The Anger Room

लेखक की कलम से
“हम सब दिनभर मुस्कुराहट का मुखौटा पहनकर घूमते हैं... पर कभी सोचा है कि आपके अंदर का वो दबा हुआ गुस्सा, जिसे आप रोके बैठे हैं, अगर अचानक आज़ाद हो जाए... तो आप किस हद तक जा सकते हैं?
यह कोई आम कहानी नहीं है, बल्कि आपके अपने अंदर छिपे उस सबसे गहरे खौफ का आईना है।
— मयंक त्रिपाठी”
भाग 1: वजूद का कत्ल
खंड 1:
घुटन की पटरी और नौ-बाय-नौ का पिंजरा
सुबह के ठीक साढ़े आठ बजे थे। मुंबई की लोकल ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी, लेकिन पंकज को लगता था कि वह ट्रेन नहीं, बल्कि उसकी खुद की ज़िंदगी है, जो बिना किसी मंज़िल के बस घसीटी जा रही है। उमस इतनी थी कि साँस लेना दूभर था। डिब्बे में ठसाठस भरे मुसाफिरों के पसीने की गंध, उनके आपस में टकराते कंधे, और कोलाहल के बीच पंकज चुपचाप एक कोने में खड़ा था। उसका एक हाथ ऊपर की लोहे की रॉड को पकड़े हुए था, जो लगातार कंपन कर रही थी।
पंकज ने अपनी आँखें बंद कर लीं। बंद आँखों के पीछे उसे सिर्फ एक ही रंग दिखाई देता था—धुंधला स्लेटी (Gray)।
वह हर सुबह इसी तरह निकलता था। जब वह लोकल ट्रेन के दरवाज़े से बाहर झाँकता, तो उसे लगता कि अगर वह इस चलती ट्रेन से नीचे कूद जाए, तो शायद इस भीड़ को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लोग उसे कुचलते हुए आगे निकल जाएँगे। उसे अपनी नौकरी से नफरत थी, पर सच तो यह था कि उसे अपने वजूद से, अपनी इस काँपती हुई आवाज़ और रीढ़विहीन देह से कहीं ज़्यादा नफरत थी।
ठीक नौ बजे वह लोअर परेल के उस आलीशान, काँच से बने कॉर्पोरेट ऑफिस के सामने खड़ा था। बाहर से यह इमारत जितनी चमकीली थी, अंदर से पंकज के लिए उतनी ही दमघोंटू। वह अपने नौ-बाय-नौ के क्यूबिकल में जाकर बैठ गया। चारों तरफ कीबोर्ड की टर-टर और फोन की घंटियाँ बज रही थीं।
“पंकज! ओ पंकज!”
एक भारी, कर्कश आवाज़ हवा में तैरती हुई आई। पंकज का दिल एक पल के लिए रुक गया। यह विकास था। उसका मैनेजर।
विकास पचास साल के पार का एक ऐसा शख्स था, जिसके सिर पर बाल नहीं थे, लेकिन अहंकार कूट-कूटकर भरा था। वह दूसरों को जलील करने के मौके इस तरह ढूँढता था, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को खोजता है।
“हाँ सर...” पंकज अपनी सीट से खड़ा हुआ। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सा कंपन था, जो वह चाहकर भी नहीं रोक पाता था।
“ये पीपीटी तुमने बनाई है? ज़रा इधर आना,” विकास ने अपने केबिन से चिल्लाकर कहा।
पंकज भारी कदमों से विकास के केबिन की तरफ बढ़ा। पूरे फ्लोर के लोग चुप हो गए थे। सबको पता था कि अब तमाशा शुरू होने वाला है।
“ये क्या बकवास है?” विकास ने लैपटॉप की स्क्रीन पंकज की तरफ घुमाई। “मैंने तुम्हें क्लाइंट का डेटा ठीक से अलाइन करने को कहा था। ये तुमने क्या खिचड़ी पकाई है? तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है क्या पंकज? या साला बचपन में स्कूल नहीं गए थे?”
