धुंधली यादें : कमरा नंबर 13
भाग 1 — “उस दरवाज़े पर कभी दस्तक मत देना...”
“कुछ दरवाज़े इसलिए बंद नहीं होते कि उनके पीछे कोई रहता है... बल्कि इसलिए बंद होते हैं क्योंकि उनके पीछे जो था, उसे दुनिया कभी दोबारा देख नहीं सकती।”
रात के 2 बजकर 13 मिनट हो रहे थे।
आसमान में बादलों का शोर किसी अधूरे विलाप की तरह गूँज रहा था। मूसलाधार बारिश हवेली की जर्जर दीवारों से टकराकर ऐसी आवाज़ पैदा कर रही थी, मानो वर्षों से दबी हुई यादें बाहर निकलने के लिए छटपटा रही हों।
एक काली कार धीरे-धीरे उस सुनसान हवेली के मुख्य फाटक के सामने आकर रुकी।
कार का दरवाज़ा खुला।
करीब तीस वर्ष का एक युवक बाहर उतरा।
आरव।
उसने कई क्षण तक बिना पलक झपकाए उस हवेली को देखा।
सात वर्ष...
पूरे सात वर्ष बाद वह इस जगह लौटा था।
वही हवेली...
जहाँ उसका बचपन बीता था।
वही हवेली...
जहाँ से जाते समय उसने मन ही मन कसम खाई थी—
“मैं इस घर में कभी वापस नहीं लौटूँगा।”
लेकिन ज़िंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है...
कुछ कसमें इंसान नहीं तोड़ता,
वक़्त तुड़वा देता है।
आरव ने गहरी साँस ली और लोहे के पुराने फाटक को धक्का दिया।
“चीईईँ...”
फाटक की कराहती हुई आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया।
उसी क्षण...
उसके कानों के बिल्कुल पास किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“बहुत देर कर दी...”
आरव एकदम पलटा।
पीछे...
कोई नहीं था।
सिर्फ़ बारिश।
सिर्फ़ अँधेरा।
और हवेली की टूटी हुई खिड़कियाँ...
जो ऐसा आभास दे रही थीं, मानो कोई भीतर से उसे देख रहा हो।
उसने खुद को समझाया—
“थकान है... बस भ्रम होगा।”
लेकिन उसके कदम जैसे-जैसे हवेली के भीतर बढ़ रहे थे, एक अजीब-सी बेचैनी उसके सीने में घर करती जा रही थी।
मुख्य दरवाज़ा आज भी खुला था।
बिल्कुल वैसे ही...
जैसे सात साल पहले था।
धूल की मोटी परत हर चीज़ पर जमी हुई थी।
मकड़ी के जाले छत से लटक रहे थे।
दीवार पर लगी पुरानी तस्वीरें धुंधली पड़ चुकी थीं।
फिर भी...
एक चीज़ बिल्कुल नहीं बदली थी।
बैठक के बीचों-बीच लगी वह पुरानी दीवार घड़ी।
आरव की नज़र जैसे ही घड़ी पर पड़ी...
उसका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।
घड़ी की सुइयाँ...
उल्टी दिशा में चल रही थीं।
उसने आँखें मलकर दोबारा देखा।
नहीं...
वह कोई भ्रम नहीं था।
समय सचमुच पीछे की ओर भाग रहा था।
उसी क्षण...
टन...
घड़ी ने एक बार घंटी बजाई।
फिर दूसरी बार।
और ठीक तेरहवीं घंटी पर...
पूरी हवेली की बिजली अपने आप जल उठी।
आरव के हाथ से उसका बैग छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
उसके सामने...
सीढ़ियों के ऊपर...
एक सफेद साया कुछ क्षण के लिए दिखाई दिया।
लंबे खुले बाल...
सफेद कपड़े...
और चेहरा...
पूरी तरह अँधेरे में छिपा हुआ।
आरव चीखने ही वाला था कि बिजली फिर से चली गई।
पूरा घर दोबारा अँधेरे में डूब गया।
कुछ सेकंड बाद उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
सीढ़ियाँ...
अब बिल्कुल खाली थीं।
कोई नहीं था।
लेकिन...
सीढ़ियों की सबसे ऊपरी पायदान पर...
एक पुरानी पीतल की चाबी रखी हुई थी।
उस चाबी से एक छोटा-सा कागज़ बँधा था।
काँपते हाथों से आरव ने वह कागज़ खोला।
उस पर सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—
“तेरहवाँ कमरा तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है... लेकिन याद रखना... उस दरवाज़े पर कभी दस्तक मत देना।”
आरव ने अनायास ही ऊपर देखा।
हवेली की दूसरी मंज़िल पर...
अँधेरे के बीच...
एक दरवाज़ा था...
जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—
13
और तभी...
उस दरवाज़े के पीछे से...
किसी ने...
धीरे से...
तीन बार दस्तक दी।
ठक...
ठक...
ठक...
भाग 2 — “जिसने मेरा नाम लिया...”
रात अब और भी गहरी हो चुकी थी।
बारिश की बूँदें हवेली की छत पर किसी बेचैन दिल की धड़कनों की तरह गिर रही थीं।
आरव अब भी उसी जगह खड़ा था।
उसके हाथ में पीतल की पुरानी चाबी थी...
और सामने...
दूसरी मंज़िल पर...
तेरह नंबर का दरवाज़ा।
अभी कुछ क्षण पहले वहीं से तीन दस्तकें सुनाई दी थीं।
लेकिन अब...
पूरा घर फिर से खामोश था।
इतनी खामोशी...
कि आरव को अपनी साँसों की आवाज़ भी भारी लगने लगी।
उसने मोबाइल की टॉर्च सीढ़ियों की ओर घुमाई।
पहली सीढ़ी...
दूसरी...
तीसरी...
हर कदम के साथ ऐसा लगता था जैसे कोई उसके पीछे भी एक-एक कदम रख रहा हो।
आरव अचानक रुक गया।
पीछे मुड़कर देखा।
कोई नहीं।
उसने खुद को समझाया—
“डर इंसान से वह भी दिखा देता है... जो होता ही नहीं।”
वह फिर आगे बढ़ा।
लेकिन इस बार...
ऊपर पहुँचते ही उसकी नज़र फर्श पर पड़ी।
धूल की मोटी परत पर...
दो जोड़ी पैरों के निशान थे।
एक...
जो उसके थे।
और दूसरे...
जो उससे कुछ पल पहले उसी दरवाज़े तक गए थे।
लेकिन...
वापस नहीं लौटे थे।
आरव के गले में जैसे कुछ अटक गया।
उसने काँपते हाथों से चाबी ताले में डाली।
“टक...”
चाबी घूम गई।
दरवाज़ा खुल सकता था।
बस...
एक धक्का देना बाकी था।
उसी समय...
नीचे से किसी लड़की की आवाज़ आई—
“मत खोलिए!”
आरव ने घबराकर पीछे देखा।
सीढ़ियों के नीचे...
एक लड़की खड़ी थी।
बारिश से भीगे हुए लंबे बाल...
सफेद नहीं...
हल्के नीले रंग का सूती सलवार-कुर्ता...
चेहरे पर अजीब-सी शांति...
लेकिन आँखों में ऐसा डर...
जैसे वह इस पल को पहले भी देख चुकी हो।
“आप... कौन हैं?” आरव ने पूछा।
लड़की ने जवाब नहीं दिया।
वह बस धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
“आप यहाँ क्या कर रही हैं?”
वह मुस्कुराई।
“यह सवाल मुझे नहीं...
आपको खुद से पूछना चाहिए।”
आरव कुछ समझ नहीं पाया।
“मैं आपको जानता हूँ?”
लड़की की मुस्कान एक पल में गायब हो गई।
उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“आप मुझे भूल चुके हैं...”
“...लेकिन मैं आपको कभी नहीं भूल पाई।”
आरव का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
“हम पहले मिले हैं?”
लड़की ने सिर झुका लिया।
“बहुत बार...”
“हर बार...”
“और हर बार अंत एक जैसा हुआ।”
“क्या मतलब?”
लड़की ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“हर बार आपने वही दरवाज़ा खोला... और हर बार मुझे खो दिया।”
इतना कहकर उसने आरव के हाथ से चाबी ले ली।
“अगर इस घर से ज़िंदा जाना चाहते हैं...”
“तो आज रात...”
“तेरहवें कमरे का दरवाज़ा मत खोलिए।”
आरव कुछ बोल पाता...
उससे पहले ही...
पूरी हवेली की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।
और उसी क्षण...
गलियारे के आखिर में रखा पुराना आईना अपने आप चटक गया।
चटाक!
आरव की नज़र आईने पर गई...
और उसका खून जैसे जम गया।
आईने में...
उसका प्रतिबिंब अकेला नहीं था।
उसके ठीक पीछे...
एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।
सफेद दाढ़ी...
काले कपड़े...
और हाथ में वही पीतल की चाबी।
आरव घबराकर पलटा।
पीछे...
कोई नहीं था।
उसने फिर आईने की ओर देखा।
इस बार...
आईने में वह बूढ़ा आदमी मुस्कुरा रहा था।
और उसके होंठ धीरे-धीरे हिले—
“आरव... इस बार भी तुम देर से आए...”
अचानक...
आईना भीतर की ओर फट गया।
उसके टूटे हुए काँच के टुकड़ों के बीच...
एक पुराना कागज़ बाहर गिरा।
आरव ने काँपते हाथों से उसे उठाया।
उस पर केवल एक वाक्य लिखा था—
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो... तो समझ लो कि मैं मर चुका हूँ।
और सबसे डरावनी बात यह है...
मेरा नाम भी आरव शर्मा था।”
आरव की उँगलियाँ सुन्न पड़ गईं।
उसने धीरे-धीरे सिर उठाया...
लेकिन...
वह रहस्यमयी लड़की...
अब वहाँ नहीं थी।
सीढ़ियों पर सिर्फ़ उसके गीले पैरों के निशान बचे थे...
जो धीरे-धीरे...
धूल में नहीं...
हवा में गायब हो रहे थे।
भाग 3 — “वसीयत, जो किसी ज़िंदा आदमी के नाम नहीं थी...”
रात के 2 बजकर 27 मिनट।
हवेली फिर से अँधेरे में डूब चुकी थी।
आरव के हाथ अब भी काँप रहे थे।
उसने एक बार फिर उस कागज़ को देखा।
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो... तो समझ लो कि मैं मर चुका हूँ।
मेरा नाम भी आरव शर्मा था...”
उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।
“यह... कैसे हो सकता है?”
उसकी आवाज़ सुनसान गलियारे में गूँजकर वापस लौट आई—
“कैसे हो सकता है... हो सकता है...”
जैसे हवेली भी उसी से सवाल पूछ रही हो।
अचानक नीचे से किसी चीज़ के गिरने की तेज़ आवाज़ आई।
धड़ाम!
आरव दौड़ता हुआ सीढ़ियाँ उतरने लगा।
बैठक में पहुँचते ही उसकी नज़र उस पुरानी मेज़ पर पड़ी।
कुछ देर पहले तक वहाँ कुछ भी नहीं था...
लेकिन अब...
धूल से ढकी एक काली चमड़े की फ़ाइल रखी थी।
उस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
“अंतिम वसीयत”
आरव का गला सूख गया।
उसने काँपते हाथों से फ़ाइल खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“यह वसीयत मेरी मृत्यु के बाद उस व्यक्ति को दी जाए... जो स्वयं को आरव शर्मा समझता हो।”
आरव का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
“स्वयं को... समझता हो?”
