बनारस की शापित हवेली

अध्याय 1 - रहस्यमयी पार्सल
दिल्ली...
जुलाई की एक बरसाती शाम।
बारिश की बूँदें खिड़की के शीशों से टकराकर मधुर आवाज़ पैदा कर रही थीं। कमरे में फैली किताबों और पुराने नक्शों के बीच बैठी नैना त्रिपाठी अपने लैपटॉप पर अगली किताब का आख़िरी अध्याय पूरा कर रही थी।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
"इस समय कौन हो सकता है?" उसने घड़ी की ओर देखा। रात के साढ़े नौ बज चुके थे।
दरवाज़ा खोलते ही उसे कोई दिखाई नहीं दिया। लेकिन चौखट पर एक पुराना भूरा पार्सल रखा था।
उस पर सिर्फ़ एक नाम लिखा था—
"नैना त्रिपाठी"
न भेजने वाले का नाम...
न कोई पता...
न मोबाइल नंबर...
नैना ने पार्सल उठाया। वह उम्मीद से कहीं ज़्यादा भारी था। कमरे में आकर उसने सावधानी से उसे खोला।
अंदर लाल रंग के पुराने कपड़े में लिपटी एक पीतल की चाबी, एक पुरानी डायरी का फटा हुआ पन्ना और एक छोटा-सा पत्र रखा था।
उसने काँपते हाथों से पत्र खोला।
उसमें केवल एक पंक्ति लिखी थी—
"अगर सच जानना है... तो बनारस आओ। रुद्र हवेली तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।"
पत्र के नीचे कोई नाम नहीं था।
बस लाल रंग से बना एक अजीब-सा निशान...
ऐसा निशान, जिसे देखते ही नैना के सिर में अचानक तेज़ दर्द उठने लगा।
उसकी आँखों के सामने एक पल के लिए अजीब दृश्य चमका...
गंगा का शांत किनारा...
सैकड़ों दीपक पानी की लहरों पर तैर रहे थे। मंदिरों की घंटियाँ दूर तक गूँज रही थीं, लेकिन उस मधुर ध्वनि के बीच किसी स्त्री के रोने की हल्की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
धुएँ और धुंध के बीच सफ़ेद साड़ी पहने एक युवती धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी। उसके लंबे बाल हवा में बिखरे हुए थे और उसकी आँखों में एक अजीब-सी उदासी थी।
वह मुस्कुराई... फिर काँपती आवाज़ में बोली—
"तुमने लौटने में बहुत देर कर दी... नैना।"
इससे पहले कि नैना कुछ समझ पाती, युवती ने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ बस छूने ही वाली थीं कि अचानक चारों ओर तेज़ घंटियाँ बजने लगीं।
"नहीं...!"
नैना की चीख के साथ वह दृश्य पलभर में गायब हो गया।
वह हाँफते हुए कुर्सी से उठ बैठी। उसके माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, जबकि कमरे में ए.सी. चल रहा था।
"ये... मैंने क्या देखा?"
उसने काँपती आवाज़ में खुद से पूछा।
उसने गहरी साँस ली और खुद को समझाने की कोशिश की कि यह सिर्फ़ थकान की वजह से हुआ भ्रम होगा।
लेकिन तभी उसकी नज़र मेज़ पर रखी उस पीतल की चाबी पर पड़ी।
चाबी पर उकेरा हुआ वही रहस्यमय निशान हल्की-सी सुनहरी चमक बिखेर रहा था...
और उसी पल कमरे में किसी के धीमे कदमों की आहट सुनाई दी।
नैना ने काँपते हाथों से कमरे की सारी लाइटें जला दीं। चमकदार रोशनी फैलते ही उसे थोड़ा सुकून मिला, लेकिन उसके भीतर उठ रहा डर कम नहीं हुआ।
उसने खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर देखा।
बारिश पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ हो चुकी थी। सड़क पर दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। तभी उसकी नज़र सामने वाली इमारत की छत पर पड़ी।
एक आदमी...
