Raat ka Shikaar

Thriller
Apr 21, 2025
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शाम का वक्त था और बाहर बारिश हो रही थी,

बारिश की बूंदे खूब जोरों से बरस रही थीं और साथ ही ठंडी हवाएं इस मौसम को और भी सुहाना बना रही थीं।

इस सुहाने मौसम में आरुषि सज-संवर कर एक कॉफी शॉप में किसी के आने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी।

कई देर तक वो इंतजार भरी निगाहों से कॉफी शॉप के मेन गेट की तरफ बार-बार देख रही थी, जब भी कोई शख्स मेन गेट से अंदर बढ़ता आरुषि की दिल की धड़कनें अपने आप बढ़ने लग जातीं मगर जब भी वो हर आते शख्स की तरफ देखती तो उसे सिर्फ निराशा ही हाथ लगती।

इंतेज़ार में आहे भरती हुई आरुषि अब अपने फोन की स्क्रीन पर देखने लगी, तेज़ बारिश के कारण नेटवर्क काम नहीं कर रहा था

इंतज़ार करते-करते शाम से रात हो गई, मगर उसकी ना कोई झलक देखने को मिली और ना ही उसकी कोई खबर मिली।

लेकिन आरुषि इतनी जल्दी उम्मीद नहीं छोड़ना चाहती थी, दिल के किसी कोने में अभी भी उसके आने की थोड़ी उम्मीद बची थी।

रात के अब 12 बज गए थे कॉफी शॉप से सारे ग्राहक भी जा चुके थे अब उस कॉफी शॉप में सिर्फ आरुषि ही अकेली रह गई थी जो उस शख्स के इंतजार में अभी तक बैठी हुई थी।

यह वही शख्स था जिससे आरुषि कई महीनों से इंस्टाग्राम पर बात किया करती थी।

ना कभी उसका चेहरा देखा और ना कभी उसकी आवाज सुनी, बस आरुषि एक मयंक नाम के लड़के से प्यार कर बैठी थी, मैसेज पर उसकी लिखी हुई कविताओं पर और उसकी कुछ प्यार भरी बातों पर वो मर मिट बैठी थी।

इन कुछ महीनों में नाजाने मयंक ने ऐसा क्या किया जिससे मिलने के लिए आरुषि एक बार में ही राज़ी हो गई और उस से मिलने के इंतजार में आरुषि कॉफी शॉप में देर रात 12 बजे तक बैठी रही, मगर अब आरुषि का सब्र जवाब देने वाला था।

बारिश अब थम गई थी और बारिश के रुकते ही फोन में नेटवर्क आ चुका था।

आरुषि ने गुस्से भरे अंदाज में अपना फोन उठाया और मयंक को मैसेज में लिखा

"आखिर कहां रह गए तुम? मुझसे मिलने यहां आना भी है या मैं बेवकूफों की तरह तुम्हारे इंतजार में अभी तक बैठी हूं?"

यह लिख कर आरुषि ने मैसेज जैसे ही मयंक को भेजा, तभी नेटवर्क एक बार फिर गायब हो गया, जिससे आरुषि का पारा एक बार फिर चढ़ गया, मगर अगले पल कॉफी शॉप का मेन गेट एक हवा के साथ अपने आप आवाज करते हुए खुल गया, उस मेन गेट के खुलते ही आरुषि ने एक आस भरी नजर से उसी मेन गेट की तरफ देखा पर फिर से उसे निराशा ही मिली।

मगर अगले पल आरुषि ने अपने कंधे पर एक हाथ महसूस किया।

यह देखने के लिए वो जैसे ही पीछे पलटी तो उसने ब्लैक कोर्ट में एक लड़के को सामने पाया जो एकदम उसके पीछे खड़ा था। आरुषि ने उसकी तरफ देखते हुए सवाल में पूछा

"कौन हो तुम?"

वो शख्स आरुषि के सामने आकर बैठा और जवाब देते हुए कहा

"वही जिसका तुम इतनी देर से इंतजार कर रही थी।"

आरुषि ने कहा

"क्या तुम मयंक हो?"

