Meri Khushboo

यही कोई 4-5 बजे मेरी आँखें खुलीं। उस रात हम देर से सोए थे। खुशबू और मैं बाहर गए थे, घूमने। खुशबू—मेरी वाइफ—4 साल पहले शादी हुई थी हमारी। पहले तो हम अक्सर घूमने जाया करते थे, पर उन दिनों की बात और थी। उस वक्त हमारी नई-नई शादी हुई थी—रायपुर से। हाँ, रायपुर के पास वाले गाँव की है मेरी खुशबू। मैं उसको बचपन से जानता था। पड़ोस के शर्मा जी की बेटी थी। शर्मा जी के गुज़र जाने के बाद उसकी माँ ने ही सारी ज़िम्मेदारी संभाली। मैं तो हमेशा उसके घर जाया करता था। शरारती बच्चा था न, जब भी माँ मुझे डाँटती या मारती थी, मैं फट से जाकर खुशबू की माँ के पास छुप जाया करता था। दिन भर वहीं रहता था, खुशबू और मैं खेलते थे और खुशबू की माँ हम दोनों को गरम-गरम खाना देती थी। मैं तो मज़ाक में बोलता रहता था कि माँ मेरी शादी खुशबू से ही कराना। यह सुनते ही वो शरमा कर दूसरे कमरे में चली जाती थी।
रात गिरते ही जब मेरी माँ मुझे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक जाती थी और उसका गुस्सा भी ठंडा हो जाता था, तो मैं चुपके से जाकर अपने बिस्तर पर सो जाता था। बहुत छोटा-सा था हमारा घर—2 कमरों का। एक में माँ और पिताजी सोते थे और एक में मैं। गाँव में रहते थे न हम लोग, और गाँव में सारे घर ऐसे ही होते थे। बहुत खुश थे हम लोग।
बहुत दिनों से प्लान था हमारा, खुशबू और मेरा कि कहीं बाहर जाकर डिनर करेंगे, पर काम के सिलसिले में मैं कुछ इतना व्यस्त था कि खुशबू को वक्त ही नहीं दे पा रहा था। कल रात फाइनली मुझे वक्त मिल ही गया। बहुत खुश थी वो कल रात, हम लोग मेरी स्कूटर में बैठकर एक बड़े होटल गए थे। उसने तो मुझे कई बार बोला कि ऑटो में चलते हैं। पर नहीं, मुझे तो गाड़ी चलाने में मज़ा आता था न। मुंबई की सड़कों में गाड़ी चलाने का अलग ही मज़ा है। कहने को तो हम मुंबई में रहते हैं, पर चेम्बूर कोई खास जगह नहीं है। 1 BHK का मकान है, वो भी पहली मंज़िल पर। वो मेरी सैलरी इतनी नहीं है न कि हम लोग कोई अच्छा मकान ले सकें। खुशबू ने तो बहुत बार बोला कि लोन ले लेते हैं, पर फिर हमें अपने होने वाले बच्चे का भी तो सोचना था ना।
हाँ, मैंने शायद यह बताया नहीं, खुशबू माँ बनने वाली है। बहुत खुश लग रही थी वो तैयार होते वक्त। मुझे मालूम था कि उसको तैयार होने में वक्त लगता है, इसलिए मैंने उसे बताया नहीं और तैयार होकर बाजू वाले मिश्रा जी की पान की दुकान में चला गया। मिश्रा जी बहुत सीधे-सादे व्यक्ति हैं। मैं उनकी दुकान पिछले 1 साल से जा रहा हूँ। मैं हमेशा जाकर अपने लिए कम तम्बाखू वाला, कम ज़र्दे वाला पान बनवाता था। मिश्रा जी अब हर बार मेरे लिए पान बनाकर रखते हैं। जब भी मैं उनकी दुकान के सामने से गुज़रता हूँ, 2 मिनट रुककर पान ज़रूर खाया करता हूँ। खुशबू ने बहुत बार बोला कि पान खाना बंद कर दो, उसको पसंद नहीं था मेरा पान खाना शायद। मैंने कोशिश बहुत की, पर पान के बिना मुझसे रहा नहीं जाता।
