रिमझिम : एक अनकही प्रतीक्षा

"कुछ लोग हमारी जिंदगी में हमेशा के लिए नहीं आते हैं। वे सिर्फ एक मौसम बनकर आते हैं... और फिर हर साल उसी मौसम के साथ याद बनकर लौटते हैं।"
मैं रिमझिम, उत्तर प्रदेश के फ़र्रुखाबाद ज़िले में रहने वाली एक साधारण-सी लड़की। लेकिन मेरी कहानी शायद साधारण नहीं है। यह कहानी किसी प्रेम की नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रतीक्षा की है, जो हर साल बसंत के साथ फिर जीवित हो जाती है।
कहा जाता है कि हर शहर की अपनी एक पहचान होती है। फ़र्रुखाबाद... एक ऐसा शहर है जहाँ सुबह मंदिरों की घंटियाँ और मस्जिदों की अज़ान के साथ जागती हैं। जहाँ संकरी गलियों में अपनापन बसता है और हर मौसम अपने साथ एक नई रौनक लेकर आता है।
इस शहर की पहचान सिर्फ उसकी गलियाँ या बाज़ार नहीं बल्कि उसका इतिहास, उसकी संस्कृति और उसकी कारीगरी है।
फ़र्रुखाबाद अपनी ज़रदोज़ी की बारीक कारीगरी के लिए जाना जाता है, जहाँ कारीगर नग, मोती और धागों से साधारण कपड़ों को भी कला का रूप देते हैं। लेकिन अगर कोई मुझसे पूछे कि फ़र्रुखाबाद की सबसे खूबसूरत पहचान क्या है, तो मैं कहूँगी "बसंत"।
दूसरे शहरों में लोग मकर संक्रांति पर पतंगें उड़ाते हैं, लेकिन हमारे यहाँ बसंत पंचमी का इंतज़ार होता है। सुबह माँ सरस्वती की पूजा होती है, उसके साथ ही पूरा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। कुछ बच्चे तो सुबह होते ही पतंग और चरखी के साथ छत पर पहुँच जाते हैं। शहर में सभी लोग इस त्योहार को बड़े धूम-धाम से मनाते हैं, साथ ही शाम के समय कंदीलें भी उड़ाई जाती हैं।
बचपन से बसंत मेरा पसंदीदा त्योहार रहा है लेकिन इसकी एक वजह ऐसी भी थी जो सिर्फ मुझे ही पता थी।
बात है 2017 की, उस वक्त मेरी उम्र लगभग 13 वर्ष रही होगी। होली का दिन था। गलियाँ रंगों से सराबोर थीं। हर तरफ हँसी, शोर और रंगों की महक फैली हुई थी। हवा में अबीर-गुलाल की खुशबू ऐसी घुली हुई थी मानो किसी ने ढेर सारा इत्र छिड़क दिया हो। साथ ही हर ओर ढोल की थाप और 'होली है' की गूंज सुनाई दे रही थी।
धीरे-धीरे सूरज भी पश्चिम की ओर रवाना हो चला। रंगों का शोर भी थमने लगा। सभी लोग अपने-अपने घरों में लौट आए। पूरे मोहल्ले में एक शांत-सी थकान बिखर गई।
मैं भी नहाकर अपनी किताबें लेकर छत पर आ गई ताकि पढ़ाई के साथ गीले बाल भी सूख जाएँ। अगले दिन परीक्षा थी इसलिए माँ की भी सख़्त हिदायत थी कि अब होली खत्म, अब सिर्फ पढ़ाई होगी।
गीले बालों को धूप में सुखाते हुए मैं किताब के पन्नों में खोने की कोशिश कर रही थी। हल्की-हल्की सुनहरी धूप चेहरे पर पड़ रही थी और बीच-बीच में ठंडी हवा बालों को छू जाती थी।
तभी न जाने क्यों मेरा ध्यान किताब से हट गया। मैंने अनायास ही सिर उठाया और सामने वाली छत की ओर देखा। शायद इस एक पल ने मेरे आगे की कहानी का रास्ता तय कर दिया था।
उस वक्त सामने वाली छत पर एक लड़का टहल रहा था। उसकी उम्र शायद 22 या 23 वर्ष होगी। वह काली शर्ट और नीली जींस में था। उसके चेहरे पर ऐसी बेखबरी थी मानो उसे कोई अंदाज़ा ही न हो कि एक अनजान सी लड़की उसे पहली दफ़ा देख रही है। मैं कुछ पल के लिए उसे देखती ही रह गई।
