अनकही मोहब्बत

DramaContemporaryRomance
Jul 29, 2026
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यह कहानी 28 वर्ष की रूहानी की है।

रूहानी एक छोटे-से शहर की साधारण-सी लड़की थी, जिसके सपने आसमान छूने वाले नहीं थे। उसके ख़्वाब छोटे थे, लेकिन उनके पीछे उसकी पूरी दुनिया बसती थी। वह बस इतना चाहती थी कि अपनी मेहनत से उन छोटे-छोटे सपनों को एक-एक करके पूरा कर सके।

रूहानी एक ऐसे परिवार से थी, जहाँ रूढ़िवादी सोच साफ़ झलकती थी। वहाँ बेटियों को सपने देखने की इजाज़त तो थी, लेकिन सिर्फ़ उतने ही, जितने परिवार तय करे। अपनी पसंद की पढ़ाई या छोटे-मोटे सपने चुनने की थोड़ी-बहुत आज़ादी थी, मगर अपने हमसफ़र को चुनने का अधिकार नहीं।

उसे बचपन से यह सिखाया गया था कि एक दिन उसके जीवन का सबसे बड़ा फ़ैसला कोई और करेगा, और उसे बिना सवाल किए उसे स्वीकार करना होगा।

रूहानी ने बहुत पहले ही अपने मन को समझा दिया था कि वह कभी मोहब्बत नहीं करेगी। क्योंकि वह जानती थी कि कुछ ख़्वाब सिर्फ़ देखे जा सकते हैं, पूरे नहीं किए जा सकते।

उसे मालूम था कि उसके हिस्से में अपने हमसफ़र को चुनने की आज़ादी नहीं लिखी गई थी। इसलिए उसने अपने दिल के दरवाज़े किसी के लिए कभी खोले ही नहीं।

लेकिन कहते हैं ना...

“जिससे इंसान सबसे ज़्यादा दूर भागता है, तक़दीर उसे उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है।”

रूहानी के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला था। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि जिस मोहब्बत से वह पूरी ज़िंदगी बचती रही, वह एक दिन उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हक़ीक़त बन जाएगी।

उधर रुद्र ने भी आज ही कानपुर छोड़कर लखनऊ में कदम रखा था। वह अपने साथ कुछ सपने, ढेर सारी उम्मीदें और एक नई शुरुआत की चाह लेकर आया था।

गोरा रंग, चेहरे पर सादगी भरी मुस्कान और आँखों में अपने भविष्य को लेकर अनगिनत सपने... पहली नज़र में रुद्र बिल्कुल एक साधारण लड़का लगता था, लेकिन उसके इरादे बिल्कुल साधारण नहीं थे।

लखनऊ पहुँचते ही उसने सबसे पहले रहने के लिए एक छोटा-सा किराए का कमरा लिया। कमरा बड़ा नहीं था, लेकिन उसके लिए वह चार दीवारें उसके सपनों की पहली मंज़िल थीं।

उसे विश्वास था कि एक दिन यह शहर उसकी मेहनत का गवाह बनेगा।

रुद्र ने रहने के लिए रूहानी के घर के ठीक सामने रहने वाले गुप्ता जी के मकान की सबसे ऊपर मंज़िल पर एक छोटा-सा कमरा किराए पर लिया।

उधर रूहानी की ज़िंदगी हमेशा की तरह अपनी रफ़्तार से चल रही थी। हर दिन एक जैसा था—घर, ज़िम्मेदारियाँ और अपने छोटे-छोटे सपने। उसने कभी सामने रहने आए नए किरायेदार पर ध्यान देने की ज़रूरत ही महसूस नहीं की।

वैसे भी, रूहानी ने अपनी ज़िंदगी में कुछ चीज़ों से हमेशा एक दूरी बनाकर रखी थी। नए रिश्ते, नई उम्मीदें और सबसे बढ़कर... मोहब्बत। उसे लगता था कि जिन राहों पर मंज़िल ही न हो, उन पर चलने का कोई मतलब नहीं।