काले लंबे कोट में खड़ा...
उसकी तरफ़ देख रहा था।
बारिश की तेज़ बूँदें उसके ऊपर गिर रही थीं, लेकिन वह बिना हिले-डुले उसी जगह खड़ा था।
नैना का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
उसने दोबारा ध्यान से देखा।
अगले ही पल बिजली चमकी...
और वह आदमी गायब हो चुका था।
"शायद... मेरा वहम है।" उसने खुद को समझाने की कोशिश की।
लेकिन तभी मोबाइल की घंटी बज उठी।
स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था।
सिर्फ़ लिखा था...
Unknown Caller
कुछ पल सोचने के बाद उसने कॉल रिसीव कर ली।
दूसरी तरफ़ कुछ सेकंड तक गहरा सन्नाटा रहा।
फिर किसी भारी आवाज़ में सिर्फ़ एक वाक्य सुनाई दिया—
"चाबी संभालकर रखना... वही तुम्हें रुद्र हवेली तक ले जाएगी।"
"आप कौन हैं?" नैना लगभग चिल्ला पड़ी।
लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया।
कॉल अपने-आप कट गई।
उसने तुरंत दोबारा कॉल मिलाने की कोशिश की लेकिन स्क्रीन पर लिखा आया...
"Number Does Not Exist."
नैना के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया।
उसने घबराकर फिर उस पीतल की चाबी को उठाया।
इस बार उसे साफ़ महसूस हुआ...
चाबी पहले से गर्म थी।
इतनी गर्म... जैसे किसी ने अभी-अभी उसे आग से निकाला हो।
उसने झटके से चाबी मेज़ पर रख दी।
उसी क्षण कमरे की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
और उसी अंधेरे में...
किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में उसका नाम पुकारा...
"नैना..."
अंधेरे में उसकी साँसें तेज़ हो गईं। ऐसा लग रहा था मानो कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा हो।
"क... कौन है?" नैना की आवाज़ काँप रही थी।
कोई जवाब नहीं आया।
अचानक खिड़की अपने आप ज़ोर से खुल गई। ठंडी हवा का तेज़ झोंका पूरे कमरे में फैल गया। मेज़ पर रखे कागज़ उड़कर फ़र्श पर बिखर गए।
नैना ने काँपते हाथों से मोबाइल की टॉर्च जलाई।
टॉर्च की हल्की रोशनी पूरे कमरे में घूमी... लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
उसी समय उसकी नज़र दीवार पर लगे आईने पर पड़ी।
आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया...
लेकिन उसके ठीक पीछे एक सफ़ेद साड़ी पहने लड़की खड़ी थी।
नैना डर के मारे पलटी...
पीछे कोई नहीं था।
उसने दोबारा आईने की ओर देखा...
इस बार आईना बिल्कुल खाली था।
उसके हाथ-पैर सुन्न पड़ चुके थे।
अचानक कमरे की लाइटें फिर से जल उठीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
लेकिन अब मेज़ पर रखा वह पत्र पहले जैसा नहीं था।
उसके नीचे एक नई पंक्ति उभर आई थी—
"पूर्णिमा में केवल चार रातें बाकी हैं..."
और उसके ठीक नीचे...
"रुद्र हवेली का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद होने से पहले बनारस पहुँच जाओ।"
नैना कुछ पल तक उस पंक्ति को देखती रह गई।
उसने धीरे से पीतल की चाबी उठाई, अपना बैग खोला और उसमें रख दी।
फिर उसने लैपटॉप खोला और वाराणसी की पहली फ़्लाइट खोजनी शुरू कर दी।
मन ही मन फ़ैसला कर लिया था।
चाहे जो भी सच सामने आए... वह बनारस ज़रूर जाएगी।
लेकिन उसे यह नहीं पता था...