केबिन का दरवाज़ा खुला था। विकास की आवाज़ पूरे फ्लोर पर गूँज रही थी। पंकज के पीछे खड़े कुछ कलीग्स ने आपस में कानाफूसी की और दबी-दबी हँसी हँसने लगे।
“सर... वो डेटा शीट कल रात को ही अपडेट हुई थी, इसलिए...”
“मुँह बंद रखो अपना!” विकास ने टेबल पर हाथ मारकर चिल्लाया। “बहाने मत बनाओ। तुम जैसे निकम्मे लोगों की वजह से हमारी टीम का नाम खराब होता है। कामचोर कहीं के! अगर ढंग से काम नहीं करना, तो अपनी औकात समझो और यहाँ से दफा हो जाओ। कल सुबह मुझे ये पीपीटी बिल्कुल परफेक्ट चाहिए, वरना टर्मिनेशन लेटर हाथ में थमा दूँगा।”
पंकज चुपचाप खड़ा रहा। उसके कान गर्म हो चुके थे। उसकी मुट्ठियाँ उसकी पतलून की जेब के अंदर इतनी कस गई थीं कि उसके नाखून उसकी हथेलियों में चुभने लगे थे। उसका खून खौल रहा था। उसका मन कर रहा था कि वह सामने रखे काँच के भारी पेपरवेट को उठाए और पूरी ताकत से विकास के उस गंजे सिर पर दे मारे। लेकिन वह कुछ नहीं कर सका। उसका शरीर काँप रहा था, और उसकी नजरें ज़मीन पर जमी थीं।
“जाओ अब! शक्ल मत दिखाओ अपनी यहाँ,” विकास ने हाथ से इशारा करते हुए कहा।
पंकज वापस अपने क्यूबिकल में आकर बैठ गया। उसकी आँखों के कोने गीले थे, लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया। वह अपनी स्क्रीन को घूरता रहा, जहाँ शब्द अब धुँधले दिखाई दे रहे थे।
खंड 2:
अतीत का कोड़ा
शाम के सात बजे जब पंकज ऑफिस से निकला, तो बारिश शुरू हो चुकी थी। वह छतरी खोले बिना ही सड़क पर चलने लगा। पानी की ठंडी बूँदें उसके गर्म चेहरे को छू रही थीं, लेकिन उसके अंदर की आग शांत नहीं हो रही थी।
रास्ते में एक छोटा-सा पार्क था। पंकज वहाँ थोड़ी देर के लिए रुका। कुछ बच्चे बारिश में कीचड़ में फुटबॉल खेल रहे थे। वे हँस रहे थे, चिल्ला रहे थे। उनके चेहरे पर एक ऐसी बेफिक्री थी जो पंकज ने अपनी ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं की थी। उन्हें देखकर पंकज के होंठों पर एक बहुत ही फीकी, दर्दनाक मुस्कान आई।
लेकिन अगले ही पल, जैसे ही उसे अपने अकेलेपन का अहसास हुआ, वह मुस्कान गायब हो गई।
उसका इस पूरी दुनिया में कोई नहीं था। उसकी माँ तब गुज़र गई थीं जब वह केवल सात साल का था। उसे माँ का चेहरा भी ठीक से याद नहीं था, बस उनकी लोरी की एक धुँधली-सी धुन उसके ज़हन में बची थी। माँ के जाने के बाद, उसके पिता ने घर को एक जेल बना दिया था।
उसके पिता एक बेहद सख्त, क्रूर और गुस्सैल इंसान थे। उनके लिए ‘अनुशासन’ का मतलब था—पिटाई और डर।
“चुप रहो! रोना बंद करो!” जब भी छोटा पंकज अपनी माँ को याद करके रोता, उसके पिता की भारी बेल्ट उसकी पीठ पर बरस पड़ती थी।
“अगर दोबारा चिल्लाए, तो कमरे में बंद कर दूँगा!”
