Aakari khat
VITI will read this story for you

डाकघर के एक पुराने कोने में, धूल से ढका एक ख़त वर्षों से चुपचाप पड़ा था।
उसे कभी किसी ने ढूँढा नहीं, और न ही वह कभी अपनी मंज़िल तक पहुँच सका।
अजय मेहता, जो कुछ ही दिनों में सेवानिवृत्त होने वाले थे, अपनी मेज़ साफ़ कर रहे थे। चार दशकों की नौकरी में उन्होंने हज़ारों ख़त लोगों तक पहुँचाए थे—किसी के लिए खुशख़बरी, किसी के लिए इंतज़ार, तो किसी के लिए आख़िरी सलाम।
तभी उनकी नज़र उस धूल से ढके पुराने लिफ़ाफ़े पर पड़ी।
उन्होंने उसे उठाया और मुस्कुराते हुए कहा, “चलो... तुम्हें भी तुम्हारी मंज़िल तक पहुँचा देते हैं।”
लेकिन जैसे ही उन्होंने लिफ़ाफ़े को ध्यान से देखा, उनकी मुस्कान थम गई।
उस पर न कोई पता था... न कोई पिन कोड। बस एक डाकघर की धुंधली-सी मोहर लगी थी, जो समय के साथ लगभग मिट चुकी थी।
और नीचे केवल एक पंक्ति...
“अगर यह ख़त कभी तुम्हें मिले, तो समझना कि मैं तुमसे वह बात कभी कह नहीं पाया जो कहना चाहता था।”
तभी अजय मेहता की नज़र रवि पर पड़ी।
रवि डाकघर का सबसे हँसमुख कर्मचारी था। उसकी आदत थी कि वह हर मुश्किल काम को भी मुस्कुराकर कर देता था।
“रवि, ज़रा इधर आओ,” मेहता जी ने आवाज़ दी।
“जी सर?” रवि ने मुस्कुराते हुए पूछा।
मेहता जी ने पुराना लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा,
“चालीस साल की नौकरी में मैंने हज़ारों ख़त उनकी मंज़िल तक पहुँचाए हैं... लेकिन यह ख़त आज भी अपने किसी अपने का इंतज़ार कर रहा है।”
रवि ने लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया और हैरानी से पूछा, “लेकिन सर... इस पर तो कोई पता ही नहीं लिखा। फिर इसे पहुँचाएँगे कैसे?”
मेहता जी हल्की मुस्कान के साथ बोले, “पता नहीं है... लेकिन यक़ीन है कि इसकी भी कोई मंज़िल ज़रूर होगी। क्या तुम मेरी इस आख़िरी ड्यूटी में मेरा साथ दोगे?”
रवि बिना एक पल सोचे बोला, “ज़रूर सर... अब ये ख़त अकेला नहीं रहेगा।”
रवि ने मन ही मन सोचा, “हाँ तो कह दिया... लेकिन बिना पते के यह ख़त अपने मालिक तक पहुँचेगा कैसे?”
यही सवाल उसके दिमाग़ में बार-बार घूम रहा था।
ड्यूटी ख़त्म होने के बाद वह पास की एक छोटी-सी चाय की दुकान पर जाकर बैठ गया। उसने एक कुल्हड़ चाय मँगवाई और चाय की हर चुस्की के साथ उसके दिमाग़ में नए-नए ख़याल आने लगे।
“नाम नहीं... पता नहीं... कोई पहचान नहीं...” रवि सोच में पड़ गया। आख़िर सिर्फ़ एक धुंधली-सी डाकघर की मोहर के सहारे वह किसी अनजान इंसान तक कैसे पहुँचेगा?
