वो मेरी थी ही नहीं… फिर भी मेरी सबसे ख़ूबसूरत कहानी थी

उससे मेरी पहली मुलाक़ात कोई फ़िल्मी सीन नहीं थी।
न बारिश हो रही थी, न हवाओं में कोई ख़ास नज़्म थी। बस एक आम-सा दिन था... और उस आम दिन में वो मुझे दिखी।
पता नहीं उसकी आँखों में ऐसा क्या था, लेकिन उस दिन के बाद मेरी नज़र हर भीड़ में उसे ढूँढने लगी।
धीरे-धीरे मुझे उसकी आदत हो गई।
उसकी एक मुस्कान मेरा पूरा दिन बदल देती थी। उसका एक छोटा-सा मैसेज घंटों चेहरे पर मुस्कान रखता था। और जब वो किसी और से हँसकर बात करती, तो मैं चुपचाप अपने दिल को समझाता—
"तुझे उससे मोहब्बत है... हक़ नहीं।"
मैंने कभी उससे कुछ माँगा नहीं।
न उसका हाथ,
न उसका वादा,
न उसके साथ का भविष्य।
बस चाहता था कि वो खुश रहे।
कई बार मन हुआ कि उसे बता दूँ कि मैं उसे कितना चाहता हूँ। कितनी रातें उसके नाम सोचते हुए गुज़री हैं। कितनी कविताएँ लिखीं और फिर सिर्फ़ इसलिए मिटा दीं क्योंकि उनमें उसका नाम बहुत साफ़ दिखाई देता था।
लेकिन हर बार डर गया।
डर इस बात का नहीं था कि वो मना कर देगी।
डर इस बात का था कि कहीं वो मेरी ज़िंदगी से बिल्कुल चली न जाए।
इसलिए मैंने अपने प्यार को अपने अंदर ही रहने दिया।
एक शाम हम दोनों साथ बैठे थे।
वो अपने भविष्य के बारे में बता रही थी। उसकी आँखों में सपने थे... और उन सपनों में मैं कहीं नहीं था।
मैं मुस्कुराता रहा।
वो अचानक बोली,
"तुम इतने चुप क्यों हो?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
दिल ने कहा—
"क्योंकि मेरी हर ख़ामोशी में तुम हो।"
लेकिन होंठों ने सिर्फ़ इतना कहा—
"कुछ नहीं... तुम्हारी बातें सुन रहा हूँ।"
उसने मुस्कुराकर सिर झुका लिया।
और मैं उसी मुस्कान में अपना पूरा संसार देखता रहा।
कुछ दिनों बाद उसने बताया कि उसकी ज़िंदगी में कोई और आ गया है।
उस पल मेरे अंदर कुछ टूट गया।
लेकिन मैंने उसे बधाई दी।
"तुम बहुत खुश रहना।"
बस यही कह पाया।
उस रात मैंने पहली बार समझा कि एकतरफ़ा मोहब्बत में इंसान हारता नहीं है...
वो बस अपने हिस्से की ख़ुशी किसी और के नाम कर देता है।
आज भी कभी उसका ख़याल आता है तो दिल शिकायत नहीं करता।
क्योंकि मैंने उससे मोहब्बत की थी उसे पाने के लिए नहीं...
बल्कि इसलिए कि उसके होने से मेरी दुनिया थोड़ी और ख़ूबसूरत हो गई थी।
वो मेरी कभी थी ही नहीं।
लेकिन सच कहूँ...
मेरी ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत कहानी फिर भी वही है।
क्योंकि उस कहानी में मैंने पहली बार किसी को इतना चाहा था कि उसकी ख़ुशी के सामने अपनी मोहब्बत भी छोटी लगने लगी थी।
और शायद यही एकतरफ़ा प्यार की सबसे ख़ूबसूरत सज़ा है—
जिसे दिल से चाहो, उसे अपना न बना सको...
फिर भी पूरी उम्र उसे अपना प्यार कहते रहो।

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