उस शख्स ने कहा

"हां मैं तुम्हारा मयंक हूं, तुम्हें इतनी देर इंतजार कराने के लिए माफी चाहूंगा, दरअसल अनजान शहर में अकेले सफर करना इतना आसान नहीं था और साथ ही तेज बारिश की वजह से नेटवर्क भी काम नहीं कर रहा था इसलिए मुझे इतनी देर हो गई।"

कॉफी शॉप अब बंद होने वाली थी तभी मयंक ने आरुषि से कहा

"चलो तुम्हारे घर चलते हैं, मैं तुम्हारे हाथ की कॉफी पीना चाहूंगा।"

इस पर आरुषि कुछ देर सोच में पड़ गई।

आरुषि को यूं खामोश देखकर मयंक ने कहा

"क्या हुआ? क्या तुम मुझे अपने घर ले जाना नहीं चाहती?"

आरुषि ने जवाब में कहा

"नहीं, वो ऐसा नहीं है, दरअसल मेरे माता-पिता इस वक्त घर पर मेरा इंतजार कर रहे होंगे, उनका पहला सवाल तो यही होगा कि मैं इतनी देर रात तक कहां थी और मुझे तुम्हारे साथ देखकर उन्हें और भी ज्यादा अजीब लगेगा।"

इस पर मयंक ने कहा

"चिंता मत करो, कह देना कि रास्ते में तुम्हारे पीछे कुछ गुंडे पड़ गए थे तभी एक मयंक नाम का लड़का तुम्हें उन गुंडों से बचा कर तुम्हें घर तक छोड़ने आता है, इसी बहाने तुम्हारे माता-पिता भी यह सुनकर मेरा घर में अच्छे से स्वागत करेंगे।"

आरुषि को मयंक का यह सुलझाव काफी सही लगा।

आरुषि ने कहा

"ठीक है चलो फिर मैं तुम्हें अपने हाथ की कॉफी पिलाती हूं।

" यह कहकर दोनों पैदल ही खाली शांत रास्ते पर चलने लगे, क्योंकि रात अब काफी हो चुकी थी इस वक्त अब कोई भी ऑटो या टैक्सी मिलने की संभावना नहीं थी।

आरुषि और मयंक खाली सड़कों पर बातें करते हुए पैदल ही जा रहे थे।

एक साथ पैदल चलते हुए आरुषि बार-बार मयंक की आंखों में देख रही थी। मयंक की आंखों में ऐसी कुछ तो बात थी जिससे आरुषि उसकी तरफ खींची चली जा रही थी।

वो जो कुछ भी कहता या सुनाता, आरुषि उसकी हां में हां मिला देती, वो पहली बार किसी के प्रति इतना झुकाव महसूस कर रही थी।

थोड़ी देर बाद आरुषि और मयंक एक घर के सामने रुक जाते हैं। आरुषि को अब थोड़ा डर सा लग रहा था।

मयंक ने पूछा

"क्या हुआ? रुक क्यों गई?"

आरुषि ने कहा

"पहली बार मैं इतनी देर रात बाहर रही और जब सीधा अंदर बडूगी तो नाजाने मेरे माता-पिता कितने सवाल करेंगे मुझसे, बस उन्हीं सवालों से मुझे थोड़ा डर सा लग रहा है, अगर झूठ बोलते हुए पकड़ी गई तो फिर मुझे कभी घर के बाहर कदम रखने नहीं दिया जाएगा।"

इस पर मयंक ने अपना चेहरा आरुषि के चेहरे के पास लाते हुए कहा

"मेरी आंखों में देखो और अपना सारा डर भूल जाओ, मैं जो जैसा कहता हूं बस तुम वैसा करती जाओ।"

आरुषि एक बार फिर मयंक की आंखों में देखते हुए मयंक का हाथ थामकर घर के अंदर बढ़ने लगी।

घर के अंदर कदम रखते ही आरुषि के माता-पिता सवाल भरी नजरों से आरुषि को घूरने लगे, मगर इससे पहले वो लोग कुछ पूछ पाते, तभी मयंक सामने आ खड़ा हो गया।

आरुषि के पिता ने सवाल करते हुए पूछा

"तुम कौन हो? और मेरी बेटी के साथ क्या कर रहे हो?"