उस खौफ ने पंकज के अंदर के स्वाभाविक गुस्से और भावनाओं को एक गहरी, अंधेरी खाई में धकेल दिया था। बचपन से ही उसे सिखाया गया था कि अपनी आवाज़ को दबाकर रखना ही जीवित रहने का एकमात्र तरीका है। नतीजा यह हुआ कि वह अंदर से एक दहकता हुआ कोयला बन गया था, लेकिन बाहर से वह एक रीढ़विहीन, डरा हुआ और हमेशा सिर झुकाकर चलने वाला इंसान था।
पंकज पार्क से आगे बढ़ा। पैर घसीटते हुए वह अपने घर के रास्ते पर जा रहा था, जहाँ सिर्फ एक खाली कमरा, सीलन की गंध और सन्नाटा उसका इंतज़ार कर रहा था।
खंड 3:
द बैडएस कैफे — ‘किल योर एंगर’
तभी उसकी नज़र गली के कोने पर बनी एक नई दुकान पर पड़ी। उस अंधेरी, सँकरी गली में वह दुकान किसी लाल अंगारे की तरह चमक रही थी। काले रंग के शटर के ऊपर एक बड़ा-सा चमकीला लाल नीयन साइनबोर्ड लगा था: ‘The Badass Cafe’। और उसके ठीक नीचे, थोड़े छोटे लेकिन साफ़ अक्षरों में लिखा था—‘Kill Your Anger’।
पंकज के कदम अपने आप रुक गए। ‘अपना गुस्सा मारो’... क्या वाकई ऐसा कुछ मुमकिन था?
वह झिझकते हुए आगे बढ़ा और कैफे का भारी काँच का दरवाज़ा धकेला। अंदर कदम रखते ही एक अजीब-सा सन्नाटा और धीमी, पीली-लाल लाइटिंग ने उसका स्वागत किया। कैफे के अंदर ज़्यादा लोग नहीं थे, बस एक-दो लोग चुपचाप कोने में बैठे कॉफी पी रहे थे। काउंटर पर एक नौजवान लड़का खड़ा था, जिसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी।
“वेलकम सर। हाउ मे आई हेल्प यू?” लड़के ने बहुत ही तमीज़ से पूछा।
पंकज ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ बाहर की तरफ इशारा किया, “वो... बाहर जो बोर्ड लगा है... ‘किल योर एंगर’... उसका क्या मतलब है?”
लड़के की मुस्कान थोड़ी और गहरी हो गई। “ओह, सर! आप हमारे ‘रेज रूम’ (Rage Room) के बारे में पूछ रहे हैं। यह एक ऐसी जगह है जहाँ लोग अपने अंदर का सारा तनाव, गुस्सा और फ्रस्ट्रेशन बाहर निकाल सकते हैं। बहुत ही सिंपल है—आप एक कूपन लेंगे, हम आपको सेफ्टी गियर और एक मजबूत डंडा देंगे। अंदर एक पूरी तरह से साउंडप्रूफ कमरा है, जिसमें पुरानी चीजें, जैसे काँच की बोतलें, पुराने कंप्यूटर मॉनिटर, कीबोर्ड, टीवी और बहुत कुछ रखा है। आपको जो तोड़ना है तोड़िए, जितना चिल्लाना है चिल्लाइए। अपनी सारी भड़ास वहीं छोड़ आइए।”
पंकज ने ऐसा कभी नहीं सुना था। क्या कोई सचमुच बिना किसी सज़ा के डर के, चीजें तोड़ सकता है?
