा करता रहा।
कई दूर और कुछ मिनटों तक उसका पीछा करने के बाद, इतनी दौड़-भाग और खुद को कष्ट देने के बाद, आखिरकार वह कबूतर मुझे मिल गया। उसके पंजों में बँधा हुआ था एक ख़त। एक ख़त, जिसे यह कबूतर न जाने कहाँ ले जा रहा था। किसने, किसके लिए और क्या लिखने को कहा था, यह तो मैं नहीं जानता था। कायदे से तो मुझे इसे खोलना नहीं चाहिए था। लेकिन मेरी उम्र कम और अक्ल उससे भी कम थी। हर नई चीज़ को देखने और जानने की जिज्ञासा थी। तो फिर क्या था, मैंने अपने भीतर के अच्छे और बुरे दोनों भूतों की बातों को नज़रअंदाज़ करते हुए ख़त खोल ही दिया। और अंदाज़ लगाइए क्या?
मुझे मिला एक ख़त। एक ऐसा ख़त, जो शायद किसी दिल ने अपने आशिक़ को लिखा था या कोई अपने घर से दूर रहने वाले को हालात बयां कर रहा था। ख़त में लिखा था।
प्रिय सुनो,
मैं आज शाम यहाँ पहुँच चुका हूँ। मौसम यहाँ का ठीक है, पर रात में ठंड कुछ ज़्यादा ही हो जाती है। यहाँ तक पहुँचने के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी, तब कहीं जाकर अब मैं इस लायक़ बन पाया हूँ कि दुश्मन को मार गिरा सकूँ।
रेत में चलते हुए याद आ जाता है कि अगर तुम साथ होती, तो इन अजनबी रास्तों पर साथ चलते। तुम नाम लेतीं, मैं पहचानता। पर यहाँ हम वो छुपन-छुपाई का खेल नहीं खेल सकते।
इस बार जब लौटूँगा, तो तुम्हारे पिताजी से बात करूँगा। देखना, वो एक बार मेरी मेहनत और संघर्ष की कहानियाँ सुनने के बाद खुद कहेंगे, 'बिटिया, इससे शादी करोगी।'
जल्द ही वापस मिलूँगा।"
यह ख़त तो शायद राहुल भैया ने लिखा है। उनका कुछ महीने पहले ही सेना में चयन हुआ था। वे बहुत मेहनती और होशियार थे। गाँव में सभी उनकी इज़्ज़त करते थे। और यह ख़त, जिसे लिखा गया था, मैं उसे भी जानता हूँ।
मैं तुरन्त गाँव के पश्चिम में बने मास्टरजी के घर की ओर भागा। रिया दीदी, मास्टरजी की बड़ी बेटी थीं। राहुल भैया और रिया दीदी साथ में स्कूल में पढ़े थे। स्कूल की पढ़ाई के बाद राहुल भैया सेना की तैयारी में जुट गए और रिया दीदी ने कॉलेज के बाद गाँव के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। मैं उनके घर पहुँचा और क़िस्मत से दीदी दरवाज़े पर ही खड़ी मिल गईं। हाँफते हुए मैंने कहा, "दीदी... दीदी... सुनो ये...", वह बोली "अरे! सांस तो ले ले। क्या हुआ? ये सुबह-सुबह कहाँ से दौड़े-दौड़े आ रहा है?"
मैंने कहा, "कुछ नहीं दीदी, बस ये..." और ख़त उनके हाथ में थमा दिया।
मैं दूर भागकर एक पेड़ की डाल पर बैठ गया यह देखने के लिए कि अब क्या होगा। दीदी वापस ख़त लिखेंगी या पढ़कर मुस्कुराएंगी। तभी मास्टरजी आए और बोले, "बिटिया, जल्दी चल। दुश्मनों से जंग में लड़ते हुए शहीद हुए अमर राहुल का पार्थिव शरीर आ गया है।"
यह सुनते ही दीदी के हाथ से ख़त गिर पड़ा। शायद वे उस लाइन तक पहुँच चुकी थीं—"बिटिया, इससे शादी करोगी।"
उनकी आँखों में आँसू थे। वे इस बात को मानने को तैयार नहीं थीं। या शायद भगवान से इस बात का मतलब पूछ रही थीं कि जब अभी ख़त मिला था, तो कम से कम ख़त वापस तो लिखने दिया होता। मन इस बात को तो मानता कि हाँ, मेरे दिल की बात मैंने अपने प्रेम तक पहुँचा दी थी।
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