वह प्रेम जो नाम नहीं माँगता

बरसात की उस शाम शहर के पुराने रेलवे स्टेशन पर एक आदमी हर रोज़ की तरह बेंच नंबर सात पर बैठा था। उम्र पचपन के आसपास होगी। बालों में सफ़ेदी उतर आई थी, लेकिन आँखों में अब भी किसी के लौट आने की उम्मीद बची हुई थी।
स्टेशन के कुली, चायवाले और टिकट चेकर उसे “बाबूजी” कहकर बुलाते थे। कोई नहीं जानता था कि वह रोज़ शाम पाँच बजे से सात बजे तक वहीं क्यों बैठता है।
एक दिन एक छोटी बच्ची उसके पास आकर बोली—
“दादाजी, आप हर रोज़ यहाँ किसका इंतज़ार करते हैं?”
उसने मुस्कुराकर कहा—
“एक ट्रेन का… जो कभी समय पर नहीं आती।”
बच्ची हँस दी। उसे क्या पता था कि वह ट्रेन लोहे की नहीं, यादों की थी।
उस आदमी का नाम निरंजन था।
वह पेशे से किताबों की जिल्द बाँधने वाला कारीगर था। फटी हुई किताबों को नया जीवन देना ही उसका काम था। विडंबना यह थी कि वह दूसरों की किताबें तो जोड़ देता था, लेकिन अपनी ज़िंदगी के बिखरे पन्ने कभी नहीं जोड़ पाया।
कई वर्ष पहले एक युवती उसकी दुकान पर आई थी।
नाम था-सहर।
वह पुरानी किताबें खरीदती थी। नए पन्नों की चमक से ज़्यादा उसे पुराने कागज़ों की खुशबू पसंद थी।
निरंजन ने पहली बार किसी को किताबों से इस तरह बातें करते देखा था।
सहर कहती—
“किताबें भी इंसानों जैसी होती हैं। जितनी पुरानी होती हैं, उतनी सच्ची हो जाती हैं।”
धीरे-धीरे किताबों के बहाने बातें होने लगीं।
फिर चाय…
फिर लंबी खामोशियाँ…
और फिर वह रिश्ता, जिसमें “आई लव यू” कहने की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
एक दिन सहर ने कहा—
“अगर कभी मैं चली जाऊँ, तो मुझे ढूँढ़ना मत।”
निरंजन हँस पड़ा।
“तुम कोई किताब हो जो खो जाओगी?”
सहर ने पहली बार उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“कुछ लोग मिलते ही इसलिए हैं कि बिछड़ना सीख सकें।”
उस दिन निरंजन उस वाक्य का अर्थ नहीं समझ पाया।
कुछ महीनों बाद सहर अचानक आना बंद हो गई।
न कोई चिट्ठी…
न कोई संदेश…
न कोई पता…
निरंजन ने हर जगह तलाश की।
पुरानी किताबों की दुकानों में…
पुस्तकालयों में…
कॉलेज में…
यहाँ तक कि उन रास्तों पर भी, जहाँ वे साथ चले थे।
लेकिन सहर जैसे हवा में घुल गई थी।
लगभग एक वर्ष बाद डाकिए ने एक छोटा-सा पार्सल दिया।
उसमें एक पुरानी डायरी थी।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“जब तुम यह पढ़ रहे होगे, तब शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगी।”
निरंजन के हाथ काँप गए।
डायरी में लिखा था—
“मुझे कैंसर था। डॉक्टरों ने कहा था कि मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है।
मैं चाहती तो तुम्हें बता सकती थी।
तुम मेरे लिए सब कुछ छोड़ देते।
लेकिन प्रेम किसी का भविष्य नहीं छीनता।
इसलिए चली आई थी… चुपचाप।”
आँसुओं से अक्षर धुँधले हो गए।
आगे लिखा था—
“तुम्हें याद है, स्टेशन वाली बेंच?
मैंने कहा था न…
अगर कभी लौटूँगी तो वहीं मिलूँगी।”
डायरी के आख़िरी पन्ने पर एक टिकट चिपका था।
रेलवे का।
जिस दिन वे पहली बार मिले थे, उसी तारीख़ का।
नीचे सिर्फ़ एक पंक्ति थी—
“प्रेम का सबसे कठिन रूप, किसी को अपने बिना जीना सिखाना है।”
उस दिन से निरंजन रोज़ शाम स्टेशन जाने लगा।
उसे मालूम था कि सहर अब कभी नहीं आएगी।
लेकिन प्रेम हमेशा मिलने का नाम नहीं होता।
कभी-कभी प्रेम, प्रतीक्षा का दूसरा नाम भी होता है।
साल बीतते गए।
स्टेशन बदल गया।
नई बेंचें लग गईं।
डिजिटल बोर्ड आ गए।
पुराने इंजन संग्रहालय में पहुँच गए।
लेकिन बेंच नंबर सात पर बैठा वह आदमी नहीं बदला।
एक दिन वही छोटी बच्ची, जो अब बड़ी हो चुकी थी और पत्रकार बन गई थी, उसका इंटरव्यू लेने आई।
उसने पूछा—
“क्या आपको नहीं लगता कि आपने अपनी पूरी ज़िंदगी एक ऐसे व्यक्ति का इंतज़ार करते हुए बिता दी, जो कभी लौटकर नहीं आया?”
निरंजन मुस्कुराया।
“नहीं बेटी।”
“मैं उसका इंतज़ार नहीं कर रहा।”
“फिर?”
“मैं उस आदमी का इंतज़ार कर रहा हूँ जो उसके जाने के बाद मेरे भीतर कहीं खो गया था।”
पत्रकार चुप रह गई।
कुछ दिनों बाद निरंजन की तबीयत बिगड़ने लगी।
डॉक्टर ने कहा—
“अब आराम कीजिए।”
लेकिन वह आख़िरी बार स्टेशन गया।
बेंच नंबर सात पर बैठा।
जेब से वही पुरानी टिकट निकाली।
आसमान की ओर देखा।
धीरे से बोला—
“सहर… इस बार ट्रेन शायद सही प्लेटफ़ॉर्म पर आएगी।”
उसकी आँखें बंद हो गईं।
हाथ से टिकट फिसलकर ज़मीन पर गिर गई।
उसी समय एक हल्की हवा चली।
टिकट उड़कर पटरियों के पार चली गई।
जैसे किसी ने उसे सँभाल लिया हो।
कुछ दिनों बाद स्टेशन प्रशासन ने उस बेंच पर एक छोटी-सी पीतल की पट्टिका लगा दी।
उस पर लिखा था—
“यहाँ एक आदमी वर्षों तक किसी व्यक्ति का नहीं, प्रेम के विश्वास का इंतज़ार करता रहा।”
लोग आते।
बैठते।
फोटो खींचते।
और आगे बढ़ जाते।
लेकिन कुछ लोग उस पट्टिका को पढ़कर अनायास अपनी आँखें पोंछ लेते।
क्योंकि वे समझ जाते थे—
हर प्रेम का अंत विवाह नहीं होता।
हर बिछड़ना हार नहीं होता।
कुछ प्रेम कहानियाँ इसलिए अधूरी रहती हैं ताकि वे किसी एक जीवन की नहीं, हर उस दिल की कहानी बन जाएँ जिसने कभी किसी को पूरे मन से चाहा हो।
और शायद सच्चा प्रेम वही है—
जो साथ न रहते हुए भी, जीवन भर मनुष्य को थोड़ा और बेहतर, थोड़ा और गहरा, और थोड़ा अधिक मानवीय बना जाए।
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