कि उसी समय, उससे लगभग आठ सौ किलोमीटर दूर, बनारस की एक वीरान हवेली की सबसे ऊपरी मंज़िल पर खड़ा एक रहस्यमयी युवक गंगा की ओर देख रहा था।
उसकी आँखें वर्षों के इंतज़ार से भरी थीं।
उसने आसमान की ओर देखा और धीमे से मुस्कुराया।
"आख़िर... तुम लौट ही आई, नैना।"
उसके शब्द ख़त्म होते ही हवेली का विशाल लकड़ी का दरवाज़ा अपने आप चरमराने लगा...
मानो 150 साल पुराना श्राप फिर से जाग उठा हो।
उधर बनारस में... रुद्र हवेली के दरवाज़े खुल चुके थे, और कोई 150 साल बाद अपने अधूरे वादे के पूरे होने का इंतज़ार कर रहा था...
अध्याय 2 - रुद्र हवेली का रहस्य
सुबह के पाँच बजे...
"अगला स्टेशन... वाराणसी जंक्शन।"
ट्रेन में हुई घोषणा सुनते ही नैना ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। पूरी रात की यात्रा के बाद आखिरकार वह उस शहर में पहुँचने वाली थी, जिसने पिछले कुछ दिनों से उसके मन की शांति छीन रखी थी।
उसने खिड़की से बाहर देखा। उगते सूरज की हल्की सुनहरी किरणें प्लेटफ़ॉर्म पर बिखर रही थीं। यात्रियों की भीड़, कुल्हड़ वाली चाय की खुशबू और दूर से सुनाई देता "हर हर महादेव" का जयघोष... यह बनारस था।
उसने अपना बैग कंधे पर टाँगा और प्लेटफ़ॉर्म पर कदम रखा।
पता नहीं क्यों...
जैसे ही उसके पैर बनारस की धरती पर पड़े, उसके दिल की धड़कन अचानक तेज़ हो गई।
ऐसा लगा...
मानो यह शहर उसे पहचानता हो।
"मैडम... ऑटो चाहिए?"
एक ऑटो चालक उसकी ओर बढ़ा।
"दशाश्वमेध घाट चलोगे?" नैना ने पूछा।
ऑटो चालक कुछ पल के लिए चुप हो गया।
"घाट तो ले चलूँगा... लेकिन वहाँ से आगे मत जाइएगा।"
"क्यों?"
उसने शीशे में नैना की तरफ़ देखा।
"कभी-कभी कुछ जगहें इंसान को बुलाती नहीं... खींच लेती हैं।"
नैना हल्का-सा मुस्कुराई।
"मैं पत्रकार हूँ... भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं करती।"
ऑटो चालक ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस ऑटो आगे बढ़ा दिया।
कुछ ही देर में ऑटो बनारस की संकरी गलियों में पहुँच चुका था। दोनों ओर सदियों पुराने मकान, फूलों की दुकानें, अगरबत्ती की महक और मंदिरों की घंटियाँ पूरे माहौल को अलौकिक बना रही थीं।
नैना खिड़की से बाहर देख रही थी। पता नहीं क्यों, इस शहर का हर मोड़ उसे अजीब-सा परिचित लग रहा था, जैसे वह पहले भी यहाँ आ चुकी हो।
तभी ऑटो दशाश्वमेध घाट के पास रुका।
गंगा के किनारे सुबह की पहली आरती की तैयारी चल रही थी। ठंडी हवा के साथ गंगा की लहरें घाट की सीढ़ियों से टकरा रही थीं।
नैना जैसे ही ऑटो से उतरी, उसे अचानक महसूस हुआ कि कोई दूर खड़ा लगातार उसे देख रहा है...
उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा...
लेकिन वहाँ भीड़ के अलावा कोई नहीं था।
नैना ने एक बार फिर चारों ओर नज़र दौड़ाई।
सामने गंगा का शांत जल बह रहा था। घाट की सीढ़ियों पर कुछ श्रद्धालु स्नान कर रहे थे, जबकि कई लोग हाथ जोड़कर उगते सूरज को प्रणाम कर रहे थे। हवा में मंदिरों की घंटियाँ और शंख की ध्वनि घुली हुई थी।
कुछ पल के लिए नैना उस दृश्य में खो गई।
उसे लगा जैसे इस जगह से उसका कोई पुराना रिश्ता हो।
तभी उसकी नज़र घाट की सबसे आख़िरी सीढ़ी पर बैठे एक वृद्ध पंडित पर पड़ी।
सफ़ेद दाढ़ी, माथे पर चंदन का तिलक और हाथ में रुद्राक्ष की माला...