“कितने का है कूपन?” पंकज ने पूछा।
“सिर्फ ₹500 सर। 15 मिनट का स्लॉट,” लड़के ने कहा।
पंकज ने थरथराते हाथों से अपने वॉलेट से ₹500 का नोट निकाला और काउंटर पर रख दिया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह कोई गैर-कानूनी ड्रग खरीदने जा रहा हो। उसका दिल बहुत तेज़ी से धड़क रहा था।
खंड 4:
अंधेरे में पहली चीख
लड़के ने पंकज को एक भारी वेंटिलेटेड हेलमेट, चेहरे को ढकने वाला शील्ड, एक मोटी सुरक्षात्मक जैकेट और हाथ में एक भारी लकड़ी का बेसबॉल बैट थमा दिया।
“कमरा नंबर 3, सर। ऑल द बेस्ट,” लड़के ने इशारा किया।
पंकज ने कमरा नंबर 3 का भारी, साउंडप्रूफ दरवाज़ा धकेला और अंदर चला गया। दरवाज़ा पीछे से एक भारी आवाज़ के साथ बंद हो गया।
कमरा पूरी तरह से अंधेरा था, सिवाय कुछ नीली और लाल रंग की स्ट्रिप लाइट्स के, जो कोनों में टिमटिमा रही थीं। इस रोशनी ने कमरे को एक अजीब, साइकेडेलिक और डरावना लुक दे दिया था। कोने में लगे बड़े-बड़े स्पीकरों से एक बहुत ही धीमी, भारी आवाज़ में एक मोटिवेशनल और आक्रामक बैकग्राउंड ट्यून गूँज रही थी, जिसमें हल्की ड्रमबीट्स थीं—जो धीरे-धीरे खून की रफ़्तार बढ़ा रही थीं।
कमरे के बीचों-बीच एक पुराना, धूल से भरा हुआ भारी कंप्यूटर मॉनिटर रखा था। उसके बगल में कई सारी खाली काँच की बोतलें और एक सिंक था।
पंकज कमरे के बीच में खड़ा हो गया। उसके दोनों हाथों ने बेसबॉल बैट को इतनी कसकर पकड़ रखा था कि उसकी उँगलियाँ सफेद पड़ गई थीं। वह करीब पाँच मिनट तक बस वैसे ही खड़ा रहा।
उसका संकोच, उसका डर, और बचपन से सीखी गई ‘भद्रता’ उसे रोक रही थी।
‘मैं ये क्या कर रहा हूँ? मैं पागल हो गया हूँ क्या? मुझे घर चले जाना चाहिए,’ उसने सोचा।
तभी उसके कानों में अचानक विकास की वो कर्कश आवाज़ गूँज उठी—“तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है क्या पंकज? अपनी औकात समझो!”
और फिर... उसके पिता का वो गुस्से से लाल चेहरा... और बेल्ट के चलने की सरसराहट...
पंकज के दिमाग के अंदर जैसे कोई नस फट गई। उसके पूरे शरीर में एक गर्म लहर दौड़ी।
“अहहहहहह!!!”
एक ऐसी चीख पंकज के गले से निकली जो उसने खुद कभी नहीं सुनी थी। यह किसी इंसान की नहीं, बल्कि एक आदमखोर जानवर की चीख थी।
उसने पूरी ताकत से बैट को हवा में लहराया और सीधे कंप्यूटर मॉनिटर के बीचों-बीच दे मारा।
CRASH!!!
काँच और प्लास्टिक के हजारों टुकड़े हवा में उड़कर लाल-नीली लाइटों के बीच चमकते हुए फर्श पर बिखर गए। वह आवाज़... वह टूटने की करारी आवाज़ पंकज के कानों में किसी दिव्य संगीत की तरह गूँजी।
“साले! कमीने!” पंकज चिल्लाया।
उसने दोबारा वार किया। फिर तीसरी बार। वह पागलों की तरह सिंक पर रखी बोतलों को एक-एक करके बैट से उड़ाने लगा। काँच के बिखरने की आवाज़ें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। वह चिल्ला रहा था, गालियाँ दे रहा था—वह गालियाँ जो उसने अपनी तीस साल की ज़िंदगी में कभी किसी को नहीं दी थीं।
उसका हेलमेट पसीने से भर चुका था। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वे दुःख के नहीं, बल्कि एक असीम, हिंसक खुशी के थे। उसने पूरे कमरे का सामान तहस-नहस कर दिया। वहाँ एक भी चीज़ साबुत नहीं बची थी।
जब वह रुका, तो उसकी साँसें किसी धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसका पूरा बदन काँप रहा था। उसने बैट को फर्श पर गिरा दिया और खुद भी वहीं घुटनों के बल बैठ गया।
