उलझी निगाहें, बिखरे बाल

कहते हैं...
हर कहानी की शुरुआत किसी मुलाक़ात से होती है।
कभी मुस्कुराकर...
कभी अनजाने में...
कभी बिना नाम पूछे...
और कभी बिना यह जाने कि सामने वाला...
एक दिन पूरी ज़िंदगी बन जाएगा।
मैं उससे यूँ ही मिला था...
न कोई वजह थी,
न कोई परिचय।
बस एक दिन...
वो अपनी सीट से उठकर चली गई,
और मैं वहीं खड़ा रह गया,
उस जगह को देखते हुए जहाँ कुछ पल पहले वो बैठी थी।
उसने पलटकर यह भी नहीं कहा,
"रुको, आती हूँ..."
लेकिन मैं...
न जाने क्यों,
उसी जगह उसके लौटने का इंतज़ार करने लगा।
शायद वहीं से मेरी कहानी शुरू हुई थी।
उस दिन उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं,
पर मैंने उसे देख लिया था...
उसकी उलझी हुई निगाहें...
बिखरे हुए घुँघराले बाल...
चेहरे पर गुस्सा...
और आँखों में जाने कितनी कहानियाँ।
लोग कहते हैं,
पहली नज़र का प्यार फिल्मों में होता है।
मुझे नहीं पता वो प्यार था या नहीं,
लेकिन इतना ज़रूर था...
कि उस दिन के बाद मेरी नज़रें उसे ढूँढ़ने लगी थीं।
स्कूल के दिनों में बहुत लोगों ने किसी-न-किसी से दिल लगाया होगा,
लेकिन मेरी दीवानगी शायद उनसे थोड़ी अलग थी।
वो लड़की...
पूरे स्कूल का तूफ़ान थी।
कभी भागती हुई...
कभी किसी पर चिल्लाती हुई...
कभी गुस्से में नाक सिकोड़ती हुई...
लेकिन जब मुस्कुराती थी...
तो लगता था जैसे भगवान ने फुर्सत में उसे बनाया हो।
उस दिन इंटर-हाउस बास्केटबॉल मैच था।
वो मेरे बिल्कुल बगल में बैठी थी,
और मैं...
उसके खेल शुरू होने का इंतज़ार कर रहा था,
जैसे पूरा मैच सिर्फ उसी के लिए होने वाला हो।
मैं चोरी-चोरी उसे देख ही रहा था कि तभी पीटी सर की सीटी बजी—
"रेड और ब्लू टीम मैदान में आएँ।"
वो उठी...
और उसी पल हवा का एक झोंका मेरी तरफ़ आया।
मुझे लगा... हवा भी शायद चाहती थी
कि मैं उसके होने का एहसास अपने अंदर समेट लूँ।
मैं मुस्कुरा दिया। वो चली गई...
और मैं उसी जगह बैठ गया जहाँ अभी कुछ देर पहले वो बैठी थी।
ब्लू टीम उसकी थी।
नीली टी-शर्ट,
पीछे उसका नाम,
और घुँघराले बालों का कसकर बनाया हुआ जूड़ा...
ऐसा लग रहा था जैसे उसने अपने बालों को भी डाँट दिया हो—
"आज परेशान मत करना... आज मैच है।"
वो कोर्ट पर उतरी...
और सच कहूँ...
उस पल मुझे बास्केटबॉल नहीं,
सिर्फ वो दिखाई दे रही थी।
वो दौड़ती थी तो हवा पीछे छूट जाती थी।
उसकी लंबाई उसका हथियार थी।
एक के बाद एक बास्केट...
जैसे गेंद उसकी उँगलियों की नहीं,
उसके इशारों की गुलाम हो।
मैं मन ही मन मुस्कुरा उठा—
"काश... मैं भी यूँ ही उसका गुलाम बन पाता..."
तभी... वो अचानक फिसली।
धड़ाम...
मेरे दिल की धड़कन जैसे वहीं रुक गई।
मैं अपनी जगह से दौड़ पड़ा।
पहली बार... उसने मुझे देखा।
चेहरे पर हल्की-सी तकलीफ़ थी,
लेकिन होंठों पर वही ज़िद।
"इट्स ओके...