उसने अगला पन्ना पलटा।
इस बार शब्द पढ़ते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो... तो सबसे पहले एक बात समझ लो।
तुम इस घर के मालिक नहीं हो।
और शायद... तुम वह भी नहीं हो, जो खुद को समझते हो।”
आरव ने झटके से फ़ाइल बंद कर दी।
“नहीं...”
“यह कोई मज़ाक है...”
उसी पल...
पीछे रखी दीवार घड़ी अपने आप बज उठी।
टन...
लेकिन इस बार...
उसने केवल बारह बार घंटी बजाई।
तेरहवीं घंटी...
नहीं बजी।
पूरा घर अचानक बर्फ़ जैसा ठंडा हो गया।
आरव की साँसों से धुआँ निकलने लगा।
और तभी...
उसी रहस्यमयी लड़की की आवाज़ फिर सुनाई दी—
“वह आ गया...”
आरव ने पलटकर देखा।
लड़की इस बार बैठक के दरवाज़े पर खड़ी थी।
लेकिन...
उसके चेहरे पर पहली बार डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
“कौन आ गया?” आरव ने पूछा।
लड़की ने जवाब नहीं दिया।
उसने बस काँपते हुए उँगली हवेली के मुख्य दरवाज़े की ओर उठा दी।
धीरे-धीरे...
दरवाज़े की कुंडी अपने आप खुलने लगी।
चर्र...
दरवाज़ा खुला।
बाहर...
मूसलाधार बारिश हो रही थी।
लेकिन वहाँ...
कोई नहीं था।
आरव ने राहत की साँस ली।
तभी...
बरामदे के गीले फ़र्श पर...
एक-एक करके...
गीले पैरों के निशान बनने लगे।
जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति भीतर आ रहा हो।
पहला निशान...
दूसरा...
तीसरा...
हर निशान सीधे बैठक की ओर बढ़ रहा था।
लड़की की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने फुसफुसाकर कहा—
“इस बार उसने तुम्हें देख लिया...”
“अब वह रुकेगा नहीं।”
आरव पीछे हट गया।
“कौन है वह?”
लड़की ने पहली बार उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
उसका हाथ बर्फ़ की तरह ठंडा था।
“जिसे इस घर में कभी दफ़नाया ही नहीं गया...”
इतना कहते ही...
बैठक के बीचों-बीच रखी पुरानी कुर्सी अपने आप हिलने लगी।
धीरे...
फिर तेज़...
और फिर...
उस पर कोई बैठ गया।
कुर्सी दब गई...
लेकिन उस पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
कमरे में अचानक एक भारी आवाज़ गूँजी—
“आरव...”
“आख़िर तुम लौट ही आए...”
आवाज़ इतनी गहरी थी कि खिड़कियों के शीशे काँप उठे।
आरव की हिम्मत टूटने लगी।
“तुम... कौन हो?”
कुछ क्षण तक सन्नाटा रहा।
फिर वही आवाज़ आई—
“मैं वह हूँ... जिसे तुम्हें याद होना चाहिए था।”
और अगले ही पल...
मेज़ पर रखी फ़ाइल का आख़िरी पन्ना अपने आप खुल गया।
उस पर लाल स्याही से केवल एक पंक्ति लिखी थी—
“कल रात 2 बजकर 13 मिनट पर... तुम्हारी मृत्यु होगी।”
आरव की नज़र तारीख़ पर गई...
और उसका खून जम गया।
क्योंकि वह तारीख़...
कल की नहीं थी।
वह...
सात साल पुरानी थी।
भाग 4 — “जो सात साल पहले मर चुका था...”
“कभी-कभी सच दरवाज़ों के पीछे नहीं छिपा होता... वह उन लोगों की आँखों में छिपा होता है, जो उसे देखकर भी पहचान नहीं पाते।”
रात के 2 बजकर 41 मिनट...
हवेली में फिर से सन्नाटा पसरा हुआ था।
आरव की नज़र अब भी उस लाल स्याही से लिखी तारीख़ पर जमी थी।
सात साल पुरानी...
यानी...
जिस रात उसकी मौत लिखी गई थी...
वह रात तो बहुत पहले बीत चुकी थी।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
“अगर... मैं सात साल पहले मर चुका हूँ...”
“...तो फिर मैं हूँ कौन?”
अचानक...
किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
आरव चीखते हुए पलटा।
वही लड़की...
इस बार उसके चेहरे पर घबराहट नहीं...
बल्कि गहरा दुःख था।
उसने धीरे से कहा—
“अब तुम्हें यहाँ नहीं रुकना चाहिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि...”
“वह जाग चुका है।”
“कौन?”
लड़की ने उत्तर नहीं दिया।
उसने बस आरव का हाथ पकड़ा और हवेली के पिछले हिस्से की ओर भागने लगी।
दोनों अँधेरे गलियारों से गुज़रे।
दीवारों पर लगी तस्वीरें एक-एक करके उनकी नज़रों के सामने आईं।
अचानक...
आरव रुक गया।
एक तस्वीर ने उसका ध्यान खींच लिया।
वह तस्वीर लगभग पचास साल पुरानी लग रही थी।
उसमें एक बड़ा संयुक्त परिवार खड़ा था।
बीच में एक छोटा लड़का मुस्कुरा रहा था।
आरव ने टॉर्च की रोशनी तस्वीर पर डाली...
और उसके हाथ काँप उठे।
वह लड़का...
बिल्कुल उसी जैसा दिखता था।
एक जैसी आँखें...
एक जैसा चेहरा...
यहाँ तक कि दाएँ गाल पर वही छोटा-सा तिल।
“यह... मैं हूँ?”
लड़की ने धीमे स्वर में कहा—
“नहीं...”
“यह तुम नहीं हो।”
“लेकिन दुनिया ने हमेशा तुम्हें उसी की जगह खड़ा किया।”
आरव ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
“मतलब?”
लड़की कुछ कह पाती...
उससे पहले...
तस्वीर अपने आप दीवार से गिर गई।
धड़ाम!
काँच टूट गया।
टूटे हुए फ़्रेम के पीछे...
एक पुराना अख़बार छिपा हुआ था।
आरव ने उसे निकाला।
अख़बार पीला पड़ चुका था।
ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था—
“हवेली के उत्तराधिकारी की रहस्यमय मौत”
उसके नीचे एक धुंधली तस्वीर थी।
आरव ने जैसे ही तस्वीर देखी...
उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
तस्वीर में पड़ा मृत शरीर...
उसी का था।
या...
कम से कम...
वैसा ही दिख रहा था।
लेकिन सबसे डरावनी बात अभी बाकी थी।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
“मृतक की आयु — 30 वर्ष।”
आरव ने अख़बार धीरे-धीरे नीचे किया।
उसकी उम्र भी...
तीस वर्ष ही थी।
कमरे में फिर वही भारी आवाज़ गूँजी—
“मैंने कहा था न... तुम देर से आए हो।”
इस बार आवाज़ कहीं दूर से नहीं...
आरव के बिल्कुल पीछे से आई थी।
उसकी साँसें रुक गईं।
वह धीरे-धीरे पलटा।
टॉर्च की रोशनी काँप रही थी।
रोशनी सामने पहुँची...
और पहली बार...
उसे वह बूढ़ा आदमी साफ़ दिखाई दिया।
सफ़ेद दाढ़ी...
काले कपड़े...
हाथ में वही पीतल की चाबी।
लेकिन...
उसकी आँखें...
पूरी तरह काली थीं।
बूढ़ा मुस्कुराया।
“पहचान लिया?”
आरव ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“तुम... कौन हो?”
बूढ़े ने उत्तर देने के बजाय अपनी जेब से एक पुरानी जेब-घड़ी निकाली।
घड़ी रुकी हुई थी।
समय था...
2 बजकर 13 मिनट।
उसने घड़ी आरव की हथेली पर रख दी।
“जब यह घड़ी फिर से चलने लगे...”
“...तब तेरहवाँ कमरा खुद तुम्हें बुलाएगा।”
इतना कहकर बूढ़ा आदमी धुएँ की तरह हवा में घुलने लगा।
लेकिन गायब होने से पहले...
उसने एक आख़िरी वाक्य कहा—
“सच कमरे के अंदर नहीं है, आरव...”
“सच तो यह है कि... तुम कभी इस हवेली से गए ही नहीं।”
अगले ही पल...
पूरी हवेली में एक साथ तेरह घंटियाँ गूँज उठीं।
टन... टन... टन...
और दूसरी मंज़िल पर...
कमरा नंबर 13 का दरवाज़ा...
धीरे-धीरे...
अपने आप खुलने लगा।
अंदर से...
हल्की पीली रोशनी बाहर फैलने लगी।
लेकिन रोशनी के साथ...
एक लड़की की सिसकियों की आवाज़ भी आ रही थी।
वह आवाज़...
उसी रहस्यमयी लड़की की थी...
जो इस समय आरव के बिल्कुल बगल में खड़ी थी।
आरव ने उसकी ओर देखा।
वह रो रही थी।
और बहुत धीमे से बोली—
“अगर तुम उस कमरे में गए... तो इस बार मैं तुम्हें बचा नहीं पाऊँगी...”
भाग 5 — “तेरहवाँ कमरा”
“हर इंसान के जीवन में एक ऐसा कमरा होता है... जहाँ वह कभी जाना नहीं चाहता। क्योंकि वहाँ सच नहीं, उसका सबसे बड़ा डर रहता है।”
रात के 2 बजकर 13 मिनट।
जैसे ही हवेली की तेरहवीं घंटी थमी...
दूसरी मंज़िल पर बना कमरा नंबर 13 धीरे-धीरे अपने आप खुल गया।
दरवाज़ा खुलते ही अंदर से ठंडी हवा का एक झोंका निकला।
उस हवा में मिट्टी की गंध नहीं थी...
बल्कि किसी पुराने अस्पताल जैसी तीखी दवाइयों की गंध थी।
आरव अनायास ही एक कदम पीछे हट गया।
उसके बगल में खड़ी लड़की ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“मत जाओ...”
उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं।
“तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि अंदर क्या है।”
आरव ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।
“अगर मुझे सच जानना है...
तो मुझे अंदर जाना ही होगा।”
लड़की ने धीरे से सिर झुका लिया।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“सच कभी किसी को आज़ाद नहीं करता...
कभी-कभी...
वह इंसान से उसकी पूरी ज़िंदगी छीन लेता है।”
आरव ने उसका हाथ धीरे से अलग किया।
और...
दरवाज़े के भीतर कदम रख दिया।
कमरे के अंदर घुप्प अँधेरा था।
लेकिन जैसे ही उसने टॉर्च जलाई...
उसकी साँस अटक गई।
यह किसी बंद कमरे जैसा बिल्कुल नहीं था।
यह...
एक पुराना बच्चों का कमरा था।
लकड़ी का छोटा बिस्तर...
दीवारों पर हाथ से बने सितारे...
एक टूटी हुई लाल साइकिल...
कोने में रखा हुआ एक टेडी बियर...
और...
खिड़की के पास रखा एक छोटा-सा मेज़।
सब कुछ ऐसा लग रहा था...