एक दिन संध्या के समय रूहानी रोज़ की तरह अपनी छत पर टहल रही थी। मौसम में हल्की-हल्की ठंडक घुल चुकी थी और डूबते सूरज की सुनहरी किरणें पूरे आसमान को रंग रही थीं।

टहलते-टहलते उसकी नज़र अनायास ही सामने वाली छत पर चल गई। वहाँ रुद्र अपने फ़ोन पर किसी से बात कर रहा था। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी, जैसे बात करने वाला कोई अपना हो।

रूहानी की नज़र कुछ पल के लिए उस पर ठहर गई। उसने तुरंत अपनी नज़रें हटा लेनी चाहीं, लेकिन जाने क्यों वह दोबारा उसकी ओर देखने लगी।

शायद यह सिर्फ़ एक संयोग था... या फिर वह शुरुआत, जिससे वह हमेशा दूर भागती आई थी।

उधर रुद्र ने भी महसूस कर लिया था कि सामने वाली छत पर खड़ी लड़की की नज़रें कुछ पल के लिए उस पर ठहर गई थीं।

रूहानी अपनी छोटी बहन नेहा से बातों में मशगूल थी।

“लगता है गुप्ता जी ने ऊपर वाला कमरा किराए पर दे दिया है,” उसने सामने देखते हुए कहा।

“हाँ, शायद आज ही कोई नया लड़का आया है,” नेहा ने भी उत्सुकता से जवाब दिया।

बात करते-करते न जाने कब रूहानी की नज़र रुद्र से जा मिली। कुछ पल के लिए दोनों की आँखें एक-दूसरे से टकराईं। रूहानी जैसे वहीं ठिठक गई। उसे एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब बिना पलक झपकाए रुद्र को देखने लगी।

रुद्र के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। जैसे ही रूहानी को एहसास हुआ कि रुद्र भी उसे देख रहा है, उसने झेंपकर तुरंत अपनी नज़रें फेर लीं और बिना कुछ कहे सीढ़ियों की ओर बढ़ गई।

शायद यह उनकी पहली मुलाक़ात नहीं थी... लेकिन पहली बार दोनों ने एक-दूसरे को सच में देखा था।

उस पहली नज़र के बाद रूहानी ने उस पल को ज़्यादा महत्व नहीं दिया। उसने उसे बस एक संयोग समझकर भुला दिया। वह पहले की तरह अपने घर, अपनी ज़िम्मेदारियों और अपनी छोटी-सी दुनिया में ही व्यस्त रहने लगी।

उस दिन के बाद उसने कभी जानबूझकर रुद्र की तरफ़ नहीं देखा। मानो उसने अपने मन को पहले ही समझा दिया हो कि कुछ दूरियाँ बनाए रखना ही बेहतर होता है।

एक शाम अचानक मौसम ने करवट ली। तेज़ हवा के साथ बारिश की पहली बूँदें गिरने लगीं। छत पर सूख रहे कपड़े अभी भी तार पर ही थे।

“रूहानी, जल्द से छत पर जाकर कपड़े ले आओ, बारिश तेज़ हो जाएगी,” उसकी माँ ने आवाज़ लगाई।

“जी माँ,” कहकर रूहानी तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ गई।

वह एक-एक करके कपड़े उतार ही रही थी कि अचानक उसकी नज़र सामने वाली छत पर चल गई। रुद्र वहीं खड़ा था। जैसे ही उसकी नज़र रूहानी पर पड़ी, उसने मुस्कुराते हुए हाथ हिलाकर ‘हैलो’ कहा।

रूहानी कुछ पल के लिए ठिठकी, लेकिन अगले ही क्षण उसने बिना कोई जवाब दिए अपनी नज़रें फेर लीं। उसने चुपचाप सारे कपड़े समेटे और बिना पीछे देखे नीचे चली गई।

