माई वाले

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Aug 20, 2026
Listen to storyNarrated by VITI
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कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में बहुत थोड़े समय के लिए आते हैं, लेकिन उनकी छोटी-सी मौजूदगी भी बचपन की ऐसी याद बन जाती है, जिसे हम बड़े होने के बाद भी भूल नहीं पाते। मेरे बचपन की ऐसी ही एक याद हैं—माई वाले।

आज अचानक मुझे उनकी याद आ गई। पता नहीं कहाँ होंगे वो, कैसे होंगे। काफ़ी दिन हो गए उन्हें देखे हुए। अब तो उन्होंने गाँव में आना ही बंद कर दिया है। मैया कहती हैं, शायद कहीं और रहने लगे हैं।

जब मैं छोटी हुआ करती थी, तब वो गाँव में आया करते थे। उस वक़्त मेरी उम्र कोई चार-पाँच साल रही होगी। शायद 2007 या 2008 की बात है। वो चूरन बेचा करते थे और साथ में बच्चों को पसंद आने वाली बहुत-सी चीज़ें भी लाया करते थे। लेकिन मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थे गुलाब के लच्छे—सफ़ेद, रेशम जैसे मुलायम और मुँह में रखते ही घुल जाने वाले। कुछ लोग उन्हें बूढ़ी के बाल भी कहते थे।

हालाँकि चूरन भी मुझे ख़ूब पसंद था। वो मीठा चूरन, जो जीभ को लाल कर देता था, और वो काला-खट्टा चूरन, जिसे खाते ही लगता था जैसे जीभ जल गई हो। फिर भी हम सब उसे बड़े शौक़ से खाते थे।

उन दिनों इन छोटी-छोटी ख़ुशियों के लिए पैसे ज़रूरी नहीं हुआ करते थे। तब तो बस थोड़े से सिर के बाल, जो चोटी करते समय झड़ जाते हैं, या घर में इकट्ठा किया हुआ मुट्ठी भर कबाड़ भी काफ़ी था। तब इन्हीं के बदले में मिल जाता था ढेर सारा चूरन और गुलाब के लच्छे।

उन दिनों शायद हमें चीज़ों की क़ीमत नहीं, उनसे मिलने वाली ख़ुशी की क़ीमत पता थी।

उन्हें देखते ही मैंने अपनी मैया को पुकारना शुरू कर दिया था—“माई... माई... माई...”

उस वक़्त मैं अपनी मैया को माई ही कहा करती थी। मेरी आवाज़ सुनकर वो तुरंत बाहर आईं और मुझे गुलाब के लच्छे दिला दिए।

अगली बार जब माई वाले आए, तब भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ। मैंने उन्हें देखते ही मैया को पुकारा और उन्होंने मुझे गुलाब के लच्छे दिला दिए।

शायद उसी दिन से माई वाले ने मुझे “माई” कहना शुरू कर दिया था। उन्होंने मेरा नाम ही माई रख दिया और मैं भी उन्हें “माई वाले” कहने लगी।

फिर तो यह नाम ऐसा चला कि उन्हें देखते ही मेरे चेहरे पर मुस्कान आ जाती और देखते ही वो मुझे आवाज़ लगाते—“माई!” और मेरे लिए गुलाब के लच्छे निकाल देते।

धीरे-धीरे यह उनकी आदत बन गई थी। वो जब भी गाँव आते, मुझे पुकारते। मैं मिल जाती तो मेरे हाथ में गुलाब के लच्छे रख देते और फिर मुझसे बातें भी किया करते थे।

कभी मैं घर पर नहीं होती तो वो मेरे हिस्से के लच्छे मैया को दे जाते।

एक दिन वो आए और हमेशा की तरह मुझे पुकारा। उस दिन मेरी जगह मैया बाहर निकलीं।

उन्होंने पूछा—“माई कहाँ है?”

मैया ने बताया, “स्कूल गई है।”

उन्होंने बिना कुछ कहे मेरे हिस्से के गुलाब के लच्छे कागज़ में निकाले और मैया को दे दिए।

उस दिन के बाद जब भी मैं स्कूल गई होती, वो मेरे हिस्से के लच्छे मैया को देकर जाते और जब मैं घर पर होती, तो मुझे ख़ुद देते थे। कुछ महीनों तक यही चलता रहा।

फिर एक दिन मेरी अम्मा ने मुझे पढ़ाई के लिए बुआ जी के पास भेज दिया। गाँव में पढ़ाई की उतनी सुविधाएँ नहीं थीं, और मैं वहाँ बिगड़ भी रही थी। सिर्फ़ खेलती ही रहती थी। पढ़ती बिल्कुल नहीं थी। इसलिए आगे की पढ़ाई के लिए मुझे वहीं रहना था।

उसके बाद जब एक दिन माई वाले फिर गाँव आए। उन्होंने हमेशा की तरह आवाज़ लगाई—“माई!” उनकी आवाज़ सुनकर मैया बाहर आईं।

उन्होंने गुलाब के लच्छे कागज़ में निकालते हुए मेरे बारे में पूछा, “माई स्कूल गई है क्या?”