मानो कोई बच्चा अभी-अभी यहाँ से उठकर गया हो।
लेकिन कमरे में धूल का एक कण भी नहीं था।
जैसे समय ने इस कमरे को छुआ ही न हो।
आरव धीरे-धीरे उस मेज़ के पास पहुँचा।
वहाँ एक खुली हुई कॉपी रखी थी।
पहले पन्ने पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—
“यह मेरी गुप्त डायरी है।
कोई नहीं पढ़ेगा।”
नीचे...
एक नाम लिखा था।
आरव।
उसकी उँगलियाँ सुन्न पड़ गईं।
“यह... मेरी लिखावट कैसे हो सकती है?”
उसने काँपते हाथों से अगला पन्ना पलटा।
10 जून
“आज पापा ने कहा कि मैं बहुत सवाल पूछता हूँ।
लेकिन मुझे डर लगता है।
रात में वही बूढ़ा आदमी फिर आया था।
उसने कहा—‘जब तुम तीस साल के हो जाओगे... मैं तुम्हें लेने वापस आऊँगा।’”
आरव का गला सूख गया।
उसने जल्दी-जल्दी अगले पन्ने पलटे।
18 जुलाई
“माँ कहती हैं कि कमरे नंबर 13 में कभी नहीं जाना।
लेकिन मुझे लगता है कि उस कमरे में कोई बच्चा रोता है।
शायद... वह मैं ही हूँ।”
अचानक...
कॉपी अपने आप बंद हो गई।
धप्प!
कमरे का तापमान एकदम गिर गया।
टॉर्च की रोशनी टिमटिमाने लगी।
और तभी...
पीछे से किसी छोटे बच्चे की हँसी सुनाई दी।
“ही... ही... ही...”
आरव ने पलटकर देखा।
कोई नहीं।
लेकिन...
कमरे के बीचों-बीच रखी लाल साइकिल...
अपने आप चलने लगी।
धीरे...
फिर तेज़...
फिर इतनी तेज़ कि उसके पहिए दिखाई देना बंद हो गए।
आरव डरकर पीछे हट गया।
उसी समय...
दीवार पर लगा एक पुराना आईना अपने आप चमकने लगा।
आईने में...
कमरा वैसा नहीं दिख रहा था जैसा वास्तव में था।
आईने के भीतर...
कमरा पूरी तरह जला हुआ था।
दीवारों पर काले धब्बे थे।
फर्श पर राख बिखरी थी।
और...
आईने में खड़ा आरव...
वर्तमान वाला आरव नहीं था।
वह लगभग दस साल का बच्चा था।
वह बच्चा रो रहा था।
और बार-बार एक ही बात कह रहा था—
“मैंने नहीं किया...”
“मैंने किसी को नहीं मारा...”
आरव की धड़कनें रुक-सी गईं।
“यह... कौन है?”
तभी...
आईने में खड़े बच्चे ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसने सीधे आरव की ओर देखा...
और काँपती आवाज़ में कहा—
“तुम मुझे भूल गए...”
“लेकिन मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाया...”
इतना कहते ही...
आईने पर खून जैसा लाल रंग फैल गया।
और उस पर एक-एक करके शब्द उभरने लगे—
“हत्यारा कौन था?”
“तुम?”
“या...”
अचानक पूरा कमरा ज़ोर से काँप उठा।
बाहर से उसी रहस्यमयी लड़की की चीख सुनाई दी—
“आरव... भागो!”
उसी पल...
कमरे का दरवाज़ा अपने आप धड़ाम! से बंद हो गया।
टॉर्च बुझ गई।
चारों ओर अँधेरा छा गया।
और उस अँधेरे में...
आरव ने पहली बार किसी की गर्म साँस अपने कान के बिल्कुल पास महसूस की।
एक भारी, टूटी हुई आवाज़ फुसफुसाई—
“तुम सच जानना चाहते थे न...”
“तो अब बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं है...”
और तभी...
किसी ने...
अँधेरे में...
आरव का हाथ पकड़ लिया।
भाग 6 — “जिसकी यादें तुम्हारी नहीं थीं...”
“यादें कभी झूठ नहीं बोलतीं... लेकिन उन्हें झूठ बोलना सिखाया जा सकता है।”
पूरा कमरा अँधेरे में डूब चुका था।
आरव को सिर्फ़ अपनी धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
उसका हाथ अब भी किसी ने कसकर पकड़ रखा था।
वह पूरी ताक़त से छूटने की कोशिश करने लगा।
“क... कौन हो तुम?”
कोई उत्तर नहीं।
सिर्फ़ एक लंबी, ठंडी साँस...
जो उसके चेहरे से टकराई।
अचानक...
कमरे के बीचों-बीच रखी पुरानी दीवार-घड़ी अपने आप चलने लगी।
टिक...
टिक...
टिक...
लेकिन...
हर टिक के साथ कमरे की दीवारें बदलने लगीं।
पुराना बच्चों का कमरा धीरे-धीरे गायब होने लगा।
लकड़ी का बिस्तर...
लाल साइकिल...
टेडी बियर...
सब धुएँ की तरह हवा में घुल गए।
उनकी जगह...
सफ़ेद दीवारें उभर आईं।
चमकदार फ़र्श।
छत पर जलती ट्यूब लाइट।
और हवा में फैली तेज़ दवाइयों की गंध।
आरव ने चारों ओर देखा।
यह...
हवेली का कमरा नहीं था।
यह किसी अस्पताल जैसा लग रहा था।
दीवार पर एक बोर्ड टँगा था—
“स्मृति पुनर्वास कक्ष – 13”
आरव की आँखें फैल गईं।
“स्मृति... पुनर्वास?”
उसी समय...
कमरे के दूसरे छोर पर एक पुरानी व्हीलचेयर अपने आप घूमी।
उस पर कोई बैठा था।
चेहरा अँधेरे में छिपा हुआ।
वह धीरे-धीरे बोला—
“स्वागत है...”
“...तुम फिर लौट आए।”
आरव ने काँपते हुए पूछा—
“तुम कौन हो?”
वह व्यक्ति हल्का-सा हँसा।
“हर बार यही पूछते हो।”
“और हर बार...”
“...भूल जाते हो।”
उसने अपनी गोद से एक मोटी फ़ाइल उठाई।
फ़ाइल के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—
रोगी संख्या – 213
नीचे नाम...
आरव शर्मा।
आरव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“नहीं...”
“यह झूठ है...”
उसने फ़ाइल छीन ली।
पहला पन्ना...
दूसरा...
तीसरा...
हर पन्ने पर उसकी ही तस्वीर थी।
लेकिन...
हर तस्वीर में उसकी उम्र अलग थी।
10 साल...
15 साल...
22 साल...
30 साल...
और हर तस्वीर के नीचे एक ही टिप्पणी लिखी थी—
“रोगी फिर सब भूल गया।”
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“यह किसने लिखा?”
तभी...
पीछे से वही लड़की बोली—
“जिसने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।”
आरव पलटा।
वह दरवाज़े के पास खड़ी थी।
लेकिन इस बार...
उसके कपड़ों पर मिट्टी नहीं...
खून के धब्बे थे।
आरव घबरा गया।
“तुम्हें क्या हुआ?”
वह मुस्कुराई।
“हर बार यही होता है।”
“जब भी तुम सच के पास पहुँचते हो...”
“...मैं मर जाती हूँ।”
आरव चीख पड़ा—
“बस!”
“आख़िर तुम हो कौन?”
लड़की की आँखों में आँसू भर आए।
उसने पहली बार अपना नाम बताया—
“मेरा नाम... मीरा है।”
“और...”
“मैं इस कहानी की शुरुआत नहीं...”
“...उसका अंत हूँ।”
इतना कहते ही...
पूरे कमरे की लाइटें एक साथ बुझ गईं।
सिर्फ़ एक लाल बल्ब जलने लगा।
लाल रोशनी में...
दीवार पर एक शीशा दिखाई दिया।
उस शीशे में आरव अकेला नहीं था।
उसके पीछे...
दर्जनों लोग खड़े थे।
कुछ बच्चे...
कुछ बूढ़े...
कुछ औरतें...
सभी के चेहरे धुँधले थे।
लेकिन...
उनकी आँखें सिर्फ़ आरव को देख रही थीं।
फिर...
एक साथ...
सभी ने एक ही वाक्य कहा—
“हमें याद करो...”
“हमें तुम्हीं ने भुलाया है...”
कमरा अचानक ज़ोर से काँप उठा।
फ़र्श में एक लंबी दरार पड़ गई।
दरार के भीतर से...
लोहे की एक पुरानी तिजोरी दिखाई दी।
उस पर सिर्फ़ एक संख्या लिखी थी—
13
तिजोरी के साथ एक चिट्ठी रखी थी।
उस पर लिखा था—
“इसे खोलने से पहले आख़िरी बार सोच लो।”
“इसके बाद तुम कभी पहले जैसे नहीं रहोगे।”
आरव ने काँपते हाथों से तिजोरी की ओर हाथ बढ़ाया...
तभी...
किसी ने पीछे से ज़ोर से उसका नाम पुकारा—
“आरव!”
आवाज़ इतनी परिचित थी...
कि उसकी आँखों से आँसू निकल आए।
वह आवाज़...
उसकी माँ की थी।
लेकिन...
उसकी माँ को मरे हुए...
पंद्रह साल हो चुके थे।
आरव धीरे-धीरे पलटा।
दरवाज़े पर एक औरत खड़ी थी।
चेहरे पर वही ममता...
वही मुस्कान...
वही साड़ी...
जिसमें उसने अपनी माँ को आख़िरी बार देखा था।
उसने काँपते हुए सिर्फ़ इतना कहा—
“बेटा... इस बार तिजोरी मत खोलना...”
और अगले ही पल...
उसकी माँ के चेहरे पर गहरी दरारें पड़ने लगीं...
जैसे वह इंसान नहीं...
बल्कि एक पुरानी तस्वीर हो...
जो समय के बोझ से टूट रही हो।
भाग 7 — “बीस साल पहले की वह रात...”
“कुछ रातें कभी खत्म नहीं होतीं... वे सिर्फ़ लोगों की यादों में दफ़न हो जाती हैं।”
तिजोरी के सामने खड़ा आरव...
अपनी माँ को देख रहा था।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“माँ...”
वह धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा।
लेकिन जैसे ही उसने उनका हाथ पकड़ना चाहा...
उसकी उँगलियाँ हवा को छूकर रह गईं।
माँ वहीं थीं...
लेकिन थीं भी नहीं।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“तुम्हें हमेशा जल्दी रहती थी, आरव...”
“सच तक पहुँचने की भी...”
“...और लोगों को खोने की भी।”
आरव की आवाज़ भर्रा गई।
“मुझे कुछ याद क्यों नहीं है?”
माँ ने उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने बस अपनी हथेली उसके सिर पर रखी।
उसी क्षण...
पूरा कमरा सफ़ेद रोशनी से भर गया।
आरव की आँखें अपने-आप बंद हो गईं।
जब उसने आँखें खोलीं...
तो वह फिर हवेली में नहीं था।
उसके सामने वही हवेली थी...
लेकिन बिल्कुल नई।
दीवारों पर ताज़ा रंग था।
बगीचे में बच्चे खेल रहे थे।
बरामदे में रंग-बिरंगी झालरें लगी थीं।
अंदर से हँसी की आवाज़ें आ रही थीं।
आरव स्तब्ध रह गया।
“यह...”
“यह तो बीस साल पहले की हवेली है...”
उसने देखा...