लेकिन उनकी आँखें लगातार नैना को ही देख रही थीं।
नैना धीरे-धीरे उनके पास पहुँची।
"प्रणाम, बाबा।"
वृद्ध पंडित ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने गंगा की ओर देखते हुए धीमे स्वर में कहा...
"कुछ लोग काशी दर्शन करने आते हैं... और कुछ को काशी स्वयं बुलाती है।"
नैना चौंक गई।
"आपका क्या मतलब है?"
पंडित ने पहली बार उसकी ओर देखा।
"बेटी... तुम्हारी आँखों में डर कम और सवाल ज़्यादा हैं। लगता है तुम किसी की तलाश में यहाँ आई हो।"
नैना कुछ पल चुप रही।
फिर उसने धीरे से कहा—
"मैं एक हवेली के बारे में जानना चाहती हूँ..."
पंडित के चेहरे के भाव अचानक बदल गए।
उन्होंने तुरंत गंगा की ओर देखा, जैसे किसी पुराने डर की याद फिर से जाग गई हो।
धीमी आवाज़ में उन्होंने कहा...
"अगर उसी हवेली की बात कर रही हो... जिसके बारे में मैं सोच रहा हूँ... तो बेटी, अभी भी समय है... वापस लौट जाओ।"
नैना ने दृढ़ स्वर में कहा...
"मैं बिना सच जाने वापस नहीं जाऊँगी।"
पंडित ने गहरी साँस ली...
और पहली बार उनके होंठों से एक नाम निकला—
"रुद्र हवेली..."
पंडित के होंठों से "रुद्र हवेली..." नाम सुनते ही नैना की धड़कन तेज़ हो गई।
"आप... इस हवेली के बारे में जानते हैं?" उसने उत्सुकता से पूछा।
पंडित कुछ क्षण तक मौन रहे। फिर उन्होंने गंगा से जल उठाकर अपनी हथेलियों पर छिड़का, मानो किसी अनिष्ट को टालने की कोशिश कर रहे हों।
"जानता हूँ..." उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "लेकिन कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें जितना छिपाकर रखा जाए, उतना ही अच्छा होता है।"
"मैं सच जानने के लिए ही यहाँ आई हूँ।"
पंडित ने उसकी आँखों में देखा।
"सच की राह आसान नहीं होती, बेटी। कई लोग उस हवेली का रहस्य जानने निकले... लेकिन कोई भी वैसा लौटकर नहीं आया जैसा गया था।"
नैना के चेहरे पर डर की जगह जिज्ञासा साफ़ दिखाई दे रही थी।
"क्या उस हवेली में सचमुच कुछ है?"
पंडित ने सीधे उत्तर देने के बजाय घाट की सबसे ऊपरी सीढ़ियों की ओर इशारा किया।
वहाँ दूर एक काले कपड़ों में लिपटा युवक खड़ा था। उसके चेहरे का आधा हिस्सा धूप और छाया के बीच छिपा हुआ था।
वह कुछ पल तक नैना को देखता रहा...
और फिर भीड़ में इस तरह गायब हो गया, जैसे कभी वहाँ था ही नहीं।
"वो कौन था?" नैना ने घबराकर पूछा।
पंडित ने धीरे से आँखें बंद कर लीं।
"कुछ सवालों के जवाब समय खुद देता है..."