20 मिनट हो चले थे, खुशबू तैयार हो गई होगी शायद, मैंने सोचा और मैं घर चला गया खुशबू को लेने। मैंने अपनी स्कूटर बाहर ही निकाल कर रख ली थी ताकि हम लेट ना हो जाएँ। खुशबू को लेट होना बिल्कुल पसंद नहीं है। खुशबू को मैंने आवाज़ लगाई और वो बाहर आई। पीली साड़ी पहने हुए बहुत कमाल लग रही थी मेरी खुशबू। ये वही साड़ी थी जो मैंने उसको उसके 25वें जन्मदिन पर लेकर दी थी 1 साल पहले।
हम अब तैयार थे जाने के लिए। खुशबू मेरे पीछे बैठ गई थी, मेरे कंधों पर हाथ रखकर—हाँ, ये एक और वजह थी जिसके कारण मैं स्कूटर पर जाना चाहता था। हम लोग होटल पहुँचे। बहुत बड़ा होटल नहीं था, पर मेरी सैलरी में हम इतने ही बड़े होटल में जा सकते थे। मैंने स्कूटर बाहर ही खड़ी कर दी। मैंने वॉचमैन से पूछ लिया था पहले कि कोई प्रॉब्लम तो नहीं होगी ना, क्योंकि आजकल BMC वाले किसी की भी गाड़ी उठाकर ले जाते हैं। परसों ही मेरे ऑफिस में काम करने वाले गुप्ता जी की गाड़ी ले गए थे, फिर उन्हें 2-3 चक्कर लगाने पड़े, तब वापस मिली थी उनको।
खैर हम लोग, मैं और खुशबू, होटल के अंदर गए। हमें एक टेबल खाली दिखी तो हम उस पर बैठ गए। टेबल ज़्यादा बड़ी नहीं थी, पर ज़्यादा छोटी भी नहीं थी। वेटर ने मेनू कार्ड लाकर दिया, हम लोगों ने सबका रेट देखकर, एक पनीर मसाला और 2 बटर रोटियाँ ऑर्डर कीं। खाना आने में कुछ वक्त लगा, यही कोई 15 मिनट। तब तक मैं और खुशबू अपने बच्चे के स्कूल, उसकी देखरेख के बारे में बात कर रहे थे। खाना अच्छा था। मैंने तो पेट भरकर 3 रोटियाँ खाईं, खुशबू ने भी करीब 2 रोटियाँ खाई होंगी। बिल देकर हम लोग सीधे घर वापस आए। मैंने स्कूटर हमारी बिल्डिंग के दरवाज़े के सामने रोकी। सोसाइटी के बच्चे खेल रहे थे। उनकी गर्मी की छुट्टियाँ चल रही हैं ना, इसलिए इतने बजे तक जाग रहे थे सब, वरना 8 बजे के बाद कोई दिखता ही नहीं था सोसाइटी में।
मैंने खुशबू को ऊपर भेज दिया कि तुम जाओ ऊपर, कपड़े-वपड़े चेंज कर लो, तब तक मैं आता हूँ। मैंने सोचा अगर मिश्रा जी की दुकान खुली होगी तो एक पान बनवा लेंगे, रात में काम आएगा। पर 10 बज चुके थे और मिश्रा जी दुकान बंद ही कर रहे थे। मुझे देखकर उन्होंने तुरंत मेरा वाला पान बनाया और मुझे दे दिया। पान लेकर मैं वापस घर आ गया। किचन में जाकर पानी पिया मैंने पहले, बहुत प्यास लगी थी, गला भी बहुत सूख रहा था। खुशबू अंदर थी, कपड़े बदल रही थी—मैं अंदर वाले कमरे में गया। वो अपनी साड़ी उतार चुकी थी और अपने रात के कपड़े पहन रही थी। बिना कपड़ों के तो और भी खूबसूरत लगती है मेरी खुशबू। मैं उसके पास गया। वो बस रात के कपड़े पहन ही चुकी थी। किचन से आते वक्त मैंने एक चाकू उठा लिया था। मैं खुशबू के और पास गया और मैंने उसके गले में चाकू मार दिया। वो चीख भी नहीं पाई, हाँ उसने मेरा हाथ ज़रूर पकड़ा था। ठंडे थे बहुत उसके हाथ, शायद कुछ ठंडी चीज़ छुई होगी उसने। हाँ, शायद चूड़ी या कोई कंगन।
वो कुछ बोल पाती, उससे पहले वो नीचे गिर गई। गिरी वो पीठ के बल थी, तो चाकू उसके गले के और अंदर घुस गया।