तभी उसकी नज़र उस पुराने लिफ़ाफ़े पर दोबारा पड़ी। उसने उसे ध्यान से पलटा। शायद अब तक जो किसी की नज़र से छूट गया था, वही इस ख़त को उसकी मंज़िल तक पहुँचा सकता था... न चाहते हुए भी रवि ने धीरे से वह पुराना लिफ़ाफ़ा खोल दिया।
जैसे ही उसने अंदर हाथ डाला, एक पुरानी-सी तस्वीर और रेलवे टिकट का फटा हुआ टुकड़ा नीचे गिर पड़ा।
रवि ने तस्वीर उठाकर ध्यान से देखी। तस्वीर में दो लोग मुस्कुरा रहे थे, लेकिन समय ने उसकी स्याही को इतना धुंधला कर दिया था कि उनके चेहरे साफ़ दिखाई नहीं दे रहे थे। तस्वीर में रोहित और मीरा, दोनों के चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ चुके थे। फिर भी रवि को विश्वास था कि यही तस्वीर उसे मीरा तक पहुँचने का रास्ता दिखा सकती है।
फिर उसकी नज़र उस फटे हुए रेलवे टिकट पर गई। टिकट का आधा हिस्सा गायब था, लेकिन जो बचा था, उसमें कुछ अक्षर अब भी साफ़ दिखाई दे रहे थे।
रवि के मन में उम्मीद की एक हल्की-सी किरण जगी।
“शायद... यही मेरी पहली कड़ी है।”
लेकिन तभी उसकी नज़र उस ख़त पर गई।
अब उसके मन में एक अलग ही बेचैनी थी।
“क्या मुझे यह ख़त पढ़ना चाहिए?” उसने खुद से पूछा।
उसका दिल कह रहा था कि शायद इस ख़त में वह जवाब छिपा है जिसकी उसे तलाश है, लेकिन उसका ज़मीर उसे रोक रहा था।
“यह किसी की निजी भावनाएँ हैं... बिना इजाज़त इन्हें पढ़ना ठीक नहीं।”
रवि ने गहरी साँस ली और ख़त को वापस लिफ़ाफ़े में रखने ही वाला था... तभी उसकी नज़र लिफ़ाफ़े के अंदर लिखे एक छोटे-से शब्द पर पड़ी। लिफ़ाफ़े के अंदर रखा वह ख़त समय की मार झेल चुका था। उसका रंग मटमैला पड़ गया था, किनारे जगह-जगह से घिस चुके थे, लेकिन उस पर लिखे शब्द आज भी उतने ही स्पष्ट थे, मानो किसी ने उन्हें कल ही लिखा हो।
रवि ने काँपते हाथों से ख़त खोला।
सबसे ऊपर लिखा था—
“मेरी प्यारी मीरा,”
और सबसे नीचे...
“तुम्हारा, रोहित।”
रवि कुछ पल के लिए ख़ामोश रह गया।
“तो इस ख़त को रोहित नाम के किसी शख़्स ने अपनी मीरा के लिए लिखा था...” उसने धीरे से खुद से कहा। रवि ने गहरी साँस ली और ख़त पढ़ना शुरू किया।
“यह कहानी 1989 से शुरू होती है...”