उसने अपने हेलमेट को उतारा। ठंडी हवा उसके पसीने से भीगे चेहरे पर लगी। उसका दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था मानो सीना चीरकर बाहर आ जाएगा। लेकिन उस भारी थकान के बीच... पंकज को अपनी पूरी ज़िंदगी में पहली बार एक ऐसा सुकून महसूस हुआ जिसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता था।
ऐसा लगा मानो बरसों से उसकी छाती पर रखा कोई लोहे का पहाड़ अचानक गायब हो गया हो। उसे इस बर्बादी से, इस आवाज़ से, इस ताकत के अहसास से बेपनाह प्यार हो गया था।
खंड 5:
एडिक्शन और सन्नाटा
अगले दो हफ़्तों में पंकज पूरी तरह बदल गया। वह अब हर रोज़ शाम को सीधे ‘बैडएस कैफे’ जाता था। कैफे का स्टाफ अब उसे अच्छी तरह पहचानने लगा था। वह जैसे ही आता, काउंटर पर खड़ा लड़का बिना कुछ पूछे उसे कमरा नंबर 3 की चाबी और उसका पसंदीदा भारी बैट थमा देता।
पंकज के लिए यह एक डेली रूटीन बन गया था। ऑफिस में विकास उस पर जितना चिल्लाता, पंकज शाम को उतनी ही बेरहमी से चीजें तोड़ता। वह अब अपनी इस भड़ास का, इस ‘हाई’ (नशे) का आदी हो चुका था। यह उसका ड्रग बन चुका था। जब वह चीजें तोड़ता, तो उसे लगता कि वह कंप्यूटर या बोतलें नहीं, बल्कि विकास का सिर और अपने पिता का घमंड तोड़ रहा है।
लेकिन, जैसा कि कहा जाता है—खूबसूरत और सुकून देने वाली चीजें इस बेरहम दुनिया में ज़्यादा दिन नहीं टिकतीं।
एक शनिवार की शाम, जब पंकज भारी और उत्सुक कदमों से कैफे की तरफ बढ़ा, तो गली में हमेशा की तरह वो लाल-नीला बोर्ड नहीं जल रहा था। वहाँ सन्नाटा था।
पंकज के कदम ठिठक गए। उसने पास जाकर देखा—कैफे के शटर पर एक बड़ा-सा ताला लटका हुआ था, और उसके ऊपर पुलिस की लाल पट्टी और एक सीलिंग नोटिस चिपका हुआ था। आस-पड़ोस के लोगों ने शोर, बिखरते कचरे और देर रात की एक्टिविटीज़ की शिकायत की थी, जिसके कारण कोर्ट के आदेश पर कैफे को सील कर दिया गया था।
पंकज वहीं जम गया। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी चलती हुई साँसों के बीच में से हवा खींच ली हो।
उसका पूरा बदन काँपने लगा। माथे पर ठंडा पसीना आ गया। उसने घबराकर शटर को पीटना शुरू किया, “खोलो! कोई है अंदर? खोलो इसे!” लेकिन कोई जवाब नहीं आया। उसका वह इकलौता जरिया, जिसके दम पर वह अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी जी पा रहा था, हमेशा के लिए बंद हो चुका था।
वह भागता हुआ अपने कमरे पर आया। उस रात उसने अपनी ज़िंदगी में पहली बार बेतहाशा शराब पी। उसने सिगरेट के कई कश लगाए। उसके अंदर का दानव, जिसे वह रोज़ थोड़ा-थोड़ा खाना खिलाकर शांत रखता था, अब भूखा था और बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा था।
वह दो दिन तक ऑफिस नहीं गया। बिस्तर पर पड़ा रहा। उसका फोन लगातार बज रहा था, शायद ऑफिस से कॉल थे, लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। वह बस अंधेरे कमरे में बैठकर छत को घूरता रहा। उसका गुस्सा अब दोगुना हो चुका था, लेकिन उसके पिता की दी हुई बचपन की कायरता उसे कोई एक्शन लेने से रोक रही थी।
वह बस अंदर ही अंदर खौल रहा था।
खंड 6:
पहली बलि — पुल पर खौफनाक रात
तीसरा दिन रविवार का था। पंकज दो दिन बाद अपने कमरे से बाहर निकला था। शाम के वक्त वह एक वाइन शॉप से शराब की कुछ बोतलें पैक करवाकर बाहर आ रहा था, तभी नियति ने उसके साथ सबसे घिनौना मज़ाक किया।
“अरे! पंकज! साले हरामखोर!”