मैया ने बताया—“वो अपनी बुआ जी के पास गई है।”

उन्होंने कहा—“अच्छा! कब लौटेगी?”

मैया ने कहा—“अब वो वहीं रहेगी और वहीं पढ़ेगी।”

यह सुनकर वो कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने बस इतना कहा—“अच्छा...”

उनके चेहरे पर न जाने कैसी उदासी उतर आई और आँखें भर आईं।

उस उम्र में मैं वहाँ मौजूद नहीं थी, इसलिए उनकी आँखों का वह भाव देख नहीं पाई। लेकिन बाद में जब मैया ने मुझे यह बात बताई, तो न जाने क्यों वो छोटी-सी बात मेरे मन में हमेशा के लिए रह गई।

इसके बाद जब भी मैं गाँव आती और माई वाले भी आ जाते, मैं उनसे ज़रूर मिलती। उनके लिए मैं तब भी वही माई थी।

वो मुझे वैसे ही गुलाब के लच्छे देते थे। सिर्फ़ मुझे ही नहीं, मेरे भाइयों को भी दिया करते थे। शायद बच्चों को कुछ देने में उन्हें ख़ुशी मिलती थी।

फिर धीरे-धीरे समय बीतता गया। कभी मैं गाँव में होती तो वो नहीं आते और कभी वो आते तो मैं गाँव में नहीं होती। हमारी मुलाक़ातें कम होती गईं।

फिर काफ़ी समय तक वो गाँव नहीं आए। सुना था, उनके घर में कोई बीमार था।

उसके बाद जब एक बार फिर उनकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी, तब तक मैं शायद 13 साल की हो चुकी थी।

वो जब हमारे मोहल्ले में आए, मैं उनकी आवाज़ सुनते ही दौड़कर बाहर चली गई और जाकर दरवाज़े पर खड़ी हो गई।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे उन्होंने मुझे पहचान लिया हो।

उनकी आँखों में शायद वही पुरानी पहचान थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो फिर से मुझे गुलाब के लच्छे देना चाहते हों, मुझसे वैसे ही बातें करना चाहते हों, जैसे बचपन में किया करते थे।

लेकिन इस बार मैं उनके पास नहीं गई। न जाने क्यों।

शायद उम्र के साथ आई झिझक थी। शायद इतने सालों बाद उनसे बात करने में अजीब-सा संकोच था। या शायद मैं ख़ुद समझ नहीं पाई कि उस पल मुझे क्या करना चाहिए।

मैं बस दरवाज़े पर खड़ी रही। उन्होंने कुछ कहा या नहीं, मुझे अब ठीक से याद नहीं।

मैं भी उनसे कुछ नहीं कह पाई और फिर चुपचाप वापस घर के अंदर आ गई।

बस इतनी-सी ही तो बात थी। लेकिन उस दिन का अफ़सोस आज भी मेरे मन में है।

काश, उस दिन मैं उनके पास चली गई होती।

काश, उनसे पूछ लिया होता—“माई वाले, इतने दिन कहाँ थे?”

काश, थोड़ी देर उनके पास बैठकर बात कर ली होती।

काश, एक बार फिर उनके हाथ से गुलाब के लच्छे ले लिए होते।

उसके बाद मैंने उन्हें फिर कभी नहीं देखा।

समय आगे बढ़ता गया। गाँव में बदलाव आ गए, लोग बदल गए और बचपन भी कहीं पीछे छूट गया। लेकिन कुछ आवाज़ें शायद कभी पुरानी नहीं होतीं।

आज भी कभी किसी गली में साइकिल की घंटी सुनाई देती है, तो अनायास ही मेरा ध्यान उस ओर चला जाता है।

कभी-कभी सोचती हूँ—पता नहीं माई वाले अब कहाँ होंगे? कैसे होंगे? क्या उन्हें भी कभी अपनी वो छोटी-सी माई याद आती होगी? शायद नहीं।

शायद उनके लिए मैं गाँव के उन बहुत-से बच्चों में से बस एक बच्ची रही होऊँगी।

लेकिन मेरे लिए वो सिर्फ़ चूरन और गुलाब के लच्छे बेचने वाले आदमी नहीं थे। वो मेरे बचपन की उन छोटी-छोटी ख़ुशियों का हिस्सा थे, जिनकी क़ीमत तब समझ नहीं आई थी।

इसलिए आज यह कहानी लिख रही हूँ। शायद कभी किसी तरह यह उन तक पहुँच जाए। वो इसे पढ़ें और पहचान लें कि उनकी माई कौन है।

शायद... कभी फिर किसी गली में उनकी साइकिल की घंटी सुनाई दे।

इस बार मैं दरवाज़े पर खड़ी होकर वापस नहीं लौटूँगी। बल्कि उनसे ख़ूब सारी बातें करूँगी।

उनका हाल पूछूँगी, अपना हाल बताऊँगी। शायद वो भी मुस्कुराकर हमेशा की तरह कहेंगे—“माई!” और मेरे हाथ में फिर से गुलाब के लच्छे रख देंगे।

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