आखिरी छतरी

बारिश का मौसम था। एक छोटे शहर की सड़क पर रोज़ एक बुज़ुर्ग आदमी बस स्टॉप के पास खड़ा रहता था। उसके हाथ में हमेशा एक पुरानी-सी काली छतरी होती।
लोग अक्सर सोचते, “शायद बस का इंतज़ार करता होगा।”
एक दिन तेज़ बारिश हो रही थी। एक छोटी बच्ची स्कूल से लौट रही थी। उसके पास छतरी नहीं थी। वह सड़क के किनारे खड़ी होकर बारिश रुकने का इंतज़ार करने लगी।
तभी वह बुज़ुर्ग आदमी उसके पास गया और अपनी छतरी बच्ची के हाथ में देते हुए बोला,
“बेटा, तुम घर चली जाओ।”
बच्ची ने पूछा, “लेकिन आप?”
वह मुस्कुराया,
“मैं तो रोज़ बारिश में भीगता हूँ।”
बच्ची छतरी लेकर चली गई।
अगले दिन बच्ची अपने पिता के साथ उस बुज़ुर्ग को ढूँढ़ते हुए आई। उसके हाथ में एक नई छतरी थी।
उसने कहा,
“दादाजी, कल आपने मुझे बारिश से बचाया था। आज मैं चाहती हूँ कि आप बारिश में न भीगें।”
बुज़ुर्ग की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने छतरी लेते हुए कहा,
“बेटा, मैंने तुम्हें सिर्फ एक छतरी दी थी… लेकिन तुमने मुझे एहसास दिलाया कि अच्छाई कभी बेकार नहीं जाती।”
सीख:
हमारे छोटे-से अच्छे काम का असर हमें तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन वह किसी की ज़िंदगी में उम्मीद बनकर लौट सकता है।
कभी-कभी दुनिया बदलने के लिए बहुत बड़ा काम नहीं, बस एक छोटी-सी मदद काफ़ी होती है।
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