इतना कहकर उन्होंने अपनी माला उठाई और मंत्र जपने लगे।
नैना ने तुरंत सीढ़ियाँ चढ़कर उस युवक को ढूँढ़ने की कोशिश की, लेकिन घाट पर मौजूद सैकड़ों लोगों के बीच उसका कहीं कोई निशान नहीं था।
उसी समय उसके मोबाइल पर एक संदेश आया।
"अगर सच जानना है... तो आज रात ठीक नौ बजे पुरानी काशी की आख़िरी गली में आना। अकेले।"
संदेश के नीचे किसी का नाम नहीं था।
सिर्फ़ वही रहस्यमय लाल निशान बना हुआ था...
जिसे देखकर नैना समझ गई...
उसका बनारस आना किसी संयोग का हिस्सा नहीं था।
नैना ने काँपते हाथों से मोबाइल स्क्रीन को दोबारा देखा।
संदेश बिल्कुल साफ़ था, लेकिन भेजने वाले का नाम नहीं था। उसने तुरंत उस नंबर पर कॉल करने की कोशिश की।
कुछ सेकंड तक घंटी बजती रही...
फिर एक ठंडी-सी रिकॉर्डेड आवाज़ सुनाई दी...
"जिस नंबर पर आप संपर्क करना चाहते हैं, वह अस्तित्व में नहीं है।"
नैना ने भौंहें सिकोड़ लीं।
"यह कैसे हो सकता है?"
उसने दोबारा स्क्रीन देखी।
इस बार संदेश अपने-आप गायब हो चुका था।
मोबाइल में उसका कोई निशान तक नहीं बचा था।
नैना का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
"क्या मैंने सचमुच यह संदेश देखा था... या यह भी किसी भ्रम का हिस्सा था?"
वह कुछ पल वहीं खड़ी रही। तभी पीछे से ऑटो चालक की आवाज़ आई...
"बिटिया, अगर घाट देख लिया हो तो चलें?"
नैना ने उसकी ओर देखा और धीमे कदमों से वापस ऑटो की तरफ़ बढ़ गई।
ऑटो चालक ने इंजन स्टार्ट किया, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर पहले जैसी सहजता नहीं थी।
कुछ दूर जाने के बाद उसने खुद ही पूछा...
"बिटिया... बनारस आने का फ़ैसला आपका था... या किसी ने आपको यहाँ बुलाया है?"
नैना ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
"आप बार-बार ऐसा क्यों कह रहे हैं?"
ऑटो चालक ने गहरी साँस ली।
"क्योंकि इस शहर में कुछ रास्ते ऐसे हैं जहाँ इंसान अपनी मर्ज़ी से नहीं पहुँचता... उसे बुलाया जाता है।"
"और अगर कोई बुलावे को नज़रअंदाज़ कर दे?"
ऑटो चालक कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला...
"तो शायद उसकी जान बच जाए..."
ऑटो के अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।
नैना खिड़की से बाहर देखने लगी।
बनारस की गलियाँ पीछे छूटती जा रही थीं, लेकिन उसके मन में सवालों का तूफ़ान लगातार बढ़ता जा रहा था।
उसे अब यकीन होने लगा था...
यह सफ़र किसी साधारण हवेली की तलाश का नहीं था।
बल्कि उस रहस्य की शुरुआत था...
जिसने शायद वर्षों पहले ही उसका नाम चुन लिया था।
नैना पूरे रास्ते ख़ामोश बैठी रही। ऑटो की खिड़की से बाहर झाँकते हुए वह बनारस की गलियों को ध्यान से देख रही थी। कहीं मंदिरों के बाहर भक्तों की लंबी कतारें थीं, कहीं चाय की दुकानों पर लोगों की भीड़ लगी थी। हर गली की अपनी एक अलग कहानी थी, और हर मोड़ पर ऐसा लगता था मानो सदियों पुराना इतिहास आज भी साँस ले रहा हो।
कुछ देर बाद ऑटो एक पुराने चौराहे पर रुका। वहाँ एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसकी जड़ों ने ज़मीन को चारों ओर से घेर रखा था। पेड़ के नीचे बैठे एक बुज़ुर्ग ने जैसे ही नैना को देखा, उनकी आँखों में एक पल के लिए अजीब-सा डर उभर आया।
उन्होंने बिना कुछ कहे अपने हाथ जोड़ लिए और धीरे-से बुदबुदाए...