इस पर मयंक ने बात को संभालते हुए शांत लहजे में कहा

"शांत रहिए, कुछ भी कहने से पहले मेरी बात एक बार सुन लीजिए।

आते वक्त रास्ते में कुछ आवारा गुंडे आपकी बेटी आरुषि के पीछे पड़ गए थे, बड़ी मुश्किल से वो उन बदमाश लड़कों से पीछा छुड़ाकर रास्ते में अकेले भाग रही थी, बारिश भी काफी हो रही थी वो भीगते हुए बस भागे जा रही थी तभी उसका सामना मुझसे हो गया।

मैंने उसके चेहरे पर डर साफ देखा था, साथ ही यह भी देखा था कि वो आवारा गुंडे अभी तक आरुषि को ढूंढते हुए वापस आ रहे थे, तभी मैं आरुषि को कहीं दूर ले गया ताकि वो आरुषि तक पहुंच ना पाएं।

काफी देर रुकने के बाद वो गुंडे जा चुके थे और बारिश भी थम गई थी, फिर मैं इसे यहां घर छोड़ने आ गया, आप अपनी बेटी से नाराज ना रहिए, वो सुरक्षित घर लौट आई है।"

इतना कहकर मयंक वहां से जाने लगा, मगर आरुषि के पिता ने मयंक को रोकते हुए कहा

"तुमने मेरी बेटी की जान बचाई है, इतनी रात को अकेले जाना तुम्हारे लिए भी सही नहीं होगा, क्यों ना तुम आज रात यहीं ठहर जाओ!"

आरुषि और मयंक के चेहरे पर अब हल्की सी कुटिल मुस्कान आ जाती है।

मयंक ने भी रुकते हुए कहा

"ठीक है, जैसा आप कहें।"

आरुषि की मां ने मयंक से पूछा

"बेटा, कुछ लोगे? चाय पानी?"

मयंक ने एक नजर आरुषि की तरफ देखते हुए कहा

"जी, एक कप कॉफी चाहिए।"

और तभी आरुषि ने तुरंत उठते हुए कहा

"मैं कॉफी बना कर लाती हूं।"

आरुषि एक कुटिल मुस्कान लिए किचन में कॉफी बनाने चली गई, मगर अगले ही पल उसे अपनी गलती का एहसास भी होने लगा।

अपने माता-पिता से इस तरह झूठ बोलकर मयंक को घर पर लाकर कहीं मैं कोई गलती तो नहीं करने जा रही? कुछ इस तरह के सवाल अब आरुषि के मन में चल रहे थे।

कुछ ही देर में कॉफी बनकर तैयार हो जाती है।

आरुषि जैसे ही कप में कॉफी डालकर किचन से बाहर निकलने लगती है, तभी उसके फोन पर एक मैसेज आ जाता है।

आरुषि, किसी जरूरी कारण के मैं आज तुमसे मिलने कॉफी शॉप में नहीं आ पाया, हो सके तो मुझे माफ कर देना, अगली बार हम फिर मिलने का प्लान बनाएंगे।

यह मैसेज मयंक था।

इस मैसेज को पढ़कर मानो आरुषि के चेहरे का रंग उड़ गया हो। आरुषि ने उस मैसेज का जवाब देते हुए कहा

"क्या बक रहे हो तुम? तुम मुझे डराने की कोशिश कर रहे हो ना?"

इस पर मैसेज में मयंक का जवाब आया

"अरे मैं भला तुम्हें डराने की क्यों कोशिश करूंगा?"

आरुषि ने मैसेज में पूछा

"तुम इस वक्त कहां पर हो?"

मैसेज में मयंक का जवाब आया

"अपने शहर में और कहां? क्यों पूछ रही हो?"

आरुषि एक पल के लिए हैरान हो गई, उसने हैरान होते हुए सोचा

"हे भगवान, ये मैंने क्या कर दिया? किसको घर के अंदर ले आई मैं?"