इतना भी नहीं लगा।"
मैंने उसके हाथ की तरफ़ देखा।
खून बह रहा था।
"बहुत लगी है तुम्हें...
थोड़ी देर बैठ जाओ।"
वो मुस्कुराई नहीं।
बस बोली—"मैच अभी बाकी है।"
और फिर उठकर खेलने चली गई।
उसकी ज़िद पर मुझे गुस्सा भी आता था,
और उसी ज़िद पर प्यार भी।
पूरा मैच मेरी नज़र गेंद पर नहीं,
उसके ज़ख्मी हाथ पर थी।
मैच खत्म हुआ। वो वापस आई।
बैग से रुमाल निकाला।
घाव पर बाँधा।
फिर जैसे ही बाल ठीक करने लगी...
दर्द से उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसने जल्दी से चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया।
वो नहीं चाहती थी कि कोई उसे कमज़ोर समझे।
मैं उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
"पहले फर्स्ट एड करवा लो...
अगले मैच में दर्द कम होगा।"
वो रुकी। मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हें कैसे पता मेरा एक और मैच है?"
मैं घबरा गया।
क्या बताता...
कि मुझे उसकी हर बात पता रहती थी।
मैंने हिचकिचाकर कहा—
"बस... अंदाज़ा लगाया।"
और फिर...
पहली बार...
वो मुस्कुराई।
उस एक मुस्कान ने मेरे अंदर सालों की खुशी भर दी।
उस दिन उसके लगातार तीन मैच थे।
तीनों उसने खेले।
जब जाने लगी,
तो जैसे किसी को ढूँढ़ रही थी।
फिर उसकी नज़र मुझ पर रुकी।
"थैंक यू..."
बस दो शब्द।
लेकिन मेरे लिए...
पूरी दुनिया।
उस दिन के बाद उसकी हर मैच में,
मैं कहीं-न-कहीं मौजूद रहता।
उसे शायद कभी पता नहीं चला...
कि मैदान में एक खिलाड़ी कम,
और एक दीवाना ज़्यादा होता था।
फिर स्कूल खत्म हो गया।
उस ज़माने में इंस्टाग्राम नहीं था।
व्हाट्सऐप भी हर किसी के पास नहीं।
बस फेसबुक था।
मैंने उसका नाम जाने कितनी बार खोजा।
लोगों से पूछा।
दोस्तों से पूछा।
लेकिन...
वो कहीं नहीं मिली।
साल बीतते गए।
लेकिन मेरी उम्मीद नहीं टूटी।
पंद्रह साल बाद
एक दिन... ऑटो में बैठा था।
और अचानक...
वो सामने दिख गई।
वही आँखें।
वही बाल।
बस अब पहले से ज़्यादा सुलझी हुई।
मैंने जल्दी से ऑटो रुकवाया।
शायद उसे लगा ऑटो उसके लिए रुका है।
वो आकर मेरे बगल में बैठ गई।
पूरे रास्ते मैं चाहता रहा कि वो कुछ बोले...
कुछ पहचान ले...
लेकिन वो चुप रही।
उतरते समय भी...
बस चली गई।
उस रात मैं बहुत देर तक आईने के सामने खड़ा रहा।
फिर खुद से हँस पड़ा।
"कैसे पहचानती?
छठी में देखा था...
अब पंद्रह साल बाद मिल रही है।
मैं बदल गया हूँ...
वो नहीं।"
अगली सुबह मैं उसी जगह पहुँच गया जहाँ वो उतरी थी।
काफ़ी देर बाद वो आई।
मैंने हिम्मत जुटाई।
"नायरा..."
वो पलटी।
उसके बाल फिर हवा में लहराए।
मेरी धड़कनें फिर तेज़ हो गईं।
"याद हूँ मैं?"
वो कुछ देर सोचती रही।
"सॉरी...
क्या मैं आपको जानती हूँ?"
दिल जैसे एक पल को रुक गया।
मैंने मुस्कुराकर कहा—
"मैं रोहन... स्कूल वाला।"
उसकी आँखें चमक उठीं।
"अरे... सॉरी। पहचाना नहीं।"
फिर वो पहली बार मुझे 'तुम' कहकर बोली।
उस एक 'तुम' ने मुझे अपना बना लिया।
हम पास के कैफ़े गए।
घंटों बातें हुईं।
मैं सोच रहा था...