मुख्य दरवाज़े से एक दस साल का लड़का भागता हुआ बाहर निकला।
उसके हाथ में लाल रंग की छोटी-सी लकड़ी की कार थी।
लड़का हँस रहा था।
उसकी माँ उसके पीछे दौड़ रही थीं।
“आरव...”
“धीरे भागो!”
आरव का दिल धड़क उठा।
वह बच्चा...
वह ख़ुद था।
या कम-से-कम...
बिल्कुल उसी जैसा।
उसी समय...
एक लड़की उसके पास आकर खड़ी हुई।
छोटी-सी...
दो चोटियाँ...
हाथ में सफ़ेद चमेली के फूल।
उसने हँसते हुए उस लड़के से कहा—
“तुम फिर हार गए!”
लड़का मुस्कुराया।
“अगली बार मैं जीतूँगा, मीरा।”
आरव सन्न रह गया।
“मीरा...”
यानी...
वह रहस्यमयी लड़की...
वह इस हवेली में बचपन से थी।
दोनों बच्चे बगीचे में दौड़ने लगे।
हँसी...
मासूमियत...
खुशियाँ...
सब कुछ इतना सच्चा था...
कि कुछ पल के लिए आरव भूल गया कि वह किस दुनिया में है।
तभी...
आसमान अचानक काला पड़ गया।
तेज़ हवा चलने लगी।
हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।
धड़ाम!
बगीचे में खेल रहे सारे लोग एकाएक गायब हो गए।
सिर्फ़ दो बच्चे बचे—
आरव...
और मीरा।
दोनों डरकर एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं।
तभी...
मुख्य दरवाज़े पर...
एक काली कार आकर रुकती है।
उसमें से तीन लोग उतरते हैं।
सभी ने लंबे काले कोट पहन रखे थे।
उनके चेहरे दिखाई नहीं दे रहे थे।
सबसे आगे खड़ा आदमी अपनी जेब से एक पुरानी जेब-घड़ी निकालता है।
घड़ी में समय था—
2 बजकर 13 मिनट।
वह धीमी आवाज़ में कहता है—
“आज से यह प्रयोग शुरू होगा।”
प्रयोग?
आरव के कानों में यह शब्द हथौड़े की तरह गूँजा।
तीनों आदमी हवेली के अंदर चले गए।
कुछ ही सेकंड बाद...
पूरी हवेली से बच्चों की चीखें सुनाई देने लगीं।
“माँ...!”
“मुझे बचाओ!”
“दरवाज़ा खोलो!”
आरव भागकर अंदर जाना चाहता था...
लेकिन उसके पैर ज़मीन से चिपक गए।
वह सिर्फ़ देख सकता था।
कुछ नहीं कर सकता था।
दूसरी मंज़िल पर...
कमरा नंबर 13 की खिड़की से तेज़ पीली रोशनी बाहर आ रही थी।
फिर...
एक भयानक धमाका हुआ।
धम्म्म!
पूरी हवेली काँप उठी।
खिड़कियों के शीशे टूट गए।
और...
एक छोटी-सी परछाईं...
दूसरी मंज़िल की खिड़की से नीचे गिरी।
आरव चीख पड़ा।
“नहीं...!”
वह दौड़कर उस परछाईं के पास पहुँचा।
वह एक बच्ची थी।
उसके हाथ में अब भी चमेली के फूल थे।
मीरा...
उसकी साँसें टूट रही थीं।
उसने काँपते हुए अपनी मुट्ठी खोली।
उसकी हथेली में एक छोटी-सी पीतल की चाबी थी।
उसी चाबी पर खुदा था—
13
मीरा ने टूटती हुई आवाज़ में कहा—
**”अगर... तुम... भूल गए...”
“...तो... यह चाबी... तुम्हें... वापस बुला लेगी...”
उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।
आरव चीखता रहा—
“मीरा...!”
लेकिन...
अगले ही पल...
पूरा दृश्य काँच की तरह टूट गया।
आरव फिर उसी कमरे में खड़ा था।
तिजोरी उसके सामने थी।
उसकी मुट्ठी बंद थी।
उसने धीरे-धीरे अपनी हथेली खोली।
और उसका दिल रुक गया।
उसकी हथेली में...
वही पीतल की चाबी रखी थी।
यानी...
जो उसने अभी देखा...
वह सिर्फ़ सपना नहीं था।
तभी...
तिजोरी के अंदर से...
एक बहुत धीमी...
बच्चे की आवाज़ आई—
“आरव...”
“मैं अब भी यहीं बंद हूँ...”
और उसी क्षण...
तिजोरी का ताला...
अपने आप...
खट्...
से खुल गया।
भाग 8 — “तिजोरी के अंदर बंद आख़िरी सच”
“हर ताला किसी चीज़ को बंद करने के लिए नहीं लगाया जाता... कुछ ताले इसलिए लगाए जाते हैं कि कोई सच बाहर न आ जाए।”
खट्...
तिजोरी का ताला अपने-आप खुल गया।
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया कि आरव को अपनी धड़कनों की आवाज़ साफ़ सुनाई देने लगी।
उसने धीरे-धीरे तिजोरी का भारी लोहे का दरवाज़ा खोला।
अंदर...
न सोना था...
न पैसे...
न कोई पुरानी विरासत।
सिर्फ़ तीन चीज़ें थीं।
एक...
पुरानी चमड़े की डायरी।
दूसरी...
एक काला ऑडियो कैसेट।
और तीसरी...
एक छोटा-सा काँच का डिब्बा।
उस डिब्बे के भीतर...
सूखा हुआ चमेली का एक फूल रखा था।
आरव के हाथ काँप उठे।
“मीरा...”
उसके होंठों से अनायास उसका नाम निकल गया।
उसी क्षण...
पीछे से वही धीमी आवाज़ आई—
“उसे आज भी चमेली की खुशबू पसंद है...”
आरव ने पलटकर देखा।
मीरा वहीं खड़ी थी।
लेकिन...
इस बार वह पहले जैसी नहीं दिख रही थी।
उसके चेहरे पर हल्की-हल्की चोटों के निशान थे।
और उसके दाएँ हाथ से लगातार खून टपक रहा था।
आरव घबरा गया।
“तुम्हें ये सब कैसे हुआ?”
मीरा मुस्कुराई।
उस मुस्कान में दर्द था।
“हर बार...”
“जब तुम सच के एक कदम और करीब आते हो...”
“...मैं थोड़ा और मिट जाती हूँ।”
आरव कुछ समझ नहीं पाया।
“मिट जाती हो...?”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने बस डायरी की ओर इशारा किया।
“पहले इसे पढ़ो।”
डायरी का पहला पन्ना खुलते ही ऊपर लिखा था—
“डॉ. ईशान राघव – निजी अभिलेख”
नीचे तारीख़ थी—
18 अगस्त, 2006
आरव ने पढ़ना शुरू किया।
“आज प्रयोग सफल रहा।”
“मानव मस्तिष्क से यादें हटाई जा सकती हैं...”
“लेकिन एक समस्या है...”
“कुछ भावनाएँ मिटती नहीं...”
“विशेषकर प्रेम और अपराधबोध...”
आरव की साँसें तेज़ हो गईं।
उसने अगला पन्ना पलटा।
“रोगी संख्या 213...”
“हर बार अपना नाम भूल जाता है...”
“लेकिन हर बार ‘मीरा’ नाम सुनते ही उसकी नब्ज़ बदल जाती है।”
आरव के हाथ काँपने लगे।
रोगी संख्या...
213।
यही संख्या उसने फ़ाइल पर भी देखी थी।
उसने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटने शुरू किए।
अचानक...
एक तस्वीर डायरी के बीच से नीचे गिर पड़ी।
उसने तस्वीर उठाई।
तस्वीर में...
एक अस्पताल का कमरा था।
बिस्तर पर एक छोटा लड़का बेहोश पड़ा था।
उसके सिर पर पट्टियाँ बँधी थीं।
पास खड़ी एक लड़की उसका हाथ पकड़े रो रही थी।
पीछे...
सफ़ेद कोट पहने तीन डॉक्टर खड़े थे।
लेकिन...
सबसे डरावनी बात...
उस तस्वीर के पीछे लिखी हुई थी—
“रोगी को नया जीवन देने के लिए उसकी सारी यादें मिटा दी गईं।”
“मीरा को भूलना आवश्यक था।”
आरव की आँखों के सामने सब धुँधला होने लगा।
“उन्होंने...”
“मेरी यादें... जानबूझकर मिटाईं?”
मीरा की आँखें भर आईं।
“हाँ...”
“लेकिन...”
“उन्होंने सिर्फ़ यादें नहीं मिटाईं...”
“...उन्होंने तुम्हारी पूरी पहचान बदल दी।”
आरव एक कदम पीछे हट गया।
“नहीं...”
“यह सच नहीं हो सकता।”
मीरा ने पहली बार उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
“अगर सच देखना चाहते हो...”
“...तो कैसेट चला दो।”
आरव ने काँपते हाथों से पुराना कैसेट उठाया।
कमरे के कोने में रखा पुराना टेप रिकॉर्डर अचानक अपने-आप चालू हो गया।
कैसेट उसके भीतर चला गया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ़ खरखराहट सुनाई दी।
फिर...
एक आदमी की भारी आवाज़ गूँजी।
“रिकॉर्ड संख्या – 13।”
“अगर यह रिकॉर्डिंग कोई सुन रहा है...”
“...तो इसका मतलब है कि प्रयोग विफल हो चुका है।”
आरव का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
आवाज़ आगे बोली—
“रोगी संख्या 213 की यादें बार-बार लौट आती हैं...”
“...और हर बार वह उसी लड़की तक पहुँच जाता है...”
“...जिसे हमने बीस साल पहले मरता हुआ घोषित कर दिया था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव ने धीरे-धीरे मीरा की ओर देखा।
उसकी आँखों में डर उतर आया।
“मरता हुआ... घोषित?”
“तो...”
“क्या तुम...”
मीरा ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
वह बस इतना बोली—
“मैं कभी मरी ही नहीं, आरव...”
“मुझे दुनिया से छिपा दिया गया था।”
उसी क्षण...
पूरी हवेली ज़ोर से काँप उठी।
दीवारों पर लंबी दरारें पड़ने लगीं।
कमरा नंबर 13 की छत से मिट्टी गिरने लगी।
और...
टेप रिकॉर्डर में वही आवाज़ आख़िरी बार सुनाई दी—
“अगर मीरा ज़िंदा है...”
“...तो समझ लो...”
“...असली हत्यारा भी ज़िंदा है।”
धड़ाम!
कमरे का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया।
बाहर किसी के भारी कदमों की आवाज़ आने लगी।
ठक...
ठक...
ठक...
हर कदम...
दरवाज़े के और करीब आ रहा था।
मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“वह आ गया...”
आरव ने फुसफुसाकर पूछा—
“कौन...?”
मीरा ने दरवाज़े की ओर देखते हुए कहा—
“जिसने उस रात हम दोनों की ज़िंदगी बदल दी थी...”
अगले ही पल...
दरवाज़े के नीचे से...
किसी की परछाईं दिखाई दी।
और एक भारी आवाज़ गूँजी—
“दरवाज़ा खोलो, आरव...”
“इस बार... मैं तुम्हें सब याद दिलाने आया हूँ।”
भाग 9 — “दरवाज़े के उस पार खड़ा आदमी...”