उस समय गाँवों में लड़कियों की पढ़ाई आज जितनी सामान्य नहीं थी। ज़्यादातर परिवार उन्हें आठवीं या दसवीं के बाद पढ़ाना ज़रूरी नहीं समझते थे।
रोहित और मीरा एक ही गाँव के रहने वाले थे। दोनों की पहली मुलाक़ात आठवीं कक्षा में हुई। वे एक ही स्कूल में पढ़ते थे, लेकिन कभी एक-दूसरे से ज़्यादा बात नहीं करते थे।
रोहित पढ़ाई में तेज़ था, जबकि मीरा शांत स्वभाव की, कम बोलने वाली और किताबों में खोई रहने वाली लड़की थी। समय अपनी रफ़्तार से बीतता गया। देखते ही देखते दो साल गुज़र गए।
इन दो वर्षों में रोहित और मीरा एक-दूसरे के काफ़ी क़रीब आ चुके थे। एक ही गाँव में रहने की वजह से उनकी मुलाक़ात अक्सर हो जाती थी। कभी मीरा की माँ उसे रोहित के घर से कोई सामान लाने भेज देतीं, तो कभी रोहित किसी बहाने मीरा के घर चला जाता।
विद्यालय में भी दोनों अक्सर साथ दिखाई देते। कभी एक ही पेड़ की छाँव में बैठकर पढ़ते, तो कभी स्कूल से लौटते हुए पूरे रास्ते बातें करते।
कब उनकी दोस्ती एक-दूसरे की आदत बन गई, इसका एहसास शायद उन्हें भी नहीं हुआ।
लेकिन उन्हें क्या पता था कि समय उनके लिए एक ऐसा मोड़ लेकर आने वाला है, जो उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देगा। शायद दोनों को उस दिन अंदाज़ा भी नहीं था कि उनकी मुलाक़ात एक ऐसी कहानी की शुरुआत बनेगी, जिसे सालों बाद कोई अनजान इंसान एक पुराने ख़त में पढ़ रहा होगा। समय के साथ दोनों ने दसवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास कर ली।
अब उनकी ज़िंदगी एक नए मोड़ पर खड़ी थी। रोहित आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाने वाला था, जबकि मीरा की पढ़ाई यहीं रुकने की बात घर में होने लगी थी।
शहर जाने से एक दिन पहले दोनों गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे मिले।
कुछ देर तक दोनों बिना कुछ बोले एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर रोहित ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा,
“मीरा, मैं चाहे जहाँ रहूँ... एक बात का वादा करता हूँ, कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूँगा।”
मीरा की आँखें नम हो गईं। उसने मुस्कुराकर अपना हाथ रोहित की ओर बढ़ाया और कहा,
“और मैं भी तुम्हारा इंतज़ार करूँगी... चाहे कितना भी वक़्त क्यों न लग जाए।”
दोनों ने एक-दूसरे से साथ निभाने का वादा किया, लेकिन उन्हें क्या पता था कि ज़िंदगी अपने वादों से ज़्यादा अपने इम्तिहानों के लिए याद रखी जाती है। शहर पहुँचने के बाद रोहित अपनी पढ़ाई में पूरी तरह व्यस्त हो गया। नई जगह, नए लोग और पढ़ाई का बढ़ता दबाव... इन सबके बीच उसके पास समय कम होता गया। फिर भी जब भी मौका मिलता, वह मीरा को ख़त लिखता।
वहीं दूसरी ओर, गाँव में मीरा की ज़िंदगी भी बदलने लगी थी।
दसवीं के बाद उसकी पढ़ाई रुक गई। अब घर में उसकी शादी की बातें होने लगी थीं।
रिश्तेदार अक्सर कहते,
“लड़की जितनी जल्दी अपने घर चली जाए, उतना अच्छा है।”
मीरा हर बार चुप रह जाती। उसके मन में बस एक ही सवाल था—
“क्या रोहित लौटेगा... या उसके साथ किए गए सारे वादे सिर्फ़ वादे बनकर रह जाएँगे?” उधर शहर की नई ज़िंदगी ने रोहित को अपने रंग में रंगना शुरू कर दिया था।
कॉलेज, नए दोस्त, पढ़ाई और शहर की चकाचौंध में वह धीरे-धीरे उलझता चला गया।
पहले जहाँ वह हर हफ़्ते मीरा को एक ख़त लिखा करता था, अब महीनों तक कोई ख़त नहीं आता।
मीरा हर रोज़ डाकिए के आने का इंतज़ार करती, लेकिन हर बार उसे निराशा ही हाथ लगती।
शायद रोहित व्यस्त था... या शायद शहर ने उसके वादों को धुंधला कर दिया था।
लेकिन मीरा ने उम्मीद का दामन अब भी नहीं छोड़ा था। उसे विश्वास था कि एक दिन ज़रूर कोई ख़त आएगा। आख़िरकार वह दिन भी आ गया, जिससे मीरा सबसे ज़्यादा डरती थी।
लाख चाहकर भी वह अपने परिवार के फ़ैसले के आगे कुछ न कह सकी।
कुछ ही महीनों बाद मीरा की शादी राकेश नहीं, रमेश नाम के एक युवक से कर दी गई।
रमेश एक समझदार, शांत और सुलझा हुआ इंसान था। वह रिश्तों की क़द्र करना जानता था और मीरा का सम्मान करता था।
लेकिन मीरा के चेहरे की मुस्कान में छिपी उदासी को वह अक्सर महसूस करता था।
उसने कभी मीरा से उसके अतीत के बारे में सवाल नहीं किया। शायद वह जानता था कि कुछ ज़ख्मों को शब्दों की नहीं, समय की ज़रूरत होती है।
मीरा ने पत्नी होने का हर फ़र्ज़ निभाया, लेकिन उसके दिल का एक कोना अब भी उन अधूरे वादों और उन ख़तों का इंतज़ार कर रहा था, जो कभी आए ही नहीं। करीब दो साल बाद रोहित अपनी पढ़ाई पूरी करके गाँव लौटा।
गाँव की पगडंडियाँ वही थीं, खेत वही थे, लेकिन उसके मन में बस एक ही चाह थी—मीरा से मिलने की।
घर पहुँचते ही उसने सबसे पहला सवाल पूछा,
“मीरा कैसी है?”
