दिल ही तो है - एक कॉलेज लव स्टोरी

DramaShort-StoriesRomanceYound Adult
Listen to storyNarrated by VITI
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कॉलेज की ज़िंदगी... ज़िंदगी का वो ख़ूबसूरत दौर होती है, जहाँ किताबों से ज़्यादा यादें बनती हैं। कुछ लोग सिर्फ़ दोस्त बनकर आते हैं, कुछ दिल तोड़कर चले जाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो अनजाने में हमारी पूरी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।

यह कहानी भी दो ऐसे ही दिलों की थी—दिव्या और साहित की।

दिव्या का ठाकुर कॉलेज में पहला दिन था। आँखों में बड़े सपने थे। वह पढ़ाई में होशियार, स्वभाव से सरल और थोड़ी शर्मीली लड़की थी। उसका सपना था कि पढ़ाई पूरी करके एक सफल बिज़नेस वुमन बने।

दूसरी तरफ़ साहित था—कॉलेज का सबसे हैंडसम और कॉन्फिडेंट लड़का। लड़कियाँ उसे पसंद करती थीं, लेकिन उसे किसी रिश्ते की तलाश नहीं थी। उसे बस अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीनी थी।

पहले ही दिन कॉरिडोर में दोनों की टक्कर हो गई।

दिव्या की किताबें नीचे गिर गईं।

“देखकर नहीं चल सकते?” उसने नाराज़ होकर कहा।

साहित ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “गलती तुम्हारी है और डाँट मुझे रही हो?”

“आप बहुत घमंडी हैं।”

“और तुम बहुत गुस्से वाली।”

“मुझे तुमसे बात नहीं करनी।”

“मुझे भी कोई शौक़ नहीं है।”

दोनों अलग हो गए।

लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह छोटी-सी लड़ाई एक दिन उनकी प्रेम कहानी की शुरुआत बनेगी।

कुछ दिनों तक दोनों के बीच सिर्फ़ नोकझोंक होती रही। फिर साहित की बचपन की दोस्त अंकिता दिव्या की दोस्त बन गई।

एक दिन दिव्या ने अंकिता से कहा, “तुम्हारा दोस्त बहुत ख़राब है। मैंने उसे एक लड़के को मारते देखा था।”

अंकिता हँस पड़ी।

“तुम्हें पूरी बात नहीं पता। वो लड़का मुझे परेशान कर रहा था। साहित बचपन से मेरा दोस्त है। कोई मेरे साथ ग़लत करे, तो वो चुप नहीं बैठता।”

दिव्या चुप हो गई।

उस दिन पहली बार उसने साहित को अलग नज़र से देखा।

धीरे-धीरे दोनों की ग़लतफ़हमी दूर हुई। फिर बातें शुरू हुईं और बातें दोस्ती में बदल गईं।

अब साहित दिव्या को छेड़ता और दिव्या नाराज़ होने का नाटक करती।

एक दिन बारिश में दोनों एक ही छाते के नीचे घर की तरफ़ जा रहे थे। रास्ते में साहित ने पूछा—

“इतनी चुप क्यों हो?”

दिव्या ने उसकी तरफ़ देखा।

“कुछ नहीं।”

साहित मुस्कुराया, “जब तुम झूठ बोलती हो ना, तब और भी प्यारी लगती हो।”

दिव्या ने तुरंत नज़रें झुका लीं।

उस रात उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसके दिल में साहित के लिए सिर्फ़ दोस्ती नहीं थी।

वह साहित से प्यार करने लगी थी।

लेकिन साहित अभी भी उसे सिर्फ़ अपना अच्छा दोस्त मानता था।

सब कुछ ख़ूबसूरत चल रहा था कि अचानक एक दिन साहित ने दिव्या से बात करना बंद कर दिया।

दिव्या ने कई बार पूछा, लेकिन वह हर बार उसे नज़रअंदाज़ कर देता।

उसकी पढ़ाई प्रभावित होने लगी। रात को वह साहित की याद में रोती और ख़ुद से एक ही सवाल करती—

“आख़िर मैंने किया क्या है?”

आख़िर उसने अंकिता को फ़ोन किया।

अंकिता ने बताया, “किसी ने साहित से कहा है कि तुम उसके कैरेक्टर के बारे में ग़लत बातें करती हो।”

दिव्या हैरान रह गई।

“मैंने ऐसा कभी नहीं कहा!”