“सबसे ख़तरनाक राक्षस वह नहीं होता जो अँधेरे में छिपा हो... बल्कि वह होता है जो बरसों तक इंसानों के बीच रहकर भी पहचान में न आए।”
ठक...
ठक...
ठक...
दरवाज़े पर दस्तक लगातार तेज़ होती जा रही थी।
मीरा का चेहरा डर से सफ़ेद पड़ चुका था।
उसने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“सुनो...”
“जो भी हो...”
“दरवाज़ा मत खोलना।”
आरव ने धीमी आवाज़ में पूछा—
“क्या वह... वही आदमी है?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
“मैंने उसकी आँखें आख़िरी बार बीस साल पहले देखी थीं...”
“...और आज भी हर रात उन्हीं आँखों से डरकर उठती हूँ।”
अचानक...
दरवाज़े के बाहर खड़ा आदमी हँसा।
धीमी...
लेकिन बेहद डरावनी हँसी।
फिर उसकी आवाज़ आई—
“मीरा...”
“तुम आज भी उसे बचा रही हो?”
आरव का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने पहली बार महसूस किया...
कि उस आदमी को मीरा का नाम भी पता था।
मीरा काँपने लगी।
उसने फुसफुसाकर कहा—
“उसे मत बताना कि तुम्हें सब याद आने लगा है...”
“वरना...”
“वह इस बार तुम्हें सचमुच मार देगा।”
इतने में...
दरवाज़े का हैंडल अपने-आप घूमने लगा।
खट्...
खट्...
खट्...
लेकिन दरवाज़ा खुल नहीं रहा था।
अचानक...
कमरे के बीचों-बीच रखी पुरानी घड़ी तेज़ी से उल्टी दिशा में घूमने लगी।
टिक... टिक... टिक...
हर टिक के साथ...
आरव की आँखों के सामने अजीब-अजीब दृश्य चमकने लगे।
एक ऑपरेशन थिएटर...
तेज़ सफ़ेद रोशनी...
रोते हुए बच्चे...
किसी की चीख—
“उसकी यादें मिटाओ!”
दूसरी आवाज़—
“लेकिन सर... वह मर जाएगा!”
पहली आवाज़—
**”अगर यादें बच गईं...”
“...तो हम सब मर जाएँगे।”
आरव ने दोनों कान पकड़ लिए।
“बस...!”
“बस करो!”
लेकिन आवाज़ें रुकने के बजाय और तेज़ हो गईं।
उसी समय...
मीरा ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया।
“आरव!”
“मेरी तरफ़ देखो!”
“सिर्फ़ मेरी तरफ़!”
आरव ने जैसे ही उसकी आँखों में देखा...
सारी आवाज़ें अचानक बंद हो गईं।
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
मीरा ने बहुत धीरे से कहा—
“तुम्हें याद है...”
“...हमने बचपन में एक वादा किया था?”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं...”
मीरा हल्का-सा मुस्कुराई।
उस मुस्कान में टूटा हुआ बचपन था।
“तुमने कहा था...”
‘अगर पूरी दुनिया भी हमें भूल जाए...
...तो हम एक-दूसरे को कभी नहीं भूलेंगे।’
आरव की आँखों के सामने अचानक एक दृश्य चमका।
बारिश...
दो बच्चे...
चमेली का पेड़...
और एक छोटी-सी लड़की...
जो उसकी कलाई पर लाल धागा बाँध रही थी।
उसके मुँह से अनायास निकला—
“मीरा...”
मीरा की आँखें भर आईं।
“हाँ...”
“तुम्हें याद आ रहा है...”
लेकिन उसी क्षण...
दरवाज़ा ज़ोरदार धमाके के साथ खुल गया।
धड़ाआआम!
ठंडी हवा पूरे कमरे में फैल गई।
दरवाज़े पर एक लंबा आदमी खड़ा था।
काला ओवरकोट...
हाथ में पुरानी जेब-घड़ी...
चेहरा अँधेरे में छिपा हुआ।
वह धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।
हर कदम के साथ फ़र्श काँप रहा था।
आरव ने हिम्मत करके पूछा—
“तुम कौन हो?”
आदमी कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर आरव की ओर बढ़ाते हुए बोला—
“पहले यह देखो...”
आरव ने तस्वीर हाथ में ली।
तस्वीर में...
एक परिवार खड़ा था।
माँ...
पिता...
एक छोटा लड़का...
और उनके पीछे...
मुस्कुराता हुआ वही आदमी।
लेकिन...
तस्वीर के नीचे जो लिखा था...
उसे पढ़ते ही आरव के हाथ काँपने लगे।
“डॉ. विराज सेन और उनका दत्तक पुत्र — आरव।”
आरव की साँस रुक गई।
“दत्तक... पुत्र?”
उसने घबराकर उस आदमी की ओर देखा।
आदमी ने पहली बार अपने चेहरे पर पड़ रही टोपी को थोड़ा ऊपर उठाया।
बस उसकी आँखें दिखाई दीं।
ठंडी...
निर्दयी...
और अजीब तरह से परिचित।
वह मुस्कुराया।
और बोला—
“तुम मुझे नहीं पहचानोगे...”
“...लेकिन मैंने तुम्हें चलना सिखाया था।”
“मैंने ही तुम्हारा नाम रखा था।”
“और...”
वह एक कदम और आगे बढ़ा।
“मैंने ही तुम्हारी यादें तुमसे छीन ली थीं।”
मीरा चीख उठी—
“आरव! उसकी बात मत सुनना!”
लेकिन...
बहुत देर हो चुकी थी।
क्योंकि उसी पल...
आरव के सिर में भयानक दर्द उठा।
उसकी आँखों के सामने एक चेहरा बार-बार उभरने लगा।
एक आदमी...
सफ़ेद कोट में...
जो मुस्कुराकर एक छोटे बच्चे से कह रहा था—
“डरो मत बेटा...”
“जब तुम जागोगे...”
“...तो तुम्हें कुछ भी याद नहीं रहेगा।”
आरव के होंठ काँपे।
उसने अनायास फुसफुसाया—
“...डॉक्टर... विराज...”
दरवाज़े पर खड़ा आदमी मुस्कुराया।
“शाबाश...”
“आख़िरकार...”
“तुम्हें मेरी पहली याद लौट ही आई।”
और उसी क्षण...
कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।
अँधेरे में सिर्फ़ एक आवाज़ गूँजी—
“अब खेल सचमुच शुरू होगा...”
भाग 10 — “जिसने यादों का क़त्ल किया...”
“किसी इंसान को मारना सबसे बड़ा अपराध नहीं... किसी से उसकी पहचान छीन लेना उससे भी बड़ा अपराध है।”
पूरा कमरा अँधेरे में डूब चुका था।
सिर्फ़ डॉ. विराज की जेब-घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
टिक...
टिक...
टिक...
हर टिक के साथ आरव के सिर का दर्द बढ़ता जा रहा था।
वह अपने घुटनों पर गिर पड़ा।
उसके कानों में सैकड़ों आवाज़ें गूँजने लगीं।
“आरव...”
“भागो...”
“उसे मत छोड़ना...”
“यादें मिटा दो...”
“प्रयोग असफल हो जाएगा...”
आरव ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया।
“बस...”
“बस...!”
डॉ. विराज उसके सामने आकर खड़े हो गए।
उनकी आवाज़ अब पहले जैसी ठंडी नहीं थी।
उसमें अजीब-सी थकान थी।
“दर्द हो रहा है?”
आरव ने गुस्से से उनकी ओर देखा।
“तुमने...”
“तुमने मेरे साथ क्या किया था?”
डॉ. विराज कुछ पल तक चुप रहे।
फिर बोले—
“जो एक पिता अपने बेटे को बचाने के लिए करता...”
“मैंने वही किया।”
आरव की आँखें फैल गईं।
“क्या कहा तुमने?”
“बेटा...?”
मीरा तुरंत बीच में आ गई।
“झूठ!”
“इनकी एक भी बात मत सुनो!”
लेकिन विराज ने पहली बार मीरा की ओर देखा।
उनकी आँखों में पछतावा झलक रहा था।
“मीरा...”
“मैंने तुमसे भी सब कुछ छीन लिया...”
“लेकिन मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।”
अचानक...
कमरे की दीवारों पर लगी दरारों से लाल रोशनी निकलने लगी।
एक-एक करके दीवारें बदलने लगीं।
अब वह कमरा नहीं था...
बल्कि एक विशाल भूमिगत प्रयोगशाला थी।
काँच के बड़े-बड़े चैंबर...
अजीब मशीनें...
तार...
पुराने कंप्यूटर...
और दीवार पर एक बड़ा-सा चिन्ह—
PROJECT 213
आरव ने काँपती आवाज़ में पढ़ा—
“प्रोजेक्ट... 213...”
विराज ने धीरे से कहा—
“यही वह जगह है...”
“...जहाँ तुम्हारी ज़िंदगी दो बार शुरू हुई थी।”
आरव कुछ समझ नहीं पाया।
“दो बार?”
विराज ने सामने रखी मशीन की ओर इशारा किया।
“पहली बार...”
“जब तुम्हारा जन्म हुआ।”
“दूसरी बार...”
“जब तुम्हारी सारी यादें मिटाकर तुम्हें नया जीवन दिया गया।”
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
“नया जीवन नहीं...”
“झूठी ज़िंदगी।”
अचानक...
एक पुराना कंप्यूटर अपने आप चालू हो गया।
स्क्रीन पर धुँधली-सी वीडियो चलने लगी।
वीडियो में...
दस साल का आरव...
एक बिस्तर पर लेटा हुआ था।
उसके सिर पर कई तार जुड़े थे।
पास खड़ी मीरा लगातार रो रही थी।
वह बार-बार कह रही थी—
“उसे मत छीनिए...”
“उसे सब याद रहने दीजिए...”
तभी वीडियो में डॉ. विराज दिखाई दिए।
उन्होंने कैमरे की ओर देखकर कहा—
“रिकॉर्ड नंबर 13।”
“अगर यह वीडियो भविष्य में कभी आरव देखे...”
“...तो इसका मतलब है कि मैं असफल हो चुका हूँ।”
आरव की साँसें थम गईं।
वीडियो में विराज आगे बोले—
“जिस रात हवेली में आग लगी...”
“...उस रात किसी बच्चे ने किसी की हत्या नहीं की थी।”
मीरा ने आश्चर्य से विराज की ओर देखा।
आरव की आँखें फैल गईं।
“तो...”
“हत्यारा कौन था?”
वीडियो अचानक रुक गया।
स्क्रीन काली हो गई।
पूरे कमरे में फिर वही डरावना सन्नाटा फैल गया।
तभी...
प्रयोगशाला के सबसे आख़िरी कोने से...
एक धीमी ताली की आवाज़ सुनाई दी।
ठाक...
ठाक...
ठाक...
तीनों ने एक साथ उधर देखा।
अँधेरे से कोई बाहर आ रहा था।
उसके कदमों की आवाज़ बहुत धीमी थी।
लेकिन...
हर कदम के साथ कमरे का तापमान गिरता जा रहा था।
वह रोशनी में आया...
और आरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
क्योंकि...
वह आदमी...
डॉ. विराज नहीं था।
वह...
बिल्कुल आरव जैसा दिखता था।
एक जैसा चेहरा...
एक जैसी आँखें...
एक जैसी आवाज़...
यहाँ तक कि दाएँ गाल पर वही तिल।
वह मुस्कुराया।
और बोला—
“डॉक्टर साहब...”