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर किसी ने धीमी आवाज़ में कहा,
“तुम्हें नहीं पता...? मीरा की शादी तो लगभग डेढ़ साल पहले ही हो गई थी। अब वह अपने ससुराल में है।”
यह सुनते ही रोहित के हाथ से उसका बैग नीचे गिर पड़ा।
उसे ऐसा लगा मानो किसी ने एक पल में उसके सारे सपने छीन लिए हों।
वह बिना कुछ बोले उसी बरगद के पेड़ के नीचे चला गया, जहाँ कभी उसने मीरा से हमेशा साथ निभाने का वादा किया था।
पेड़ तो आज भी वहीं खड़ा था... बस वादा निभाने वाले दो लोग अब साथ नहीं थे। उधर मीरा ने भी धीरे-धीरे अपनी नई ज़िंदगी को स्वीकार कर लिया था।
रमेश ने उसे कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दी। अपने स्नेह, सम्मान और धैर्य से उसने मीरा के मन में विश्वास की एक नई शुरुआत की।
कुछ वर्षों बाद उनके घर एक प्यारी-सी बेटी ने जन्म लिया। उसका नाम अन्वी रखा गया।
अन्वी के आने से उनका छोटा-सा परिवार हँसी और खुशियों से भर गया। मीरा अब अपने परिवार के साथ मुस्कुराना सीख चुकी थी।
लेकिन दिल के किसी शांत कोने में रोहित की याद अब भी कहीं ज़िंदा थी।
वह याद अब प्रेम से ज़्यादा एक अधूरे प्रश्न की तरह थी।
“क्या रोहित ने कभी मुझे याद किया होगा?”
“क्या उसने कभी कोई ख़त लिखा होगा?”
“या उसने मुझे हमेशा के लिए भुला दिया?”
इन सवालों के जवाब शायद समय के पास थे... और शायद उसी पुराने, धूल से ढके हुए ख़त के पास भी। उधर रोहित ने भी समय के साथ अपने परिवार की इच्छा से शादी कर ली।
उसने अपनी नई ज़िंदगी शुरू करने की पूरी कोशिश की, लेकिन दिल के किसी कोने में मीरा के लिए एक शिकायत हमेशा ज़िंदा रही।
वह अक्सर मन ही मन कहता,
“मीरा... तुमने मेरा इंतज़ार करने का वादा किया था। फिर मेरा साथ क्यों छोड़ दिया?”