रुद्र कुछ पल तक उसे जाता हुआ देखता रहा। उसे समझ नहीं आया कि सामने वाली लड़की इतनी खामोश थी... या फिर जानबूझकर उससे दूरी बना रही थी।

धीरे-धीरे समय बीतता गया।

रुद्र को खुद भी एहसास नहीं हुआ कि कब सामने वाले घर की वह खामोश लड़की उसकी आदत बनने लगी। अब जब भी वह सुबह नौकरी पर निकलता, एक बार रूहानी के घर की तरफ़ ज़रूर देखता। और शाम को लौटते समय भी उसकी नज़र अनायास उसी घर की ओर उठ जाती।

कभी वह छत पर कपड़े सुखाने या उतारने के बहाने उसे देखने की कोशिश करता, तो कभी अपनी बाइक पर बैठकर कुछ देर यूँ ही सामने वाले घर की ओर देखता रहता।

रूहानी भी अब यह बात समझने लगी थी। उसे महसूस होने लगा था कि रुद्र की निगाहें अक्सर उसी को ढूँढ़ती हैं।

लेकिन उसने हमेशा की तरह अनजान बने रहना ही बेहतर समझा। उसने न कभी मुस्कुराकर जवाब दिया, न ही कभी उसकी तरफ़ देखने की कोशिश की।

शायद रूहानी अपने दिल को किसी भी उम्मीद से दूर रखना चाहती थी... और रुद्र, बिना कुछ कहे, हर दिन उसी खामोशी में अपना इज़हार ढूँढ़ रहा था। समय के साथ शायद रूहानी के दिल के बंद दरवाज़ों पर भी किसी ने धीरे-धीरे दस्तक देनी शुरू कर दी थी।

रुद्र तो पहले से ही उसे देखा करता था, लेकिन अब रूहानी भी खुद को उससे पूरी तरह अनजान नहीं रख पा रही थी। फ़र्क़ बस इतना था कि उसकी नज़रें कभी खुलकर नहीं उठती थीं।

उसे रुद्र के नौकरी पर जाने का समय भी पता था और लौटने का भी।

रुद्र के आने का वक़्त होते ही रूहानी चुपचाप अपने कमरे की खिड़की का पर्दा थोड़ा-सा सरका देती। फिर उसी छोटी-सी जगह से चोरी-चोरी उसे देखती रहती।

जैसे ही रुद्र की नज़र उसकी खिड़की की तरफ़ उठती, वह झट से पर्दा छोड़ देती और ऐसे दिखाती, मानो वह वहाँ थी ही नहीं।

उसे खुद पर हैरानी होने लगी थी।

जिस मोहब्बत से वह पूरी ज़िंदगी दूर भागती रही... आज उसी की आहट पर उसका दिल खामोशी से मुस्कुराने लगा था।

यह सिलसिला अब लगभग हर रोज़ का हो गया था।

जिस दिन रुद्र की बाइक सामने दिखाई नहीं देती, उस दिन रूहानी जाने क्यों बेचैन हो उठती। वह बार-बार खिड़की का पर्दा सरकाकर बाहर झाँकती और मन ही मन सोचती—

“शायद आज उसे आने में देर हो गई होगी...”

वह कुछ देर और इंतज़ार करती।

लेकिन जब काफ़ी समय बीत जाने के बाद भी रुद्र दिखाई नहीं देता, तो उसके चेहरे पर अनजानी-सी मायूसी उतर आती।

उसे समझ ही नहीं आता था कि यह बेचैनी किस बात की है। वह खुद से बार-बार कहती कि इससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए...