आरुषि ने लिखते हुए मैसेज में कहा

"तुम मुझे अभी के अभी अपनी एक तस्वीर भेजो।"

इस पर मयंक का जवाब आया

"लेकिन क्यों? ऐसी क्या बात हो गई कि तुम मेरी तस्वीर देखना चाहती हो? तुम जानती हो मैं सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीर किसी को नहीं भेजता।"

आरुषि ने मैसेज में कहा

"देखो, बहुत हो गया तुम्हारा, मुझे अभी के अभी अपनी तस्वीर भेजो, वरना जिंदगी भर बात नहीं करूंगी।"

इतना लिखते ही अगले पल मयंक ने मैसेज में अपनी एक तस्वीर भेज दी।

उस तस्वीर को देखकर आरुषि के हाथ-पैर डर से वहीं जम गए। वो तस्वीर मयंक की थी, ना कि उस अनजान शख्स की जो इस वक्त उसके घर पर मौजूद था।

आरुषि ने यह भी गौर किया कि जब यह शख्स मयंक और मेरे रिश्ते के बारे में जान सकता है, तो नाजाने इसे मेरे बारे में और क्या-क्या पता नहीं होगा!

कुछ इसी तरह के सवाल आरुषि के रोंगटे खड़े कर रहे थे।

मगर आरुषि को इस वक्त खुद को संभालना था, वो हिम्मत करके जैसे ही किचन से बाहर निकलकर आती है तो उसके हाथ से कॉफी का कप छूटकर गिर जाता है और उसकी आंखें खौफ से भर जाती हैं।

आरुषि की आंखों के सामने उसके माता-पिता ज़िंदा लाश बनकर ज़मीन पर पड़े हुए थे, उन दोनों के गले से खून का कतरा ज़मीन पर बह रहा था, यह देखकर आरुषि खौफ से चीख पड़ी।

मगर उसके चीखते ही एक अनजान शख्स ने अचानक आरुषि को पीछे से जकड़ लिया और आरुषि के कान में हल्की आवाज़ में कहा

"डरो मत, वो अभी भी ज़िंदा है बस मैं खुद को रोक नहीं पाया और उनके गले पे अपने तीखे दांत से वार कर के अपनी खून की प्यास थोड़ी बुझा ली।"

इतना कहते ही आरुषि को अपने गले पर एक दर्द महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके गले पर दांत गाड़ दिए हों।

आरुषि खुद को छुड़ाते हुए उस शख्स की तरफ देखने लगी।

आरुषि के सामने खड़ा वो कोई आम शख्स नहीं था, बल्कि एक रक्त पिशाच था, एक वैम्पायर जो इंसानो के खून से अपनी प्यास भुजाता था, उसके होंटो के दोनों तरफ लंबे तीखे दांत दिख रहे थे और उसकी आंखें शरबत की तरह लाल थीं, उसके मुंह से खून की बूंदें टपक रही थीं, उसका हुलिया एक रक्त पिशाच में बदल गया था।

उसने आरुषि की तरफ शैतान भरी नज़र से देखते हुए कहा

"डरो मत मुझसे, मैं तुम्हें अपनी दुनिया में शामिल करने आया हूं, चलो मेरे साथ।"

आरुषि घबराते हुए अपने कमरे की तरफ दौड़ने लगी, मगर आरुषि जैसे ही अपने कमरे के दरवाजे तक पहुंच पाती, तभी वो रक्त पिशाच हवा की तेजी से आरुषि के सामने आ खड़ा हो गया।

आरुषि घबराते हुए पीछे की तरफ हुई, मगर वो रक्त पिशाच एक बार फिर हवा की तेजी से आरुषि के पीछे खड़ा हो गया और उसे पूरी तरह अपनी बाहों में जकड़ लिया।

आरुषि मदद के लिए चीख रही थी, लेकिन इस वक्त उसकी दर्द भरी पुकार सुनने वाला कोई मौजूद नहीं था, वो रक्त पिशाच आज किसी भी हालत में आरुषि को मारकर अपनी दुनिया में ले जाना चाहता था।

और कुछ ही पलों में उसने आरुषि के बदन से सारा खून पीकर आरुषि को मौत की नींद सुला दिया, और साथ ही आरुषि की आत्मा को कैद करके हमेशा-हमेशा के लिए अपनी दुनिया में ले गया था।

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