एक औरत की अनकही कहानी

यह एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने अपने जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे। पर कभी भी हार नहीं मानी, चाहे सुख हो या दुख। उनका जन्म गाँव में हुआ था। वह अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थीं, पर संयुक्त परिवार होने के चलते उनके अपने चचेरे भाई-बहन बहुत सारे थे। पहले के ज़माने में लड़कियों को पढ़ाई की छूट नहीं थी, फिर भी उन्होंने थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना सीख लिया। छोटी-सी उम्र में ही उनके अंदर इतने सारे गुण थे। उन्होंने सिलाई-कढ़ाई करना सीखा, क्योंकि पहले के ज़माने में लड़कियाँ भले ही पढ़ें नहीं, पर उन्हें सिलाई और घर के सारे काम आने चाहिए। उन्होंने छोटी-सी उम्र से ही खाना बनाना और घर की साफ़-सफ़ाई आदि काम करना शुरू कर दिया, और इसमें भी वह काफ़ी खुश रहती थीं।
उनके पिताजी शहर में नौकरी करते थे, इसलिए उन्हें अपने पिताजी का प्यार नहीं मिला। वह अपनी माँ के साथ गाँव में ही रहती थीं। उनकी माँ के ऊपर घर की काफ़ी सारी ज़िम्मेदारियाँ थीं, जिसके कारण उन्हें शहर में नहीं आने दिया गया। पिताजी शहर में रहते थे, इसलिए वह अपने शौक उन्हें बता नहीं सकती थीं। बहुत सारे अभावों में उनका बचपन बीत रहा था, पर फिर भी वह अपनी माँ के साथ बहुत खुश थीं।
समय बीतने के साथ जब वह 15 साल की थीं, तब उनका विवाह हो गया। उनका विवाह जिस लड़के के साथ हुआ, वह उसी शहर में था जहाँ उनके पिताजी रहते थे। शादी के बाद वह शहर में रहने आ गईं। मन में बहुत सारे सपने और इच्छाएँ लेकर उन्हें लगा कि अब मैं अपने पिताजी के पास आ गई हूँ। पर उनका विवाह ऐसे संयुक्त परिवार में हुआ, जहाँ पर इतनी सारी ज़िम्मेदारियाँ थीं कि वह चाहकर भी अपने सपनों को पूरा नहीं कर पा रही थीं।
वह अपनी सारी इच्छाओं को दबाकर अपनी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठा रही थीं। वह कभी भी किसी से शिकायत न करते हुए हँसी-खुशी अपना जीवन बिताने लगीं। इसी तरह उनके अपने बच्चे हुए, बोझ और बढ़ता चला गया। इन सबके बीच भी वह खुशी के पल ढूँढ़ लेती थीं। छोटी-छोटी खुशियों से ही वह अपने परिवार को भी खुश रखती थीं, पर कभी-कभी दूसरों को देखकर उनकी दबी हुई इच्छाएँ बाहर आने को लालायित रहतीं, पर अपने परिवार को देखने के बाद वह अपनी इच्छाएँ वहीं दबा देतीं।
इसी तरह जब उनके तीसरे बच्चे का जन्म हुआ, तब उनकी माँ बहुत बीमार रहने लगीं। वह चाहकर भी अपनी माँ से मिल नहीं पा रही थीं। फिर उनकी माँ के देहांत की खबर पत्र के ज़रिए पहुँची। पत्र जब तक पहुँचा, उनकी माँ का अंतिम संस्कार हो चुका था। वह बहुत रोईं। पहले के ज़माने में तो पत्र हुआ करते थे, जिससे मिलने में काफ़ी समय लगता था। आजकल तो इतनी सुविधाएँ हैं कि लोग विदेशों में रहने वालों से भी वीडियो कॉल में बात कर लेते हैं।
जब वह अपने मायके पहुँचीं, तो वह बहुत रोईं क्योंकि उन्हें अपनी माँ के अंतिम दर्शन नहीं हो सके। उन्हें दुख हो रहा था कि पता नहीं मेरी माँ मुझसे क्या बात करना चाहती थीं। कुछ समय रहने के बाद वह वापस आ गईं। उसके बाद उनका मायके जाना लगभग बंद हो गया। ऐसे भी माँ से ही मायका होता है। आज भी जब वह पुरानी यादों को याद करती हैं, तो रो पड़ती हैं। कहते हैं वक्त हर ज़ख्म को भर देता है, पर उनका यह ज़ख्म उनके दिल के कोनों में आज तक हरा है।
इस तरह वर्ष बीतते गए और उनके 7 बच्चे हुए, जिनमें चार बेटे और तीन बेटियाँ थीं। फिर एक दिन ऐसा आया जब उनके पिता का भी देहांत हो गया। एक ही शहर में रहते हुए भी वह कभी भी अपने पिता से जुड़ नहीं पाईं, जबकि वह उनकी इकलौती संतान थीं। उन्हें अपने पिता से कभी वह स्नेह मिला ही नहीं, जिसकी वह हक़दार थीं।
सभी बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ वह बखूबी निभा रही थीं। इस तरह अपने बच्चों को बड़ा करने में वह अपने आप को बिल्कुल भूल चुकी थीं। वह कभी भी किसी से शिकायत नहीं करती थीं, पर वह भी एक इंसान हैं। उनकी भी अपनी इच्छाएँ होती थीं। अपनी इच्छाओं को वह अपने दिल के किसी कोने में छुपाकर रखती थीं, ताकि कोई जान न सके।
बच्चे अपने पैरों पर खड़े होते गए, उनकी शादियाँ होती गईं। तब उन्हें लगा कि वह अपने इतने सालों की परीक्षा में पास हो गई हैं। आज उनके पास हर सुख-सुविधा है, किसी चीज़ की कमी नहीं है, पर दिल के किसी कोने में पिछला दर्द अभी भी है, जो कभी-कभी झलक पड़ता है।
वह कहती हैं, "जब मेरी इच्छा थी इन शौकों को पूरा करने की, तब पैसों का बहुत अभाव था। आज जब सारी सुख-सुविधाएँ हैं, तब मेरी इच्छाओं का अभाव है।"
आज वह अपने भरे-पूरे परिवार के साथ काफ़ी खुश हैं। आज भी वह अपने बचपन के शौक, सिलाई-कढ़ाई, को पूरा करती हैं।
आजकल की लड़कियों को उनसे बहुत कुछ सीखना चाहिए, क्योंकि अभी के समय में तो थोड़ी-सी ज़िम्मेदारियों से ही वे दूर भागती हैं। अभी के समय में ज़्यादातर लड़के-लड़कियाँ अलग रहना पसंद करते हैं।

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