लेकिन उसका दिल हर बार उसकी बात मानने से इंकार कर देता।

शायद बिना कुछ कहे ही... इंतज़ार ने अपने होने का एहसास दिलाना शुरू कर दिया था।

देखते ही देखते यह सिलसिला पूरे एक साल तक चलता रहा।

एक साल... जिसमें न कभी दोनों ने एक-दूसरे से बात की, न अपने दिल की बात ज़ुबान पर आने दी। बस नज़रें थीं, खामोशियाँ थीं और एक अनकहा-सा रिश्ता, जो हर गुज़रते दिन के साथ गहरा होता जा रहा था।

रूहानी आज भी अपने दिल से यह कहती थी कि यह सिर्फ़ एक आदत है, मोहब्बत नहीं।

क्योंकि वह जानती थी, अगर उसने अपने दिल की बात मान ली, तो उसे ऐसे ख़्वाब देखने की इजाज़त मिल जाएगी जो शायद कभी पूरे नहीं हो सकते।

इसलिए उसने अपने एहसासों को नाम देने की हिम्मत कभी नहीं की।

लेकिन सच तो यह था...

मोहब्बत कब दिल में जगह बना चुकी थी, यह बात रूहानी से ज़्यादा शायद उसकी खामोशियाँ जानती थीं।

एक दिन रूहानी ने मन ही मन ठान लिया कि अब वह अपने दिल की बात स्वीकार कर लेगी। कम से कम खुद से तो यह सच नहीं छिपाएगी कि उसके दिल में रुद्र के लिए मोहब्बत जन्म ले चुकी है।

लेकिन सच की तस्वीर उससे कभी दूर नहीं थी।

रूहानी ने जैसे ही सुना कि घरवाले उसके लिए रिश्ता ढूँढ़ रहे हैं, वह फिर से खामोश हो गई।

रूहानी ने बस मन ही मन कहा—

“काश... तुम मेरी ही जाति के होते।”

इतना कहकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। कुछ ख़्वाहिशें दिल में ही दफ़्न हो जाती हैं, क्योंकि उन्हें पूरा करने से पहले ही समाज उनके रास्ते में खड़ा हो जाता है।

वह अपने परिवार को अच्छी तरह जानती थी। उसे पता था कि उसके घर में बेटियों को सपने देखने की इजाज़त तो थी, मगर अपने हमसफ़र को चुनने की नहीं।

यह सोच हर बार उसके कदम रोक देती।

उसका दिल हर रोज़ रुद्र के लिए धड़कता था, और हर रोज़ वह दिल अपनी ही खामोशियों के बोझ तले टूट जाता था।

वह चाहकर भी अपने एहसासों को आवाज़ नहीं दे पा रही थी।

शायद कुछ मोहब्बतें इज़हार नहीं माँगतीं... वे बस चुपचाप दिल में रहकर इंसान को उम्रभर बदल देती हैं।

देखते ही देखते एक दिन रुद्र की नौकरी का तबादला दूसरे शहर हो गया।

जिस छत पर कभी उसकी मौजूदगी रूहानी के दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा हुआ करती थी, आज वह छत खाली थी।

रुद्र चला गया...

और उसके साथ रूहानी की रोज़ की वह छोटी-सी दुनिया भी चली गई, जिसका एहसास उसे कभी देर से हुआ था।

उस दिन पहली बार रूहानी का दिल बुरी तरह तड़पा। उसकी आँखों से बहते आँसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह रुद्र से अनकही मोहब्बत कर बैठी थी।

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

रुद्र बिना कुछ कहे चला गया, और रूहानी बिना कुछ कहे उसे खो बैठी।

एक अपने दिल की बात सुनने का इंतज़ार करता रहा...

और दूसरी अपने दिल की बात कहने का साहस जुटाती रही।

दोनों ने मोहब्बत की...

मगर दोनों की मोहब्बत अनकही ही रह गई।

रूहानी...

अपने दिल की बात कहने का साहस जुटाती रह गई।

रुद्र...

उस एक इज़हार का उम्रभर इंतज़ार करता रह गया।

अनकही मोहब्बत...

दो दिलों की वह कहानी, जिसमें मोहब्बत थी... मगर इज़हार कभी नहीं हुआ।

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Neetu its
19 hours ago

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