न जाने उसमें ऐसा क्या था। न तो वह किसी फिल्मी हीरो के जैसा था। न ही उसने ऐसा कुछ किया था कि किसी का ध्यान उसकी ओर जाए। वो तो बस अपनी ही धुन में टहल रहा था। हाँ, बस उसके चेहरे पर एक अलग सी शांति थी। कभी वो आसमान की ओर देखता, कभी छत के किनारे जाकर नीचे झाँकता और फिर धीरे-धीरे वापस चलने लगता।
तभी आस-पास से कुछ आवाज़ आई, मेरा ध्यान टूटा और याद आया कि मैं तो पढ़ने बैठी थी। मुस्कुराकर मैं अपनी किताब की ओर लौट आई और पढ़ना शुरू किया।
अगले दिन मैं स्कूल गई, परीक्षा दी। मैं उसे भूल चुकी थी। वो मेरे ज़हन में बिल्कुल भी नहीं था। मगर स्कूल से आते वक्त मुझे वो फिर से दिखा। तब मुझे पता चला कि मेरे घर के पास वाले कारखाने में वो ज़रदोज़ी का काम करता है।
हो सकता है वो पहले भी मेरी नजरों के सामने आया हो। लेकिन होता है न कि व्यक्ति हर रोज़ पास से गुज़र जाए, सामने आकर खड़ा हो जाए तब भी नहीं दिखता है। लेकिन वही अगर कोई एक बार देखने के बाद ज़हन में बस जाए तो उसकी धुंधली-सी झलक भी क्लियर दिखाई देने लगती है। उसी तरह अब वो भी मुझे दिखाई देने लगा था।
सुबह स्कूल जाती थी तब भी वह दिख जाता था। दोपहर में लौटने पर भी उसकी एक झलक आँखों में पड़ ही जाती थी। कभी-कभी मैं घर के पास वाली दुकान पर जाती थी तो वहाँ भी वो मुझे मिल जाता था। कब उसे देखना मेरी आदत बन गई मुझे इस बात का पता भी न चला।
अब घर की खिड़की मेरे लिए सिर्फ खिड़की नहीं रह गई थी। बल्कि मेरे इंतजार की चौखट बन गई थी। दोपहर होते ही मैं अनजाने में उसी के पास जाकर खड़ी हो जाती थी। नज़रें सड़क पर होती थीं और मन में बस एक ही आवाज़ आती — वो बस आता ही होगा।
स्कूल से लौटते समय मेरी चाल हमेशा उस मोड़ पर धीमी हो जाती, जहाँ से उसकी मंज़िल दिखाई देती थी। मैं बिना रुके, बिना किसी को एहसास होने दिए, बस एक बार पलटकर उसे देख लिया करती थी। वो एक झलक जाने क्यों पूरे दिन की थकान मिटा देती थी।
अक्सर मैं खिड़की की ओट से उसे काम करते हुए देखा करती थी। उसके सामने रंग-बिरंगे धागे, छोटे-छोटे नग, मोती और अधूरी कढ़ाई वाले कपड़े रखे होते थे। उसकी उँगलियाँ इतनी सफ़ाई से चलतीं कि लगता मानो धागे नहीं, कोई कहानी बुन रहा हो। वो साधारण से कपड़े पर एक-एक नग इस तरह सजाता था कि धीरे-धीरे वही कपड़ा किसी दुल्हन के लहंगे जैसा खूबसूरत बन जाता था।
तब मुझे ज़रदोज़ी की बारीकियाँ समझ नहीं आती थीं, लेकिन इतना ज़रूर लगता था कि जो इंसान इतनी नफ़ासत से काम करता है, उसके भीतर भी कहीं-न-कहीं बहुत सुकून होगा।
कुछ ही दिनों में उसकी दिनचर्या भी मुझे याद हो गई थी। दोपहर में जैसे ही पास की मस्जिद से अज़ान की आवाज़ गूँजती, मुझे मालूम हो जाता कि अब वह कुछ ही देर में उस रास्ते से गुज़रेगा। मैं चुपचाप खिड़की के पास जाकर खड़ी हो जाती। वह सफ़ेद टोपी पहने धीरे-धीरे मस्जिद की ओर चला जाता और कुछ देर बाद उसी रास्ते से लौट आता।