आज शायद अपनी कहानी शुरू करूँगा।
लेकिन उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा—
"मेरी शादी में ज़रूर आना।"
मेरे अंदर कुछ टूट गया।
इतना कि उसकी आवाज़ भी सुनाई देना बंद हो गई।
मैं मुस्कुराया।
बधाई दी।
और घर लौट आया।
उस दिन मैंने पहली बार समझा...
कुछ प्रेम कहे नहीं जाते।
बस चुपचाप दफ़न कर दिए जाते हैं।
कुछ दिनों बाद एक अनजान लड़की का फ़ोन आया।
"आपकी मम्मी ने नंबर दिया था...
कल मिल सकते हैं?"
मैंने झुंझलाकर फ़ोन काट दिया।
थोड़ी देर बाद माँ एक फोटो लेकर आईं।
"रिश्ता है... हमने हाँ कर दी।"
मैंने गुस्से में फोटो उठाई।
और अगले ही पल...
मेरी साँसें थम गईं।
वो नायरा थी।
मैं भागकर माँ से लिपट गया।
"मम्मी... इसी से शादी करनी है।"
मैंने तुरंत वही नंबर मिलाया।
उधर से आवाज़ आई—
"अब क्यों फ़ोन किया?"
मैं हँस पड़ा।
"अच्छा... शादी में आना है कि नहीं?"
कुछ पल की ख़ामोशी...
फिर दोनों तरफ़ हँसी।
उस रात पहली बार हमने सुबह तक बातें कीं।
मैंने उसे बताया...
कि वो कब से मेरी दुनिया थी।
और वो...
बस सुनती रही।
कभी हँसती...
कभी चुप हो जाती।
हमने अगले दिन उसी कैफ़े में मिलने का फैसला किया।
अगले दिन...
हम दोनों अलग-अलग तरफ़ से ऑटो से उतरे।
मैंने उसे देखा।
वो मुस्कुरा रही थी।
शायद आज पहले से ज़्यादा।
वो सड़क पार करने लगी।
और तभी...
एक तेज़ रफ़्तार गाड़ी...
सब कुछ अपने साथ ले गई।
मैं भागा।
उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।
"नायरा...
उठो...
देखो मैं आ गया..."
लेकिन...
उसकी साँसें जा चुकी थीं।
जिस लड़की को मैं बचपन से संभालना चाहता था...
उसे अपनी बाँहों में भी नहीं बचा पाया।
उस दिन समझ आया...
कुछ कहानियाँ मिलने से नहीं,
बिछड़ने से पूरी होती हैं।
मेरी कहानी भी वहीं खत्म हो गई...
जहाँ मैंने सोचा था कि अब मेरी ज़िंदगी शुरू होगी।
कहते हैं, इंसान अपनी पहली मोहब्बत कभी नहीं भूलता।
मैं भी नहीं भूल पाया।
फर्क बस इतना है कि मेरी मोहब्बत मेरी नहीं थी... फिर भी पूरी ज़िंदगी उसी की रही।
आज इतने साल बाद जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कुछ कहानियाँ लिखी नहीं जातीं... बस जी ली जाती हैं।
मेरी कहानी भी ऐसी ही है।
एक लड़की... जिसके उलझे हुए बाल थे, आँखों में अनगिनत सवाल थे, और जिसे शायद कभी पता ही नहीं चला कि किसी की पूरी दुनिया उसकी मुस्कान में बसती थी।
उसी लड़की के नाम, ये कुछ पंक्तियाँ हैं।
तुम्हें चाहा था...
बिना तुम्हें बताए।
तुम्हारी हर जीत पर मुस्कुराया,
हर चोट पर डर गया।
तुम्हारे साथ ज़िंदगी माँगी थी,
किस्मत ने यादें दे दीं।
तुम मेरी पहली मोहब्बत थीं,
और आख़िरी भी।
अब लोग पूछते हैं—
"कभी प्यार किया था?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ...
क्योंकि कुछ नाम
दुआओं में अच्छे लगते हैं,
ज़ुबान पर नहीं।

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Author Niman
1 weeks agothanks appilog team for publishing my first story 🙌
Appilog Digital Publication
5 days ago@Author Niman It’s a pleasure