बस एक फ़ोन की दूरी

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Aug 08, 2026
Listen to storyNarrated by VITI
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Hindi

हाल ही में, जब मैं अपने निवास-स्थान से ट्रेन से वापस लौट रही थी, तब एक छोटा-सा दृश्य मुझे अनायास ही अपने बचपन में ले गया।

मेरे सामने वाली सीट पर बैठे दो छोटे बच्चे चिप्स के एक पैकेट को लेकर झगड़ रहे थे। उनमें से एक गुस्से में बोला,

"मैं तुमसे अब कभी बात नहीं करूँगा!"

मैं खिड़की के पास बैठी लैपटॉप पर अपना काम कर रही थी, लेकिन उनकी नोकझोंक ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया। थोड़ी देर बाद समझ आया कि वे दोनों भाई-बहन थे।

मुस्कुराते हुए मैंने उनसे कहा,

"जितना लड़ना है, अभी लड़ लो... जितनी बातें करनी हैं, अभी कर लो। बड़े होने के बाद इतना समय नहीं मिलेगा। फिर एक-दूसरे से बात करने के लिए फ़ोन करना पड़ेगा... और ज़िंदगी इतनी व्यस्त हो जाएगी कि वह फ़ोन भी करना मुश्किल लगने लगेगा।"

उनकी माँ मुस्कुराईं और बच्चों से बोलीं,

"दीदी की बात सुनो... बिल्कुल सही कह रही हैं।"

दोनों बच्चों ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उनकी लड़ाई में दखल देकर बहुत बड़ी गलती कर दी हो। उनकी नाराज़गी देखकर मेरे चेहरे पर फिर से मुस्कान आ गई।

लेकिन अगले ही पल...

मैं चुप हो गई।

क्योंकि यही तो कभी मेरे और मेरे भाई के बीच भी हुआ करता था।

हम भी छोटी-छोटी, बिल्कुल बेवजह की बातों पर लड़ पड़ते थे। आज सोचती हूँ तो याद भी नहीं कि उन झगड़ों की वजह क्या होती थी।

मैंने धीरे से अपना लैपटॉप बंद किया, फ़ोन एक तरफ़ रख दिया और खिड़की से बाहर देखने लगी।

न जाने कब मेरी आँखें नम हो गईं।

बचपन की यादें एक-एक करके सामने आने लगीं और मैं उन दिनों की तुलना आज की ज़िंदगी से करने लगी।

आज मेरे भाई और मेरी बातें बहुत कम होती हैं। हम दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी, काम और ज़िम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो चुके हैं कि कभी-कभी महीनों निकल जाते हैं बिना बात किए।

ज़्यादातर फ़ोन मैं ही करती हूँ।

लेकिन इस दूरी और ख़ामोशी के बावजूद...

मुझे आज भी सब कुछ याद है।

जब मेरा जन्म हुआ था, तब मेरा भाई मुझे लेकर बहुत ज़्यादा सजग रहता था। वह मुझे प्यार से "बाबू" कहकर बुलाता था। उसे बिल्कुल पसंद नहीं था कि कोई और मुझे गोद में ले।

जब भी मैं रोती, वह तुरंत मम्मी के पास भागकर कहता,

"मम्मी, बाबू रो रही है... उसे गोद में ले लो।"

आज सोचती हूँ तो एक छोटे-से बच्चे का अपनी नवजात बहन के लिए इतना प्यार देखकर दिल अपने आप मुस्कुरा उठता है।

फिर हम दोनों स्कूल जाने लगे।

और धीरे-धीरे हमारी पहचान पूरे घर में ऐसे भाई-बहन की बन गई जो हर समय लड़ते रहते थे।

मैं उसे मारकर भाग जाती, और वह मेरे बाल पकड़कर अपना बदला ले लेता।

आज सुनने में यह सब अजीब लगता है...

लेकिन वही तो हमारे प्यार जताने का तरीका था।

हर सुबह मैं समय पर तैयार हो जाती थी।

लेकिन मेरे भाई में रोज़ देर करने की एक अनोखी कला थी।

मम्मी पूरे घर में उसके पीछे-पीछे घूमती रहतीं—कभी नाश्ता खिलातीं, कभी किताबें ढूँढ़तीं, कभी जूते के फीते बाँधतीं...

और इतना सब होने के बाद भी साहब को देर होना ही होता था।

स्कूल से लौटते समय मैं हमेशा उसके स्कूल बैग की पट्टी पकड़कर उसके पीछे-पीछे चलती थी।

वह बार-बार कहता,

"छोड़ ना..."

लेकिन मैं कहाँ मानने वाली थी।

एक घटना आज भी याद करके हँसी आ जाती है।

तब मैं पहली कक्षा में पढ़ती थी।

हर दिन की तरह उस दिन भी मैं छुट्टी के बाद उसके क्लासरूम के बाहर उसका इंतज़ार कर रही थी।

लेकिन उस दिन मेरे प्यारे भाई साहब पूरी तरह भूल गए कि उनकी एक छोटी बहन भी है।

वह अकेले ही स्कूल से घर पहुँच गए।

पूरे रास्ते उन्हें एक बार भी एहसास नहीं हुआ कि आज कोई उनके बैग की पट्टी पकड़कर पीछे नहीं चल रहा है।

घर पहुँचते ही मम्मी ने पूछा,

"अरे... बाबू कहाँ है?"

तभी उनके होश उड़ गए।

उन्हें याद आया कि वह मुझे स्कूल में ही छोड़ आए हैं।

सौभाग्य से, स्कूल की एक अध्यापिका ने मुझे अकेला खड़ा देखा और सुरक्षित घर छोड़ गईं।

उधर, मेरे भाई का घर पहुँचते ही मम्मी ने जिस तरह से स्वागत किया... वह उन्हें आज तक याद होगा।

उस समय मैं उनसे बहुत नाराज़ थी।

लेकिन आज...

वही घटना मेरी सबसे प्यारी यादों में से एक है।

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।

हमने स्कूल की पढ़ाई पूरी की और फिर कॉलेज के लिए मुझे दूसरे शहर जाना पड़ा।

उस दिन तक मुझे हमेशा यही लगता था कि मेरा भाई मुझे बहुत परेशान करने वाली बहन समझता है।

लेकिन घर से दूर जाने के बाद पहली बार मैंने उसका एक अलग रूप देखा।

उसे मेरी कमी महसूस होती थी।

और मुझे भी उसकी।

तब जाकर समझ आया कि उसने कभी मुझसे नफ़रत नहीं की।

वह भी शायद उन लाखों भारतीय भाइयों जैसा ही था...

जो अपनी भावनाओं को शब्दों में कहना नहीं जानते, लेकिन अपने प्यार को हमेशा दिल में सँजोए रखते हैं।

फिर समय और आगे बढ़ता गया... और हम दोनों भी बड़े हो गए।

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Author Niman
5 days ago

thanks appilog team for publishing this story 🫶

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Appilog Digital Publication
5 days ago

@Author Niman it’s a pleasure