एक कदम और

राघव शहर के एक छोटे से सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला साधारण लड़का था। पढ़ाई में वह न बहुत तेज था, न खेल में। लेकिन उसके अंदर एक आदत थी—वह हर काम पूरा करने की कोशिश करता था।
उसके पिता छोटी-सी साइकिल की दुकान चलाते थे। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। कई बार महीने के अंत में घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता।
राघव का सपना था कि वह एक दिन बड़ा इंजीनियर बने।
एक दिन स्कूल में विज्ञान की प्रदर्शनी की घोषणा हुई। सभी विद्यार्थियों को कोई मॉडल बनाना था। राघव ने तय किया कि वह सौर ऊर्जा से चलने वाला छोटा पंखा बनाएगा।
उसने घर पर पुराने खिलौने की मोटर, तार और एक खराब टॉर्च का छोटा सोलर पैनल इकट्ठा किया।
पहली कोशिश में पंखा नहीं चला।
दूसरी कोशिश में भी नहीं।
तीसरी बार मोटर कुछ सेकंड चली और फिर बंद हो गई।
राघव निराश होकर सामान फेंकने ही वाला था कि उसके पिता ने कहा,
“बेटा, दुकान पर रोज कितनी साइकिलें आती हैं, पता है? हर साइकिल पहली बार में ठीक नहीं होती। कभी चेन उतरती है, कभी ब्रेक खराब होते हैं। अगर मैं पहली कोशिश में ही हार मान लूँ, तो दुकान कैसे चलेगी?”
राघव ने पूछा,
“तो फिर क्या करूँ?”
पिता मुस्कुराए।
“एक कदम और।”
राघव ने फिर अपना मॉडल उठाया।
उसने इंटरनेट से जानकारी खोजी। स्कूल के विज्ञान शिक्षक से सवाल पूछे। तारों को दोबारा जोड़ा। मोटर बदली। कई बार गलती हुई।
तीन दिन बाद उसने स्विच दबाया।
फुर्र…
पंखा घूमने लगा।
राघव खुशी से उछल पड़ा।
प्रदर्शनी के दिन उसका मॉडल सबसे सुंदर नहीं था। दूसरे बच्चों के मॉडल महंगे सामान से बने थे और बहुत आकर्षक थे।
जब निर्णायकों ने राघव से उसके मॉडल के बारे में पूछा, तो उसने कहा—
“मैडम, यह मॉडल मैंने पुराने सामान से बनाया है। पहली बार में नहीं चला, दूसरी बार में भी नहीं चला। लेकिन मैंने हर बार अपनी गलती से कुछ सीखा।”
कुछ देर बाद परिणाम घोषित हुआ।
राघव को पहला पुरस्कार नहीं मिला।
उसे तीसरा स्थान मिला।
कुछ पल के लिए उसे निराशा हुई।
लेकिन विज्ञान के शिक्षक उसके पास आए और बोले,
“राघव, आज तुम्हें पुरस्कार से ज्यादा महत्वपूर्ण चीज मिली है।”
“क्या?”
शिक्षक ने कहा—
“तुमने सीख लिया है कि असफल कोशिश अंत नहीं होती। वह अगली कोशिश की तैयारी होती है।”
उस दिन घर लौटते समय राघव ने अपनी ट्रॉफी पिता को दी।
पिता ने पूछा,
“खुश हो?”
राघव मुस्कुराया।
“हाँ। क्योंकि अब मुझे पता है कि अगर कोई काम नहीं हो रहा हो, तो मुझे हार नहीं माननी है।”
पिता ने पूछा—
“फिर क्या करना है?”
राघव हँसते हुए बोला—
“एक कदम और।”
उस दिन से यह वाक्य राघव की जिंदगी का हिस्सा बन गया।
जब परीक्षा कठिन लगी—एक कदम और।
जब पैसे की कमी आई—एक कदम और।
जब किसी ने कहा कि सपना बहुत बड़ा है—एक कदम और।
और कई साल बाद जब राघव ने अपनी पहली बड़ी मशीन तैयार की, तो उसके ऑफिस की दीवार पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—
“कभी-कभी सफलता हमसे सिर्फ एक कदम दूर होती है।”
कहानी से सीख
हर बार जीतना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि हार के बाद हम रुकें नहीं। अगर रास्ता कठिन लगे, तो पूरी मंजिल के बारे में मत सोचिए—बस अपने आप से कहिए, “एक कदम और।”
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