एक जानी-पहचानी, कर्कश आवाज़ ने उसे पीछे से पुकारा।
पंकज ने मुड़कर देखा। वाइन शॉप के ठीक बाहर खड़ी एक चमकीली कार का दरवाज़ा खुला था और वहाँ से विकास उतर रहा था। विकास के पैर लड़खड़ा रहे थे, वह पहले से ही काफी नशे में था। पंकज को देखते ही उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
“दो दिन से ऑफिस क्यों नहीं आ रहा है बे?” विकास ने सरेआम सड़क पर चिल्लाना शुरू किया। वहाँ खड़े दर्जनों लोग उनकी तरफ देखने लगे। “तेरा बाप आकर काम करेगा वहाँ? फोन क्यों नहीं उठा रहा साले? औकात क्या है तेरी? कल ऑफिस आना, तेरा टर्मिनेशन लेटर तैयार रखता हूँ। भीख मंगा कहीं का!”
पंकज का सिर चकराने लगा। विकास के मुँह से निकलती गालियाँ... उसके पिता की पुरानी डाँट... कैफे का बंद शटर... लाल-नीली लाइट्स... सब कुछ उसके दिमाग के अंदर एक बवंडर की तरह घूमने लगा।
लेकिन इस बार, कुछ अलग था।
इस बार पंकज की आँखें झुकी नहीं थीं। उसकी आँखों में एक अजीब-सा, हिंसक नशा उतर आया था। उसकी भौहें तन गईं और उसके होंठों पर एक डरावनी, ठंडी मुस्कान तैर गई। उसने विकास को कोई जवाब नहीं दिया, बस अपना बैग संभाला और चुपचाप वहाँ से आगे बढ़ गया।
लेकिन इस बार वह भागा नहीं था। उसने फैसला कर लिया था।
पंकज ने कुछ दूरी पर रुककर विकास की कार का पीछा करना शुरू किया। विकास नशे में था, इसलिए वह कार बहुत धीरे चला रहा था। करीब बीस मिनट बाद, विकास ने अपनी कार शहर के बाहरी इलाके में बन रहे एक सुनसान, निर्माणाधीन पुल के पास रोकी। चारों तरफ अंधेरा था और सन्नाटा पसरा था। सिर्फ दूर से समंदर की लहरों की भारी आवाज़ आ रही थी।
विकास कार से उतरा और पुल की रेलिंग के पास जाकर खड़ा हो गया। शायद वह हवा खाने या पेशाब करने रुका था।
तभी उसे अपने पीछे किसी के जूतों की आहट सुनाई दी।
“कौन है बे?” विकास ने लड़खड़ाते हुए पीछे मुड़कर देखा।
अंधेरे में पंकज खड़ा था। उसकी आँखों में वो खौफनाक चमक थी जो उसने कभी खुद शीशे में नहीं देखी थी। और उसके दाहिने हाथ में था—लोहे की एक भारी रॉड, जो उसने रास्ते में कंस्ट्रक्शन साइट से उठाई थी।
“पंकज? तू... तू यहाँ क्या कर रहा है साले...”
SATAANK!!!
विकास अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि पंकज ने पूरी ताकत से लोहे की रॉड विकास के जबड़े पर मार दी।
एक करारी आवाज़ के साथ विकास के मुँह से खून का फव्वारा छूटा और वह सीधे ज़मीन पर जा गिरा। उसका चश्मा टूटकर दूर जा गिरा।
“औकात... औकात क्या है मेरी? हाँ?” पंकज ने फुसफुसाते हुए कहा, और फिर पूरी ताकत से दूसरा वार विकास के सिर पर किया।
CRACK!!!
हड्डी टूटने की एक तीखी आवाज़ आई। विकास दर्द से छटपटाने लगा। वह अपनी जान की भीख माँगने लगा, “पंकज... मत मारो... प्लीज...”