वर्षों तक वह यही समझता रहा कि मीरा ने उसे भुला दिया और अपने वादे तोड़ दिए।
एक दिन दफ़्तर से लौटते समय उसकी मुलाक़ात अचानक रोशनी से हुई।
रोशनी, मीरा की बचपन की सबसे अच्छी दोस्त थी।
रोशनी ने अपने बैग से कुछ पुराने, पीले पड़ चुके लिफ़ाफ़े निकाले और रोहित की ओर बढ़ाते हुए कहा,
“ये मीरा ने तुम्हारे लिए लिखे थे... लेकिन कभी भेज नहीं पाई।”
रोहित हैरान रह गया।
काँपते हाथों से उसने वे ख़त लिए और बिना कुछ कहे घर लौट आया।
उस रात उसने पहला ख़त खोला।
हर ख़त में सिर्फ़ शब्द नहीं थे... इंतज़ार था, आँसू थे, टूटे हुए वादों का दर्द था।
एक ख़त में मीरा ने लिखा था—
“रोहित, अगर तुम्हारा एक भी ख़त आ जाए, तो शायद मैं सबका सामना कर लूँ। लेकिन तुम्हारी ख़ामोशी मुझे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ रही है...”
वह एक-एक ख़त पढ़ता गया, और हर ख़त के साथ उसकी वर्षों पुरानी शिकायतें बिखरती चली गईं।
आज पहली बार उसे एहसास हुआ कि वादा सिर्फ़ उसने नहीं खोया था... हालात ने दोनों को एक-दूसरे से छीन लिया था। समय किसी का इंतज़ार नहीं करता।
देखते ही देखते सोलह वर्ष बीत गए।
अन्वी अब सोलह साल की हो चुकी थी। वह बिल्कुल अपनी माँ मीरा की तरह शांत, समझदार और संवेदनशील थी।
लेकिन इन सोलह वर्षों में समय ने मीरा की ज़िंदगी से एक और परीक्षा ले ली।
कुछ वर्षों से वह एक गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। इलाज चलता रहा, परिवार ने हर संभव कोशिश की, लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।
एक सुबह मीरा हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह गई।
उसके जाने के बाद घर में सब कुछ था... लेकिन घर की मुस्कान कहीं खो गई थी।
रमेश ने खुद को संभाला, सिर्फ़ इसलिए कि अन्वी को माँ और पिता दोनों का प्यार मिल सके।
मेरी मीरा,
मुझे नहीं पता कि तुम्हें यह ख़त कभी मिलेगा भी या नहीं, लेकिन आज इतने वर्षों बाद पहली बार अपने दिल का बोझ हल्का करने की हिम्मत जुटा पाया हूँ।
मुझे माफ़ कर देना।
मैंने सिर्फ़ अपने वादे ही नहीं तोड़े... मैंने तुम्हें भी ग़लत समझ लिया।
मैं यही सोचता रहा कि तुमने मेरा इंतज़ार नहीं किया, तुमने मुझे भुला दिया। लेकिन जब तुम्हारे लिखे वे ख़त पढ़े, तब समझ आया कि ख़ामोश सिर्फ़ मैं था... बेवफ़ा तुम कभी नहीं थीं।
हर ख़त के साथ मेरी नज़रें शर्म से झुकती चली गईं। आज मैं खुद की नज़रों में ही दोषी हूँ।
कितनी बार तुम्हारे शहर आया... लेकिन तुमसे मिलने और माफ़ी माँगने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाया।
शायद डर था कि तुम्हारी आँखों में अपने लिए शिकायत देखूँगा... या शायद मैं खुद का सामना नहीं कर पा रहा था।
मीरा... अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।
इस ख़त को लिखते हुए मेरे हाथ न जाने कितनी बार काँपे हैं, लेकिन दिल में जो पछतावा है, उसे शब्दों में लिख पाना आज भी आसान नहीं है।
अगर कभी ज़िंदगी मुझे तुमसे मिलाए, तो मैं सिर्फ़ एक बात कहना चाहूँगा—
“मैंने तुमसे प्यार किया था... और शायद पूरी ज़िंदगी करता रहूँगा। लेकिन सबसे बड़ा अफ़सोस यही रहेगा कि मैंने तुम पर भरोसा करने में बहुत देर कर दी।”