“आपने इसे आधा सच बता दिया।”
फिर उसने सीधे आरव की ओर देखा।
उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
और उसने कहा—
“अब मैं इसे पूरा सच बताऊँगा...”
“...क्योंकि मैं ही वह आरव हूँ...”
“...जो उस रात कभी मरा ही नहीं था।”
कमरे की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।
दूर कहीं...
फिर वही घड़ी बजी।
टन...
टन...
टन...
और इस बार...
तेरहवीं घंटी के साथ...
पूरा भूमिगत कमरा ज़ोर से हिल उठा।
भाग 11 — “दो चेहरों का सच”
“सबसे बड़ा झूठ वह नहीं होता जो कोई तुमसे बोलता है... सबसे बड़ा झूठ वह होता है, जिस पर तुम पूरी ज़िंदगी विश्वास करते रहते हो।”
टन... टन... टन...
तेरहवीं घंटी की गूँज धीरे-धीरे पूरे भूमिगत कक्ष में फैल गई।
आरव की नज़र उस आदमी पर जमी थी...
जो बिल्कुल उसी जैसा दिखता था।
चेहरा...
आँखें...
आवाज़...
यहाँ तक कि साँस लेने का तरीका भी।
जैसे...
वह आईने के सामने खड़ा हो।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर वह दूसरा आदमी मुस्कुराया।
“क्या हुआ, आरव?”
“खुद को देखकर डर गए?”
आरव ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“तुम... कौन हो?”
उस आदमी ने गहरी साँस ली।
“यही सवाल तुम्हें बीस साल पहले पूछना चाहिए था।”
मीरा अचानक उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
“उसकी बात मत सुनना!”
“वह तुम्हें फिर से तोड़ देगा!”
आदमी ने मीरा की ओर देखा।
उसकी आँखों में पहली बार दर्द दिखाई दिया।
“मीरा...”
“तुम आज भी उसी रात में अटकी हुई हो।”
“और तुम?”
मीरा की आवाज़ काँप रही थी।
“तुम तो उसी रात मर चुके थे।”
आदमी हल्का-सा हँसा।
“काश...”
“ऐसा ही होता।”
डॉ. विराज ने दोनों के बीच आकर कहा—
“बस!”
“अब और झूठ नहीं।”
उन्होंने पास रखे कंप्यूटर का एक बटन दबाया।
पूरी दीवार पर एक विशाल स्क्रीन जल उठी।
स्क्रीन पर एक पुरानी वीडियो चलने लगी।
तारीख़—
17 अगस्त 2006
वीडियो में वही हवेली दिखाई दे रही थी।
लेकिन इस बार...
कैमरा सीधे कमरा नंबर 13 के अंदर था।
कमरे में...
दो बच्चे बैठे थे।
एक आरव...
और दूसरा...
बिल्कुल उसी जैसा दिखने वाला लड़का।
दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े मुस्कुरा रहे थे।
आरव की आँखें फैल गईं।
“यह...”
“यह कैसे संभव है?”
डॉ. विराज ने धीमे स्वर में कहा—
“क्योंकि...”
“तुम दोनों भाई नहीं थे।”
“तो फिर?”
“...तुम दोनों एक ही प्रयोग का हिस्सा थे।”
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
स्क्रीन पर वीडियो आगे बढ़ी।
एक वैज्ञानिक की आवाज़ सुनाई दी—
“प्रयोग संख्या 13।”
“उद्देश्य—एक ही स्मृति को दो अलग-अलग मस्तिष्कों में स्थापित करना।”
आरव का शरीर सुन्न पड़ गया।
“एक ही...”
“...यादें?”
विराज ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“तुम दोनों को एक ही बचपन दिया गया।”
“एक ही माँ की यादें...”
“एक ही घर की यादें...”
“एक ही नाम...”
“ताकि हम जान सकें...”
“...अगर यादें इंसान बनाती हैं...”
“...या आत्मा।”
मीरा चीख उठी—
“बस!”
“आपने इंसानों पर प्रयोग किया था!”
विराज की आँखें भर आईं।
“हाँ...”
“और वही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।”
तभी...
वीडियो अचानक रुक गई।
स्क्रीन पर सिर्फ़ एक फ़्रेम बचा।
उसमें...
दोनों बच्चों के पीछे...
एक और परछाईं खड़ी थी।
एक आदमी...
जिसका चेहरा धुँधला था।
लेकिन...
उसके हाथ में एक माचिस थी।
आरव धीरे-धीरे स्क्रीन के पास गया।
उसने उस धुँधले चेहरे को गौर से देखा।
अचानक...
उसके सिर में तेज़ दर्द उठा।
एक आवाज़ उसके भीतर गूँजी—
“आग लगा दो...”
“कोई ज़िंदा नहीं बचना चाहिए...”
आरव दोनों घुटनों पर गिर पड़ा।
उसकी साँसें टूटने लगीं।
उसी क्षण...
दूसरा आरव उसके पास आया।
उसने झुककर फुसफुसाया—
“अब याद आया?”
“उस रात...”
“आग किसने लगाई थी?”
आरव की आँखों से आँसू बह निकले।
उसके होंठ काँपे।
“न... नहीं...”
“मुझे...”
“...याद नहीं...”
दूसरे आरव ने उसकी जेब में कुछ रख दिया।
एक छोटी-सी...
जली हुई माचिस की डिब्बी।
उस पर काले अक्षरों में लिखा था—
“होटल सूर्य – 17 अगस्त 2006”
आरव ने जैसे ही उसे खोला...
उसमें एक आधी जली हुई तीली रखी थी।
उसे देखते ही...
उसकी आँखों के सामने एक दृश्य चमका—
एक छोटा हाथ...
काँपती उँगलियाँ...
माचिस जलती है...
परदे में आग लगती है...
और कोई ज़ोर से चिल्लाता है—
“आरव... भागो!”
दृश्य तुरंत टूट गया।
आरव हाँफने लगा।
“यह...”
“यह मेरा हाथ था...”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
दूसरा आरव उसकी आँखों में देखता रहा।
फिर उसने बहुत धीरे से कहा—
“नहीं...”
“वह तुम्हारा हाथ नहीं था...”
“...वह मेरा था।”
इतना कहकर उसने अपनी दाईं हथेली आगे बढ़ाई।
उसकी हथेली पर बचपन का गहरा जला हुआ निशान था।
ठीक वैसा ही निशान...
जो अभी-अभी आरव ने अपनी याद में देखा था।
मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।
वह काँपती आवाज़ में बोली—
“अगर आग तुमने लगाई थी...”
“...तो असली हत्यारा कौन था?”
दूसरे आरव की मुस्कान गायब हो गई।
उसने पहली बार डरकर कमरे के अँधेरे कोने की ओर देखा।
और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“जिसका नाम हमने कभी लिया ही नहीं...”
उसी पल...
पूरी प्रयोगशाला की बिजली चली गई।
अँधेरे में...
एक चौथी आवाज़ गूँजी।
न वह डॉ. विराज की थी...
न मीरा की...
न दोनों आरव में से किसी की।
वह आवाज़ बहुत शांत थी।
लेकिन उसमें ऐसा अधिकार था...
कि चारों लोग एक साथ उसी दिशा में देखने लगे।
“आख़िरकार...”
“...तुम लोग मेरे बारे में बात करने लगे।”
अँधेरे में...
किसी ने धीरे-धीरे ताली बजाई।
ठाक...
ठाक...
ठाक...
और उसी के साथ...
कमरा नंबर 13 का दरवाज़ा...
जो अब तक बंद था...
धीरे-धीरे...
अपने आप खुल गया।
अंदर...
इस बार कोई कमरा नहीं था।
सिर्फ़...
अनंत अँधेरा।
भाग 12 — “जिसका नाम लेने की मनाही थी...”
“हर कहानी में एक खलनायक होता है... लेकिन कुछ कहानियों में खलनायक इंसान नहीं, एक नाम होता है।”
कमरा नंबर 13 का दरवाज़ा पूरी तरह खुल चुका था।
लेकिन...
उसके भीतर कोई कमरा नहीं था।
न दीवारें...
न छत...
न ज़मीन...
सिर्फ़ एक अंतहीन अँधेरा...
जो जैसे सबको अपने भीतर निगल लेना चाहता था।
डॉ. विराज का चेहरा पहली बार भय से भर गया।
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—
“नहीं...”
“यह दरवाज़ा नहीं खुलना चाहिए था...”
दूसरे आरव ने उनकी ओर देखा।
“डर रहे हैं, डॉक्टर?”
“बीस साल पहले भी तो आपने यही गलती की थी।”
विराज ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया।
उनकी नज़रें सिर्फ़ उस अँधेरे पर टिकी थीं।
अचानक...
उस अँधेरे से कदमों की आवाज़ आने लगी।
ठक...
ठक...
ठक...
लेकिन...
अजीब बात यह थी कि हर कदम की आवाज़ अलग-अलग दिशा से आ रही थी।
जैसे...
एक नहीं...
दर्जनों लोग चल रहे हों।
मीरा का हाथ काँपने लगा।
उसने धीरे से आरव का हाथ पकड़ लिया।
“अगर वह बाहर आ गया...”
“...तो इस बार कोई नहीं बचेगा।”
आरव ने पहली बार दृढ़ स्वर में पूछा—
“आख़िर वह है कौन?”
मीरा की आँखें भर आईं।
उसने बहुत मुश्किल से एक शब्द कहा—
“निरंजन...”
जैसे ही यह नाम उसके होंठों से निकला...
पूरी प्रयोगशाला काँप उठी।
दीवारों पर लगी सारी स्क्रीन अपने-आप जल गईं।
हर स्क्रीन पर सिर्फ़ एक ही शब्द चमक रहा था—
ACCESS DENIED
फिर...
सभी स्क्रीन एक साथ बदल गईं।
एक पुराना वीडियो चलने लगा।
वीडियो में...
डॉ. विराज बहुत युवा दिखाई दे रहे थे।
उनके साथ कई वैज्ञानिक खड़े थे।
उनमें से एक आदमी...
सबसे पीछे...
मुस्कुरा रहा था।
उसकी आँखें असामान्य रूप से शांत थीं।
वीडियो में विराज बोले—
“रिकॉर्डिंग नंबर 1.”
“आज से ‘प्रोजेक्ट 213’ शुरू हो रहा है।”
“मुख्य शोधकर्ता...”
उन्होंने पीछे खड़े आदमी की ओर देखा।
“डॉ. निरंजन अवस्थी।”
आरव का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
वीडियो आगे बढ़ा।
डॉ. निरंजन कैमरे के सामने आए।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“यादें मिटाना विज्ञान नहीं...”
“...नियंत्रण है।”
“जिस दिन हम इंसान की यादों को नियंत्रित कर लेंगे...”
“उस दिन हम इंसान को नियंत्रित कर लेंगे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
विराज ने धीरे से आँखें बंद कर लीं।
“मुझे उसी दिन समझ जाना चाहिए था...”
“...कि वह इंसानों को बचाना नहीं चाहता था।”
“...वह उन्हें अपना बनाना चाहता था।”
वीडियो अचानक रुक गया।
अँधेरे में वही शांत आवाज़ फिर गूँजी—
“विराज...”
“तुम आज भी भावुक हो।”
अँधेरे से एक आदमी बाहर आया।
सफेद बाल...
सादा काला कोट...
चेहरे पर हल्की मुस्कान...
और आँखें...