5 मिनट मैं वहीं खड़ा रहा। खुशबू को देखता रहा। बहुत खूबसूरत लग रही थी मेरी खुशबू। रात के कपड़ों में। मुझे अभी भी याद है, कई बार इन्हीं कपड़ों में हम लोगों ने सेक्स किया था। पर गलती खुशबू की ही थी ना, क्या ज़रूरत थी किसी और के साथ सेक्स करने की? मुझे बताती, हम लोग साथ में मामला सॉर्ट करते न।
उस दिन मैं जल्दी घर आ गया था, सोचा था खुशबू को सरप्राइज़ दूँगा। उसके लिए मैंने एक हार जो खरीदा था। पूरे 6 हज़ार का था वो हार। जो पिछले महीने हम लोग देखकर आए थे। मैंने सोचा होली का बोनस मिलेगा तो मैं अपनी खुशबू के लिए ये वाला हार ले लूँगा। जब घर पहुँचा तो खुशबू कहीं जा रही थी। वैसे तो वो कहीं जाती नहीं है मुझे बिना बताए। मुझे लगा पास वाली मुनमुन आंटी के पास जा रही होगी बैठने, मैं घर पर ही उसका इंतज़ार करता हूँ। पर उसने वहाँ से एक ऑटो किया। मुनमुन आंटी का घर तो बहुत पास है, वहाँ के लिए ऑटो की क्या ज़रूरत थी? मैंने सोचा कि मैं खुशबू का पीछा करूँ। मुझे भरोसा था अपनी खुशबू पर पूरा, पर फिर भी दिल नहीं माना, सो मैं अपनी स्कूटर लेकर खुशबू के पीछे हो लिया।
ऑटो जाकर एक जगह रुकी, वहाँ से एक लड़का बाहर आया। वो हरीश था—जिसको खुशबू ने अपना भाई बताया था। हमारे घर भी आया था वो 1-2 बार, साथ में खाना भी खाया था। भिंडी की सब्ज़ी। मेरी खुशबू भिंडी की सब्ज़ी बहुत अच्छी बनाती थी। खुशबू उस लड़के के साथ अंदर गई। मैं भी पीछे गया। बिल्डिंग नहीं थी वो, कुछ एक-दो घर थे बस आस-पास। वो दोनों एक कमरे में गए और दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। बाजू में एक खिड़की भी थी, हालाँकि वो भी बंद थी पर उसका काँच टूटा हुआ था। मैंने अंदर खिड़की से देखा तो वो लड़का मेरी खुशबू के कपड़े उतार रहा था और खुशबू उसके। कुछ देर बाद दोनों एक-दूसरे के सामने बिना कपड़ों के खड़े थे।
उसने मेरी खुशबू को बिस्तर पर लिटाया और उसके ऊपर लेट गया। मैं इसके आगे नहीं देख सका तो मैं वहाँ से घर वापस आ गया। हाँ, बीच में मिश्रा जी की दुकान में रुककर एक कम तम्बाखू, कम ज़र्दे वाला पान लेकर ज़रूर खाया। घर पहुँचकर मैंने अपने लिए मटके से पानी लिया। प्यास बहुत लगी थी। पानी लेकर मैं कमरे में गया। मैंने अलमारी की चाबी ऊपर वाले रैक से उठाई और अलमारी खोली। मैंने खुशबू के कुछ कपड़े उठाकर देखे तो डॉक्टर की एक रिपोर्ट पर मेरी नज़र गई। मैंने रिपोर्ट को देखा खोलकर तो उसमें लिखा था कि खुशबू माँ बनने वाली है—और बच्चा हरीश का है।
खून बहुत बह गया था, अब खुशबू हिल भी नहीं रही थी। मैंने खुशबू को उठाया और उसको बिस्तर पर लिटाया। उसके बाजू में मैं भी लेट गया। बहुत खूबसूरत है मेरी खुशबू। मैंने घड़ी देखी—2 बज चुके थे, फिर मैं भी सो गया। मुझे सुबह ऑफिस जाना था ना—7 बजे। बहुत दूर है मेरा ऑफिस, दादर में—कल लोकल ट्रेन से जाऊँगा मैं, इसलिए स्कूटर मैंने अंदर पार्किंग में खड़ी की थी आज। हाँ, सोने से पहले मैंने मिश्रा जी का दिया हुआ पान ज़रूर खाया। बहुत अच्छा पान बनाते हैं मिश्रा जी।

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