रवि ने आख़िरी पंक्ति पढ़ी और ख़त को धीरे से बंद कर दिया।
कुछ पल तक वह बिल्कुल ख़ामोश बैठा रहा। उसकी आँखें नम थीं।
अब उसे समझ आ गया था कि मीरा का इंतज़ार कभी एकतरफ़ा नहीं था।
दोनों एक-दूसरे का इंतज़ार करते रहे, लेकिन हालात और ख़ामोशियों ने उन्हें कभी मिल ही नहीं होने दिया।
रवि के मन में मीरा के लिए गहरा सम्मान था। उसने बिना शिकायत किए अपनी ज़िंदगी को स्वीकार कर लिया था।
वहीं रोहित के लिए भी उसके मन में दया जाग उठी।
“उसने बहुत देर से सही... लेकिन अपनी गलती मान ली,” रवि ने मन ही मन सोचा।
उसने खिड़की से बाहर देखते हुए धीरे से कहा,
“कभी-कभी ज़िंदगी में सबसे बड़ी सज़ा अदालत नहीं देती... पछतावा देता है। और रोहित शायद सालों से वही सज़ा काट रहा है।”
रेलवे टिकट के बचे हुए हिस्से को रवि ने कई बार ध्यान से देखा। उस पर धुंधले अक्षरों में बस इतना पढ़ा जा सकता था—
“...नारस”
रवि ने अंदाज़ा लगाया कि शायद यह वाराणसी (बनारस) का टिकट है।
यही एक उम्मीद थी।
अगले ही दिन वह बनारस के लिए निकल पड़ा।
कई दिनों तक उसने पुराने डाकघरों, मोहल्लों और गाँवों में लोगों से पूछताछ की। कई बार उसे लगा कि शायद उसकी मेहनत बेकार जाएगी, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
आख़िरकार रवि की नज़र उस पुरानी तस्वीर पर पड़ी। समय की मार ने रोहित का चेहरा लगभग धुंधला कर दिया था। काले-सफ़ेद रंग की वह तस्वीर मानो अपनी पहचान खो चुकी थी। लेकिन मीरा का चेहरा अब भी हल्का-सा साफ़ दिखाई दे रहा था। शायद वही धुंधली-सी तस्वीर उस ख़त को उसकी असली मंज़िल तक पहुँचाने की आख़िरी उम्मीद थी।
रवि ने वह पुरानी तस्वीर निकाली और पास बैठी एक बुज़ुर्ग महिला को दिखाते हुए पूछा, “माँ जी, क्या आप इस लड़की को पहचानती हैं?”
बुज़ुर्ग महिला ने तस्वीर को ध्यान से देखा। कुछ पल तक वह ख़ामोश रहीं। फिर उनकी आँखें तस्वीर पर ठहर गईं।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “अरे... यह तो मीरा है।”
“क्या तुम मीरा की बात कर रहे हो...?”
रवि की आँखों में उम्मीद लौट आई।
उस बुज़ुर्ग के बताए रास्ते पर चलते हुए वह आख़िरकार मीरा के घर पहुँच गया।
उसके हाथ में वही पुराना लिफ़ाफ़ा था।
आज, वर्षों बाद, वह एक अधूरी कहानी को उसकी मंज़िल तक पहुँचाने वाला था।
उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।
रवि ने दरवाज़े की घंटी बजाई।
कुछ ही पल बाद दरवाज़ा खुला।
सामने लगभग सोलह-सत्रह साल की एक लड़की खड़ी थी।
“जी, किससे मिलना है?” उसने विनम्रता से पूछा।
रवि कुछ क्षण तक उसे देखता रहा। न जाने क्यों, उस लड़की के चेहरे में उसे मीरा की झलक दिखाई दी।
उसने मुस्कुराकर कहा,
“मुझे मीरा जी से मिलना है।”
लड़की की मुस्कान अचानक फीकी पड़ गई।
उसने धीमी आवाज़ में कहा,
“आप शायद बहुत देर से आए हैं... माँ को गुज़रे हुए दस साल हो चुके हैं।”
यह सुनते ही रवि के हाथ में पकड़ा हुआ पुराना लिफ़ाफ़ा काँपने लगा।
उसे ऐसा लगा जैसे समय एक पल के लिए थम गया हो।
उसकी आँखें अनायास उस ख़त पर टिक गईं।
“तो... यह ख़त अपनी मंज़िल तक पहुँचने में दस साल देर कर चुका है...” उसने मन ही मन कहा।
कुछ क्षणों की ख़ामोशी के बाद उसने धीमे से पूछा,
“आप... मीरा जी की कौन हैं?”