जिनमें न गुस्सा था...
न दया...
बस एक अजीब-सी ख़ामोशी।
वह डॉ. निरंजन था।
उसने आरव को ध्यान से देखा।
फिर मुस्कुराकर बोला—
“बीस साल...”
“और आखिरकार...”
“तुम्हें सब वापस यहीं आना था।”
आरव ने गुस्से से कहा—
“तुमने हमारी ज़िंदगी बर्बाद कर दी!”
निरंजन हँस पड़ा।
“नहीं, आरव...”
“मैंने तुम्हारी ज़िंदगी बनाई।”
“तुम्हें लगता है तुम्हारा बचपन सच था?”
“तुम्हें लगता है मीरा से तुम्हारी पहली मुलाक़ात वही थी जो तुम्हें याद है?”
“तुम्हें लगता है तुम्हारी माँ...”
वह रुक गया।
“...वह सचमुच तुम्हारी माँ थीं?”
आरव की साँस जैसे रुक गई।
“चुप रहो!”
निरंजन उसकी ओर बढ़ा।
“नहीं...”
“अब समय आ गया है कि तुम अपना पहला सच जानो।”
उसने अपनी जेब से एक पुरानी फ़ोटो निकाली।
तस्वीर में...
दो छोटे बच्चे थे।
एक लड़का...
एक लड़की...
दोनों लगभग पाँच साल के।
उनके पीछे खड़ी एक महिला उन्हें गले लगाए मुस्कुरा रही थी।
लेकिन...
वह महिला...
आरव की माँ नहीं थी।
और...
वह लड़की...
मीरा थी।
फ़ोटो के पीछे सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—
“अनाथालय – सूर्य आश्रम”
“बच्चे संख्या 27 और 28.”
मीरा के हाथ से फ़ोटो गिर गई।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“नहीं...”
“यह झूठ है...”
निरंजन ने धीरे से कहा—
“यादें बदली जा सकती हैं...”
“लेकिन तस्वीरें नहीं।”
आरव ने काँपते हाथों से फ़ोटो उठाई।
उसने पहली बार महसूस किया...
कि शायद...
उसकी पूरी ज़िंदगी...
किसी और की लिखी हुई कहानी थी।
उसी क्षण...
पीछे रखी दीवार-घड़ी...
जो अब तक उल्टी चल रही थी...
अचानक रुक गई।
2 बजकर 13 मिनट।
और पहली बार...
घड़ी की सुइयाँ...
सीधी दिशा में चलने लगीं।
टिक...
टिक...
टिक...
डॉ. विराज का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने फुसफुसाकर कहा—
“बहुत देर हो गई...”
“उसे सब याद आने लगा है...”
अचानक...
आरव की आँखों के सामने एक ही दृश्य बार-बार चमकने लगा—
एक अनाथालय...
बरसात की रात...
मीरा उसका हाथ पकड़े भाग रही है...
और पीछे से कोई चिल्ला रहा है—
“उन्हें पकड़ो!”
आरव ने सिर पकड़ लिया।
उसके होंठ काँपे।
और उसके मुँह से अनायास निकला—
“...मुझे याद आने लगा है...”
दूर खड़ा डॉ. निरंजन...
धीरे-धीरे मुस्कुराया।
उसने बहुत शांत स्वर में कहा—
“नहीं, आरव...”
“अभी तो तुम्हें वही याद आ रहा है... जो मैं चाहता हूँ।”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
और उसी सन्नाटे में...
मीरा ने पहली बार डरकर आरव की ओर देखा।
क्योंकि...
उसे लगा...
आरव की आँखों का रंग...
धीरे-धीरे बदलने लगा था।
भाग 13 — “आख़िरी स्मृति”
“सच कभी एक साथ याद नहीं आता... वह टूटे हुए शीशे की तरह लौटता है। हर टुकड़ा तुम्हें थोड़ा और घायल करता है।”
टिक...
टिक...
टिक...
घड़ी अब पहली बार सीधी दिशा में चल रही थी।
पूरी प्रयोगशाला में एक अजीब-सी कंपन फैल गई।
दीवारों पर लगी स्क्रीन अपने-आप बंद होने लगीं।
एक-एक करके...
जैसे किसी ने बीस साल पुरानी कहानी का आख़िरी अध्याय खोल दिया हो।
आरव वहीं खड़ा था।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
उसकी आँखों का रंग बदलने लगा था।
मीरा डर गई।
वह उसके पास आई और काँपती आवाज़ में बोली—
“आरव...”
“मेरी तरफ़ देखो...”
“तुम मुझे पहचानते हो... न?”
आरव ने उसकी ओर देखा।
लेकिन...
उसकी आँखों में पहचान नहीं थी।
सिर्फ़ एक अजीब-सी ख़ामोशी।
डॉ. निरंजन मुस्कुराए।
“देखा, मीरा?”
“यादें लौटने से पहले इंसान अपना वर्तमान खो देता है।”
मीरा ने गुस्से से उनकी ओर देखा।
“आपने उससे सब कुछ छीन लिया!”
निरंजन शांत स्वर में बोले—
“नहीं...”
“मैं सिर्फ़ वही वापस ले रहा हूँ... जो कभी उसका था ही नहीं।”
अचानक...
पूरी प्रयोगशाला की लाइटें बुझ गईं।
कमरे के बीचों-बीच एक गोलाकार मशीन जल उठी।
उस पर लिखा था—
MEMORY CORE – 13
डॉ. विराज का चेहरा पीला पड़ गया।
“नहीं...”
“यह मशीन अभी भी चालू है?”
निरंजन ने मुस्कुराकर कहा—
“तुम्हें लगा था मैंने इसे नष्ट कर दिया?”
“यही तो मेरी सबसे बड़ी रचना है।”
उन्होंने मशीन पर हाथ रखा।
मशीन से नीली रोशनी निकली।
और अगले ही पल...
आरव के सामने हवा में दर्जनों दृश्य तैरने लगे।
एक अनाथालय...
बरसात की रात...
एक पाँच साल का लड़का...
एक पाँच साल की लड़की...
दोनों एक ही कंबल में बैठे काँप रहे थे।
लड़की ने अपनी आधी रोटी लड़के को दे दी।
“लो...”
“तुम खा लो।”
लड़के ने मुस्कुराकर पूछा—
“और तुम?”
“मुझे भूख नहीं है।”
लेकिन...
वह झूठ बोल रही थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
आरव की आँखें भर आईं।
“मीरा...”
उसने धीरे से फुसफुसाया।
दृश्य बदल गया।
एक दिन...
एक काली कार अनाथालय के बाहर आकर रुकी।
डॉ. विराज उतरे।
उनके साथ...
डॉ. निरंजन।
अनाथालय की संचालिका ने दोनों बच्चों की ओर इशारा किया।
“यही हैं...”
“बच्चे नंबर 27 और 28।”
निरंजन ने झुककर दोनों बच्चों को देखा।
उनकी नज़र आरव पर टिक गई।
उन्होंने धीमे से कहा—
“यही होगा...”
“रोगी संख्या 213।”
डॉ. विराज चौंक गए।
“नहीं...”
“ये बच्चे हैं।”
निरंजन की मुस्कान गहरी हो गई।
“इसीलिए तो...”
“बच्चों की यादें सबसे आसानी से बदली जा सकती हैं।”
दृश्य फिर बदल गया।
कमरा नंबर 13।
मशीनें।
तार।
रोशनी।
डर।
मीरा बाहर बंद दरवाज़े को पीट रही थी।
“उसे छोड़ दो!”
“कृपया...”
“उसे दर्द हो रहा है!”
अंदर...
छोटा-सा आरव बेहोश पड़ा था।
उसके सिर पर मशीन लगी थी।
स्क्रीन पर शब्द चमक रहे थे—
MEMORY TRANSFER — 87%
डॉ. विराज घबरा गए।
“बस करो!”
“उसका मस्तिष्क यह सह नहीं पाएगा!”
लेकिन...
डॉ. निरंजन मशीन बंद नहीं कर रहे थे।
उनकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी।
अचानक...
एक ज़ोरदार धमाका हुआ।
बिजली चली गई।
पूरी मशीन चिंगारियाँ छोड़ने लगी।
मीरा ने दरवाज़ा तोड़ दिया।
वह दौड़कर आरव तक पहुँची।
उसने उसका हाथ पकड़ लिया।
उसी क्षण...
मशीन से निकली नीली रोशनी...
दोनों बच्चों को एक साथ घेरने लगी।
मीरा चीखी।
आरव बेहोश था।
और फिर...
सब कुछ सफ़ेद हो गया।
दृश्य समाप्त।
पूरी प्रयोगशाला फिर सामान्य हो गई।
आरव ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
अब...
उसे सब याद आने लगा था।
अनाथालय...
मीरा...
कमरा नंबर 13...
मशीन...
चीखें...
सब कुछ।
वह काँपती आवाज़ में बोला—
“तुमने...”
“हमारे साथ यह सब क्यों किया?”
डॉ. निरंजन पहली बार बिल्कुल गंभीर हो गए।
उन्होंने बहुत धीरे से कहा—
“क्योंकि मैं यह साबित करना चाहता था...”
“...कि इंसान का दिल नहीं...”
“...उसकी यादें उससे प्रेम करना सिखाती हैं।”
मीरा ने दृढ़ स्वर में कहा—
“तो फिर आप हार गए।”
निरंजन मुस्कुराए।
“अभी नहीं।”
“अगर मेरी बात ग़लत होती...”
“...तो यादें मिटने के बाद तुम दोनों एक-दूसरे को कभी पहचान नहीं पाते।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
यह पहली बार था...
जब निरंजन के चेहरे पर भी असमंजस दिखाई दिया।
शायद...
उनका प्रयोग सचमुच असफल हुआ था।
या...
शायद...
प्रेम सचमुच यादों से बड़ा था।
उसी क्षण...
मशीन ने तेज़ आवाज़ निकाली।
WARNING
MEMORY CORE OVERLOAD
डॉ. विराज का चेहरा डर से भर गया।
उन्होंने चीखकर कहा—
“आरव! मीरा! यहाँ से भागो!”
“अगर यह मशीन फट गई...”
“...तो तुम दोनों की बची हुई यादें भी हमेशा के लिए मिट जाएँगी!”
पूरी प्रयोगशाला ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगी।
छत से पत्थर गिरने लगे।
लाल सायरन बज उठा।
और उसी अफरा-तफरी में..
नीली रोशनी कमरें में छानें लगी।
भाग 14 — “यादों का अंतिम दरवाज़ा”
“कुछ लड़ाइयाँ हथियारों से नहीं जीती जातीं... कुछ लड़ाइयाँ सिर्फ़ एक याद जीत लेती है।”
पूरी प्रयोगशाला लाल चेतावनी वाली रोशनी में डूब चुकी थी।
सायरन...
लगातार गूँज रहा था।
WARNING… MEMORY CORE UNSTABLE…
मशीन के भीतर नीली ऊर्जा तेज़ी से घूमने लगी।
डॉ. विराज की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी—
“आरव... अगर मेमोरी कोर नष्ट हो गया तो सिर्फ़ यह इमारत नहीं...”
“...तुम्हारी सारी यादें भी हमेशा के लिए बिखर जाएँगी।”
आरव ने पहली बार अपने भीतर अजीब-सी शांति महसूस की।
उसने मीरा की ओर देखा।
उसकी आँखों में डर था...