कई रोज़ मैं छत पर खड़ी होकर सड़क को निहारते हुए उसके गुज़र जाने का इंतजार किया करती थी।
हमारी नज़रें शायद ही कभी मिली हों। और अगर मिली भी हों, तो बस एक पल के लिए। लेकिन उस एक पल को मैं न जाने कितनी देर तक याद रखती थी।
रात को जब सब सो जाते, मैं छत पर लेटी आसमान देखा करती। तारों को निहारते-निहारते जाने कब उसके बारे में छोटी-छोटी कहानियाँ बना लेती। कभी सोचती, उसका बचपन कैसा रहा होगा। कभी सोचती, उसे कौन-सा रंग पसंद होगा। तो कभी मेरे ज़हन में ख्याल आता क्या उसकी शादी हो गई होगी या अभी भी कुंवारा होगा। कभी सोचती कि अगर हम कभी बात करें तो वह क्या कहेगा। फिर अगले ही पल खुद ही मुस्कुरा देती। क्योंकि इन सवालों के जवाब शायद कभी मिलने ही नहीं थे। यहाँ तक कि मुझे तो उसका नाम भी नहीं पता था।
एक रोज़ मैंने देखा वो एक छोटे बच्चे के साथ था। तब भी मेरे ज़हन में ख्याल आया, क्या ये इसका बेटा है? फिर खुद ही मन से आवाज़ आई... शायद इसके बड़े भाई का होगा।
कुछ समय बाद वो भी मुझे पहचानने लगा था। कभी-कभी जब मैं छत पर पढ़ने बैठती, तो मुझे ऐसा लगता जैसे उसकी नज़र भी एक पल के लिए मेरी ओर ठहर जाती हों। हालाँकि उसने कभी मुझसे बात करने की कोशिश नहीं की और न ही मैंने। मेरे लिए बस उसकी एक झलक ही काफ़ी थी।
मैं उस वक्त सिर्फ़ 13 साल की थी। वो मुझसे काफ़ी बड़ा था। हम दोनों अलग धर्म से थे। मैं हिंदू थी और वो मुस्लिम था। इसलिए मैंने कभी भी बात को ज़्यादा आगे बढ़ाने का सोचा ही नहीं। जो था मैं उतने में ही खुश थी।
कई दफ़ा मैं रात को जल्दी सोने की कोशिश किया करती थी। सोचती थी, सो जाऊँगी तो उसे सपने में देख पाऊँगी। अभी वो सामने नहीं है तो क्या? मैं उससे सपने में मिल लूँगी। सपनों में भी मेरी कभी उससे बात नहीं हुई। लेकिन ये सिलसिला यूँ ही हमेशा जारी रहा।
मगर सब कुछ हमेशा एक-सा नहीं रह सकता है। वही हमारे साथ भी हुआ। कुछ समय बाद वो शहर से बाहर चला गया। मुझे वो कई दिनों तक नहीं दिखा।
शुरुआत में मैंने सोचा, शायद किसी रिश्तेदार के यहाँ गया होगा। दो-चार दिन में लौट आएगा। लेकिन दिन हफ़्तों में बदल गए। हफ़्ते महीनों में। मैं रोज़ उसी खिड़की तक जाती, उसी सड़क को देखती, मगर वहाँ अब सिर्फ़ लोग गुज़रते थे... वो नहीं।
धीरे-धीरे मैंने भी खुद को समझाना शुरू कर दिया। पढ़ाई बढ़ गई थी। कक्षाएँ बदल गई थीं। ज़िम्मेदारियाँ भी पहले से ज़्यादा हो गई थीं।
समय के साथ मैं भी बड़ी होती जा रही थी लेकिन मेरे अंदर एक वही पुरानी छोटी-सी आदत कहीं खो गई थी।
दोपहर में अज़ान की आवाज़ अब भी कानों में पड़ती। अनजाने में नज़र खिड़की की ओर उठ जाती। अगले ही पल याद आता... "वो तो अब यहाँ है ही नहीं" और मैं उदास हो जाती।
देखते-देखते पूरा एक साल बीत गया। फिर बसंत आया। उस बार भी बसंत पंचमी हमेशा की तरह रंगों से भरी हुई थी। सरस्वती पूजन के बाद मैं भी हमेशा की तरह छत पर गई। हर छत से बच्चों की आवाज़ें आ रही थीं—
"ये काटा... वो काटा...! लपटेर ले... लपटेर ले... पेंच लड़ा पेंच... काटी ओय........"