युवती ने शांत स्वर में जवाब दिया, “मैं... मीरा की बेटी, अन्वी हूँ।”
रवि ने कुछ पल तक अन्वी को देखा। उसे लगा जैसे मीरा उसके सामने खड़ी हो।
उसने काँपते हाथों से वह पुराना लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा,
“यह ख़त... तुम्हारी माँ के नाम है। इसे अपनी आख़िरी अमानत समझकर संभाल लेना।”
अन्वी ने हैरानी से वह लिफ़ाफ़ा अपने हाथों में ले लिया।
“लेकिन... इसे किसने लिखा है?” उसने पूछा।
रवि ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,
“शायद... यह जवाब तुम्हें इसी ख़त में मिल जाएगा।”
इतना कहकर रवि मुड़ा और भारी मन से वहाँ से चल पड़ा।
उसके कदम आगे बढ़ रहे थे, लेकिन मन बार-बार पीछे मुड़कर उसी घर को देख रहा था।
उसे ऐसा लग रहा था कि आज उसने सिर्फ़ एक ख़त नहीं पहुँचाया... बल्कि वर्षों से अधूरी पड़ी एक कहानी को उसकी मंज़िल तक पहुँचा दिया।
अन्वी ने काँपते हाथों से वह ख़त खोला।
जैसे-जैसे वह हर पंक्ति पढ़ती गई, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
आज पहली बार उसे अपनी माँ के उस अतीत के बारे में पता चला, जिसके बारे में मीरा ने कभी किसी से कुछ नहीं कहा था।
उसने आख़िरी पंक्ति पढ़ी—
“मुझे माफ़ कर देना, मेरी मीरा...”
अन्वी ने धीरे से ख़त को सीने से लगा लिया।
कुछ देर तक वह बिल्कुल ख़ामोश बैठी रही।
फिर उसने अपनी माँ की पुरानी अलमारी खोली, जहाँ उनकी डायरी, चूड़ियाँ और कुछ पुरानी तस्वीरें रखी थीं।
उसने उस ख़त को बड़े सम्मान से वहीं रख दिया, मानो वह सिर्फ़ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि दो अधूरी ज़िंदगियों की आख़िरी निशानी हो।
अलमारी बंद करते हुए अन्वी की आँखों से एक आँसू गिरा और उसने धीमे से कहा,
“कुछ ख़त देर से नहीं पहुँचते... वे बस अपनी मंज़िल तक पहुँचने में पूरी ज़िंदगी लगा देते हैं।”
रवि भारी मन से वापस डाकघर पहुँचा।
अजय मेहता उसकी आँखें देखकर ही समझ गए कि सफ़र आसान नहीं रहा होगा।
उन्होंने धीरे से पूछा,
“मिल गई... मीरा?”
रवि कुछ पल चुप रहा। फिर धीमी आवाज़ में बोला,
“जी... लेकिन दस साल देर से।”
मेहता जी की आँखें भी नम हो गईं।
रवि ने गहरी साँस ली और कहा,
“मेहता जी... कभी-कभी कुछ ख़त अपनी मंज़िल तक पहुँच तो जाते हैं... लेकिन वक़्त उनसे पहले ही वहाँ से गुज़र चुका होता है।”
दोनों कुछ देर तक बिना कुछ बोले उस पुराने लिफ़ाफ़े को देखते रहे।
डाकघर की दीवार पर लगी घड़ी चलती रही...
लेकिन उस दिन दोनों ने समझ लिया कि हर ख़त की मंज़िल सिर्फ़ एक पता नहीं होती, कभी-कभी वह किसी की अधूरी कहानी भी होती है।
Join the Discussion