लेकिन उस डर से कहीं ज़्यादा भरोसा।
मीरा मुस्कुराई।
वही मुस्कान...
जो उसने अनाथालय में पहली बार देखी थी।
“तुम्हें याद है...”
“तुमने कहा था...”
“अगर पूरी दुनिया बदल जाए...
...तो भी मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूँगा।”
आरव की आँखें भर आईं।
उसे पहली बार सब कुछ साफ़ दिखाई देने लगा।
अनाथालय...
बरसाती रात...
आधी रोटी...
चमेली का फूल...
और...
मीरा।
अचानक...
मेमोरी कोर के बीचों-बीच एक तेज़ प्रकाश फैल गया।
उस रोशनी में...
सैकड़ों तस्वीरें हवा में तैरने लगीं।
हर तस्वीर...
आरव की ज़िंदगी का एक टुकड़ा थी।
एक तस्वीर में...
वह पहली बार साइकिल चला रहा था।
दूसरी में...
स्कूल का पहला दिन।
तीसरी में...
माँ की गोद।
लेकिन...
कुछ तस्वीरें धीरे-धीरे राख बनकर बिखरने लगीं।
आरव घबरा गया।
“ये...”
“ये यादें मिट रही हैं!”
डॉ. विराज ने काँपते हुए कहा—
“मेमोरी कोर अपने अंदर बंद हर झूठी याद को मिटा रहा है...”
“...और असली यादों को बचाने की कोशिश कर रहा है।”
तभी...
डॉ. निरंजन की शांत आवाज़ गूँजी—
“यादें...”
“यही इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी हैं।”
उन्होंने मशीन की ओर देखा।
“अगर ये बच गईं...”
“...तो मेरा बीस साल का शोध समाप्त हो जाएगा।”
मीरा ने पहली बार दृढ़ स्वर में कहा—
“शोध नहीं...”
“अपराध।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
निरंजन कुछ पल तक उसे देखते रहे।
फिर बहुत धीमे से बोले—
“तुम जानती हो, मीरा...”
“मैं हार कब गया था?”
मीरा ने कोई उत्तर नहीं दिया।
निरंजन की आँखें पहली बार नम हो गईं।
“जिस दिन तुमने अपनी सारी यादें खोने के बाद भी...”
“...आरव का नाम लिया था।”
आरव ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
निरंजन आगे बोले—
“उस दिन मुझे समझ आ गया था...”
“कि प्रेम...”
“...स्मृति से बड़ा है।”
डॉ. विराज ने धीरे से आँखें बंद कर लीं।
“तो फिर...”
“यह सब यहीं समाप्त कर दीजिए।”
निरंजन ने मेमोरी कोर की ओर देखा।
नीली रोशनी अब पूरे कमरे में फैल चुकी थी।
उन्होंने अपनी जेब से एक छोटा-सा धातु का कार्ड निकाला।
उस पर लिखा था—
MASTER ACCESS
उन्होंने कार्ड मशीन के सामने रखा।
मशीन ने एक गंभीर ध्वनि निकाली।
फिर...
हवा में एक संदेश उभरा—
“FINAL MEMORY RESTORATION”
“केवल एक व्यक्ति की स्मृतियाँ पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी।”
“दूसरे की सभी स्मृतियाँ मिट जाएँगी।”
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया...
मानो समय भी रुक गया हो।
आरव ने स्क्रीन पढ़ी...
फिर मीरा की ओर देखा।
मीरा भी वही पढ़ रही थी।
दोनों की आँखें मिलीं।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन...
दोनों समझ चुके थे।
इस कहानी का सबसे कठिन निर्णय...
अभी बाकी था।
उसी क्षण...
मेमोरी कोर की स्क्रीन पर एक अंतिम पंक्ति उभरी—
“निर्णय के लिए समय शेष — 60 सेकंड.”
नीली रोशनी धीरे-धीरे पूरे कमरे को अपने भीतर समेटने लगी।
आरव ने मीरा का हाथ थाम लिया।
उसकी आवाज़ काँप रही थी—
“अगर हम दोनों साथ नहीं बच सकते...”
“...तो क्या प्रेम सिर्फ़ एक याद बनकर रह जाएगा?”
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने बहुत धीमे से कहा—
“नहीं, आरव...”
“सच्चा प्रेम याद नहीं बनता...”
“...वह किसी की रूह में घर बना लेता है।”
और तभी...
स्क्रीन पर समय बदल गया—
00:59
00:58
00:57…
भाग 15 — “तेरहवाँ दरवाज़ा कभी बंद नहीं हुआ...”
“कुछ कहानियाँ समाप्त नहीं होतीं... वे सिर्फ़ किसी और की ज़िंदगी में प्रवेश कर जाती हैं।”
00:10…
00:09…
मेमोरी कोर की उलटी गिनती अब अपने अंतिम क्षणों में थी।
पूरी प्रयोगशाला नीली रोशनी से भर चुकी थी।
दीवारें टूट रही थीं।
मशीनों से चिंगारियाँ निकल रही थीं।
डॉ. विराज ने काँपती आवाज़ में कहा—
“आरव... फैसला करो!”
“समय नहीं है!”
आरव ने मीरा की ओर देखा।
दोनों की आँखों में आँसू थे।
लेकिन इस बार...
उनमें डर नहीं था।
सिर्फ़ एक अटूट विश्वास।
मीरा मुस्कुराई।
“तुम हमेशा कहते थे...”
“घर वह नहीं होता जहाँ हम रहते हैं...”
“घर वह होता है... जहाँ कोई हमारा इंतज़ार करता है।”
आरव की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
“इस बार...”
“मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
दोनों साथ-साथ मेमोरी कोर की ओर बढ़े।
डॉ. निरंजन उन्हें चुपचाप देख रहे थे।
उनकी आँखों में पहली बार हार दिखाई दे रही थी।
उन्होंने धीमे से कहा—
“तो...”
“तुमने विज्ञान पर प्रेम को चुन लिया।”
आरव ने उनकी ओर देखा।
“नहीं...”
“मैंने इंसानियत को चुना है।”
मेमोरी कोर के सामने पहुँचकर आरव ने स्क्रीन को छुआ।
स्क्रीन पर दो विकल्प उभरे—
RESTORE ONE MEMORY
और उसके नीचे...
DESTROY MEMORY CORE
कुछ क्षणों तक पूरा कमरा शांत रहा।
फिर...
आरव ने बिना झिझक...
दूसरा विकल्प चुन लिया।
DESTROY MEMORY CORE
डॉ. विराज की आँखें फैल गईं।
“नहीं...!”
“अगर मेमोरी कोर नष्ट हो गया...”
“...तो सारी झूठी यादें भी चली जाएँगी...”
“...और असली यादें भी हमेशा के लिए बिखर सकती हैं!”
आरव मुस्कुराया।
“यादें...”
“अगर सच में हमारी हैं...”
“...तो उन्हें किसी मशीन की ज़रूरत नहीं होगी।”
मीरा ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“मैंने कहा था न...”
“रूहें यादों से ज़्यादा मज़बूत होती हैं।”
अचानक...
पूरी प्रयोगशाला तेज़ प्रकाश से भर गई।
एक ऐसी रोशनी...
जिसने हर चीज़ को अपने भीतर समेट लिया।
डॉ. विराज ने आख़िरी बार दोनों की ओर देखा।
उनके चेहरे पर पछतावा था...
लेकिन एक सुकून भी।
उन्होंने धीरे से आँखें बंद कर लीं।
और मुस्कुराए।
फिर...
सब कुछ शांत हो गया।
तीन महीने बाद...
पहाड़ों के बीच एक छोटा-सा कस्बा।
सुबह की हल्की धूप।
एक छोटी-सी पुस्तकालय।
दरवाज़े पर लिखा था—
“चमेली पुस्तकालय”
अंदर...
आरव किताबों को अलमारी में सजा रहा था।
मीरा खिड़की के पास बैठी बच्चों को कहानी सुना रही थी।
दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते।
उन्हें बहुत-सी बातें याद नहीं थीं।
लेकिन...
एक अजीब-सी अपनापन अब भी था।
जैसे...
दिल ने वह सब याद रखा हो...
जो दिमाग़ भूल चुका था।
काउंटर पर...
एक सूखा हुआ चमेली का फूल रखा था।
और उसके पास...
एक पुरानी पीतल की चाबी।
जिस पर खुदा था—
13
मीरा ने चाबी उठाई।
“अजीब है...”
“पता नहीं क्यों...”
“इसे देखकर ऐसा लगता है...”
“...जैसे यह हमारी है।”
आरव मुस्कुराया।
“शायद...”
“कुछ चीज़ें वजह नहीं बतातीं...”
“...बस साथ चलती हैं।”
दोनों खिड़की से बाहर देखने लगे।
बारिश शुरू हो चुकी थी।
उसी समय...
सैकड़ों किलोमीटर दूर...
एक पुरानी, बंद पड़ी सरकारी इमारत के तहख़ाने में...
धूल से ढका एक कंप्यूटर...
अपने-आप चालू हो गया।
काली स्क्रीन पर सफ़ेद अक्षर उभरे—
PROJECT 213 — ARCHIVE RECOVERED
कुछ सेकंड बाद...
एक नई फ़ाइल दिखाई दी—
PROJECT 314
नीचे लिखा था—
STATUS: ACTIVE
फिर...
स्क्रीन पर किसी अनजान व्यक्ति का चेहरा उभरा।
चेहरा पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहा था।
उसने कैमरे की ओर देखकर धीमे से कहा—
“डॉ. निरंजन असफल नहीं हुए...”
“...उन्होंने सिर्फ़ पहला चरण पूरा किया था।”
उसने मेज़ पर रखी एक पुरानी फ़ाइल खोली।
फ़ाइल के पहले पन्ने पर एक तस्वीर थी।
उसमें...
आरव और मीरा नहीं थे।
बल्कि...
पाँच छोटे बच्चे थे।
हर बच्चे के गले में एक धातु का टैग लटका था।
311
312
313
314
315
उस व्यक्ति ने मुस्कुराकर कहा—
“यादों का खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ...”
“...अब असली कहानी शुरू होगी।”
स्क्रीन अचानक बंद हो गई।
लेकिन...
बंद होने से ठीक पहले...
एक नाम चमका—
“फ़ाइल: VRINDA”
उपसंहार
उस रात...
आरव को फिर वही सपना आया।
एक लंबा गलियारा...
अंत में...
कमरा नंबर 13।
इस बार...
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
अंदर कोई अँधेरा नहीं था।
सिर्फ़ एक छोटी-सी बच्ची खड़ी थी।
उसने मुस्कुराकर पूछा—
“आप बहुत देर से आए...”
“क्या अब आप मुझे भी भूल जाएँगे?”
आरव कुछ कह पाता...
उससे पहले उसकी आँख खुल गई।
सुबह हो चुकी थी।
उसने खिड़की खोली।
बाहर चमेली के फूलों की महक थी।
लेकिन...
दरवाज़े के बाहर...
एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा रखा था।
उस पर सिर्फ़ इतना लिखा था—
“आरव, अगर तुम्हें यह पत्र मिला है...
...तो इसका मतलब है कि ‘प्रोजेक्ट 314’ शुरू हो चुका है।
इस बार... किसी पर भरोसा मत करना।”
— एक पुराना दोस्त
समाप्त... या शायद नहीं।
“प्रोजेक्ट 314: वृंदा…”

Join the Discussion