न जाने क्यों, उस दिन फिर मेरा मन उसे ही ढूँढ रहा था। मैंने दूर-दूर तक नज़र दौड़ाई, और तभी... उसी छत पर, हाथ में चरखी लिए, वही काली-सी परछाईं दिखाई दी।
दिल ने बिना किसी सबूत के उसे पहचान लिया। वो वही था। मैं उसकी चाल-ढाल, बाल, पहनावा… पहचानती थी। उस दिन वो सफ़ेद शर्ट में था। जिसकी बाज़ुओं पर नीले रंग से कुछ डिज़ाइन बनी हुई थी। मैं दूर खड़ी उसे पतंग उड़ाते हुए देखती रही। न उसने मेरी ओर देखा, न मैंने उसे आवाज़ दी। शाम ढल गई। बसंत भी ढल गया और वो फिर कहीं चला गया।
अगले साल फिर बसंत आया। वो भी आया। बस उसी एक दिन।
अगले साल... फिर वही हुआ।
अब मुझे समझ आने लगा था। मेरे लिए अब बसंत का मतलब पतंगें नहीं रही थीं, बल्कि उसके आने की उम्मीद बन गया था।
पूरे साल मैं उसके बारे में नहीं सोचती थी। लेकिन जैसे ही सर्दियाँ ढलने लगती थीं, बसंत नज़दीक आता था, बाज़ार में रंग-बिरंगी पतंगें दिखने लगती थीं। मेरे भीतर कहीं एक पुरानी प्रतीक्षा जाग जाती थी।
समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा। मैं स्कूल से कॉलेज पहुँच गई। उम्र और ज़िम्मेदारियाँ दोनों ही बढ़ती गईं। ज़िंदगी ने बहुत से नए लोग दिए। बहुत-सी नई यादें भी। लेकिन कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें कोई नई याद कभी बदल नहीं पाती।
फिर एक बार... बसंत आया।
मैं पहले की तरह छत पर गई। पूरा आसमान पतंगों से भरा हुआ था। हर तरफ़ वही शोर, वही हँसी, वही हवा, लेकिन इस बार... वो नहीं आया।
मैंने सोचा, शायद देर से आएगा। शाम तक इंतज़ार किया। फिर सोचा, शायद कल दिखे या शायद अगले साल। लेकिन अगला बसंत भी बीत गया। फिर उसके बाद भी कई साल, कई बसंत बीत गए लेकिन वो नहीं आया। अब उसे देखे हुए कई साल बीत चुके हैं।
आज भी... हर बसंत मेरी आँखें उसे कुछ पल के लिए ज़रूर ढूँढ़ती हैं। अब मैं उसका इंतज़ार नहीं करती। शायद उस इंतज़ार की आदत का करती हूँ।
कभी-कभी लगता है, वो मेरी ज़िंदगी का कोई किरदार नहीं था। वो तो बस एक मौसम था जो हर साल आया, मेरे भीतर कुछ पल ठहरा, और फिर चुपचाप लौट गया।
आज भी जब फ़र्रुखाबाद का आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, मैं अनायास ही एक बार उस पुरानी छत की ओर देख लेती हूँ। इस उम्मीद में नहीं कि वो मिल जाएगा।
बल्कि इस एहसास के साथ कि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा के लिए नहीं आते हैं।
वे सिर्फ़ एक मौसम बनकर आते हैं और फिर पूरी ज़िंदगी एक ख़ूबसूरत, अनकही प्रतीक्षा बनकर रह जाते हैं और शायद यही प्रतीक्षा उनसे जुड़ी यादों को खास बना देती है... जैसे कि मेरे लिए "बसंत"।

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harsh mani
3 days agoअप्रतिम & अतिउत्तम ❤️😀 बढ़िया लिखा है ।
Adwitiya Mishra
3 days ago@harsh mani thank you Mani ❣️
Neelesh Vishwakarma
5 days agoInteresting story
Adwitiya Mishra
5 days ago@Neelesh Vishwakarma Thank you 😊
Sourav Kumar Panda
6 days agoTruly beautiful and amazing story 💓
Adwitiya Mishra
5 days ago@Sourav Kumar Panda Dhanyawad dada ❣️
Krishna Singh
6 days agobahut khoob
Krishna Singh
6 days agobahut khoob
Adwitiya Mishra
5 days ago@Krishna Singh ❣️❣️
Vishal Yadav
6 days agoमेरे पास शब्द नहीं हैं। इस कहानी में भावनाओं को इतनी खूबसूरती से व्यक्त किया गया है, यह एक बहुत ही सुंदर कहानी है🥰👍🤗
Adwitiya Mishra
5 days ago@Vishal Yadav Thank you 😊
Vikram pandey
6 days agoThis is an excellent story; everyone should definitely read or listen to it at least once.