“कल ऑफिस आ... तेरा टर्मिनेशन लेटर तैयार रखता हूँ!” पंकज ने वही संवाद दोहराया जो विकास ने वाइन शॉप पर बोला था। उसका चेहरा पूरी तरह से खून के छींटों से भर चुका था।
उसने बिना रुके एक के बाद एक कई वार विकास के सिर और चेहरे पर किए।
Sataank! Sataank! Sataank!
वह तब तक मारता रहा, जब तक विकास का शरीर पूरी तरह से शांत नहीं हो गया और उसका चेहरा पहचानने लायक नहीं बचा।
पंकज हाँफ रहा था। उसकी साँसें बहुत तेज़ थीं। उसने लोहे की रॉड को नीचे गिराया और आसमान की तरफ देखकर पूरी ताकत से चिल्लाया। यह चीख डर की नहीं थी, यह एक परम आनंद और आज़ादी की चीख थी।
उसे आज समझ आया कि कैफे का वह ‘रेज रूम’ तो बस एक खिलौना था। असली सुकून तो इस जिंदा चीज़ को हमेशा के लिए शांत करने में था। उसका बचपन का सारा डर, उसकी कायरता उस रात हमेशा के लिए समंदर की लहरों में बह गई।
पंकज ने पूरी सावधानी से विकास की भारी लाश को घसीटा और पुल की रेलिंग के ऊपर से नीचे उफनते हुए समंदर में फेंक दिया।
CHHAPAAK!
लाश अंधेरे पानी में गायब हो गई। उसने विकास का फोन निकाला, अपनी बाइक उठाई और वहाँ से सीधे हाइवे की तरफ निकल गया। करीब 50 किलोमीटर दूर जाकर उसने वो फोन एक चलते हुए ट्रक के पीछे फेंक दिया, ताकि पुलिस को लोकेशन का अंदाज़ा न लग सके।
खंड 7:
एक नए साइको का जन्म
अगली सुबह, पंकज ठीक नौ बजे ऑफिस में अपने क्यूबिकल पर बैठा था। उसका चेहरा बिल्कुल साफ़ था। उसके चेहरे पर एक अजीब-सा सुकून और नूर था, जैसे वह कई सालों की नींद के बाद आज पहली बार सोकर उठा हो।
चाय की टपरी पर बैठकर उसने सबसे पहले अखबार खोला। वह बहुत उत्सुकता से पन्नों को पलट रहा था, यह देखने के लिए कि विकास की मौत की खबर छपी है या नहीं। लेकिन पूरे अखबार में कहीं कुछ नहीं था।
पंकज ने चाय की एक लंबी चुस्की ली और धीरे से मुस्कुराया।
उसे पता था कि पुलिस को न तो कभी कोई सबूत मिलेगा, और न ही लाश। उसके अंदर का वह दबा हुआ, रोता हुआ लड़का अब हमेशा के लिए मर चुका था।
अब वहाँ सिर्फ एक शिकारी बचा था... और यह तो बस शुरुआत थी।
सवाल...
एक बेहद शांत और बेबस इंसान जब इस हद तक खौफनाक बन जाए... तो इसके लिए आखिर किसे गुनहगार ठहराया जाए?
उस पिता को, जिसकी हिंसक परवरिश ने उसके अंदर के मासूम बच्चे का गला घोंट दिया?
या इस समाज और उसके कलीग्स को, जिन्होंने उसकी खामोशी का फायदा उठाकर उसे हमेशा ‘बुली’ किया?
या फिर उसका वो जानलेवा अकेलापन... जिसकी बंद दीवारों में उसका कोई एक सच्चा दोस्त तक नहीं था?
अगर इनमें से कोई एक चीज़ भी पंकज को मिल जाती—थोड़ा-सा प्यार, एक समझदार साथी, या कोई एक दोस्त जो उसकी खामोशी सुन पाता... तो क्या आज पंकज एक आम इंसान की तरह अपनी ज़िंदगी जी रहा होता?
क्या होता अगर...
आगे जारी है... धन्यवाद 🙏
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