उसने उसी वक़्त फ़ैसला कर लिया—

“कल मैं साहित से बात करूँगी और सारी ग़लतफ़हमी दूर कर दूँगी।”

अगले दिन वह साहित को कैंटीन में ढूँढते हुए पहुँची।

“साहित!”

उसने उसकी तरफ़ देखा और फिर नज़रें फेर लीं।

दिव्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे?”

साहित ने कड़वाहट से कहा, “मैं कैरेक्टरलेस लड़का हूँ ना? फिर मुझसे बात क्यों कर रही हो?”

दिव्या की आँखों में आँसू आ गए।

“मैंने तुम्हारे बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा।”

“मुझे तुम पर विश्वास नहीं है।”

साहित अपना हाथ छुड़ाने लगा।

और तभी दिव्या ने अपनी सारी हिम्मत जुटाकर उसे किस कर लिया।

पूरी कैंटीन में सन्नाटा छा गया।

दिव्या ख़ुद भी हैरान थी।

कुछ पल बाद उसने काँपती आवाज़ में कहा—

“अगर मैं तुम्हें ग़लत समझती... तो तुम्हारे सामने क्यों आती? मैं तुमसे प्यार करती हूँ, साहित।”

साहित कुछ नहीं बोला।

दिव्या ने आगे कहा—

“नेहा ने हमारे बीच ग़लतफ़हमी पैदा की है। उसने ख़ुद मुझे बताया कि वह तुम्हें चाहती है। उसे पता चल गया था कि मैं तुमसे प्यार करने लगी हूँ।”

इतना कहकर दिव्या वहाँ से चली गई।

उसने रोते हुए अंकिता को फ़ोन किया।

अंकिता ने साहित को फ़ोन किया।

“तू दिव्या को पसंद नहीं करता?”

“नहीं।”

“फिर उसकी इतनी परवाह क्यों करता है?”

साहित चुप हो गया।

“क्योंकि वो मेरी दोस्त है।”

अंकिता ने कहा—

“साहित, कभी-कभी जिसे हम दोस्ती कहते हैं, वो असल में प्यार होता है। दिव्या जैसी लड़की ज़िंदगी में बार-बार नहीं मिलती। अगर प्यार है, तो उसे जाने मत देना।”

फ़ोन कट गया।

लेकिन अंकिता की बात साहित के दिल में उतर गई।

उस रात वह सो नहीं पाया।

उसे दिव्या की हँसी याद आई, उसकी बातें याद आईं, उसकी चिंता याद आई और सबसे ज़्यादा उसके आँसू याद आए।

तभी उसे एहसास हुआ—

जिसे वह सिर्फ़ दोस्त समझता था, उसके लिए उसका दिल बहुत पहले धड़कना शुरू कर चुका था।

अगली सुबह साहित दिव्या के पास पहुँचा।

दिव्या ने उसे देखा और नज़रें झुका लीं।

साहित उसके पास आया और बिना कुछ कहे उसे अपनी बाहों में भर लिया।

दिव्या की आँखों से आँसू बहने लगे।

साहित ने धीरे से कहा—

“मुझे देर से समझ आया... लेकिन अब समझ आया है। तुम सिर्फ़ मेरी दोस्त नहीं हो।”

दिव्या ने उसकी तरफ़ देखा।

साहित मुस्कुराया।

“तुम मेरी मोहब्बत हो।”

दिव्या की आँखों में ख़ुशी चमक उठी।

साहित ने उसका हाथ थाम लिया।

“हाँ दिव्या... मुझे भी तुमसे प्यार है।”

दिव्या मुस्कुराते हुए उसके सीने से लग गई।

जिस रिश्ते की शुरुआत एक छोटी-सी लड़ाई से हुई थी, वह आज मोहब्बत बन चुका था।

क्योंकि सच्चा प्यार हमेशा पहली नज़र में नहीं मिलता।

कभी वह लड़ाई बनकर आता है, फिर दोस्ती बनता है, आदत बनता है और आख़िर में ज़िंदगी बन जाता है।

दिव्या और साहित की कहानी भी यही कहती है—

“दिल को समझाना आसान है,
लेकिन दिल की सुनना मुश्किल।
मोहब्बत अगर सच्ची हो,
तो रास्ते चाहे कितने भी मुश्किल हों,
दो दिल आख़िर एक-दूसरे तक पहुँच ही जाते हैं।”

आख़िर... दिल ही तो है।

किसी पर आ ही जाता है।

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