"महादेव... इसकी रक्षा करना।"
नैना कुछ समझ नहीं पाई।
"भैया, ये मुझे देखकर ऐसे क्यों बोले?" उसने ऑटो चालक से पूछा।
ऑटो चालक ने नज़रें झुका लीं।
"काशी में कुछ लोग चेहरों से नहीं... किस्मत से पहचान लेते हैं।"
इतना कहकर उसने ऑटो फिर आगे बढ़ा दिया।
नैना ने एक बार फिर अपने बैग को कसकर पकड़ लिया। उसके मन में अब डर भी था और सच जानने की ज़िद भी।
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि अगले कुछ घंटों में उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
ऑटो धीरे-धीरे एक सुनसान रास्ते की ओर मुड़ने लगा...
और दूर, धुंध के बीच...
एक विशाल, जर्जर इमारत की परछाई पहली बार दिखाई दी।
वही जगह... जहाँ से इस रहस्य की असली शुरुआत होने वाली थी।
अध्याय 3 - रुद्र से पहली मुलाक़ात
बनारस की शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी।
आसमान पर काले बादल छा चुके थे। गंगा किनारे बहती ठंडी हवा में एक अजीब-सी ख़ामोशी घुल गई थी। नैना ने अपने मोबाइल की स्क्रीन देखी।
रात के ठीक नौ बज चुके थे।
उसे सुबह मिला वह रहस्यमयी संदेश याद आया...
"अगर सच जानना है... तो आज रात ठीक नौ बजे पुरानी काशी की आख़िरी गली में आना। अकेले।"
कुछ पल तक वह वहीं खड़ी सोचती रही।
क्या यह किसी की घटिया शरारत थी...
या सचमुच कोई उसे किसी बड़े रहस्य तक पहुँचाना चाहता था?
उसने गहरी साँस ली।
अब वापस लौटने का सवाल ही नहीं था।
नैना ने अपना बैग कंधे पर टाँगा और पुरानी काशी की सँकरी गलियों की ओर बढ़ गई।
रास्ता जितना आगे बढ़ता जा रहा था, गलियाँ उतनी ही सुनसान होती जा रही थीं।
कुछ पुराने मकानों की टूटी खिड़कियाँ हवा के साथ चरमराने लगीं। दूर कहीं किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई और फिर सब कुछ शांत हो गया।
तभी...
उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई उसके पीछे कोई चल रहा हो।
नैना तुरंत रुकी।
उसने पलटकर देखा।
गली बिल्कुल खाली थी।
"शायद मेरा वहम है..." उसने खुद से कहा और आगे बढ़ने लगी।
लेकिन अगले ही पल...
उसे फिर वही कदमों की आहट सुनाई दी।
इस बार पहले से भी ज़्यादा साफ़...
उसकी धड़कन तेज़ हो गई।
उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई और रोशनी चारों ओर घुमाई।
तभी सामने, धुंध और अँधेरे के बीच...
एक लंबा-सा साया दिखाई दिया।
वह बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
बारिश की हल्की बूँदें उसके कंधों पर गिर रही थीं, लेकिन वह बिना हिले नैना को देख रहा था...
नैना की उँगलियाँ डर के मारे काँपने लगीं।
उसने टॉर्च की रोशनी उस साये पर डाली, लेकिन तेज़ हवा के साथ धुंध और गहरी हो गई। कुछ पल बाद वह साया धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा।
हर कदम के साथ उसके जूतों की आवाज़ सुनसान गली में गूँज रही थी।
नैना का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
वह एक कदम पीछे हटी।
"क... कौन हो तुम?" उसने हिम्मत जुटाकर पूछा।
साया कुछ ही दूरी पर आकर रुक गया।
कुछ सेकंड तक दोनों के बीच गहरा सन्नाटा छाया रहा।
फिर उस अजनबी की शांत लेकिन गहरी आवाज़ सुनाई दी।
"जिस सच की तलाश में तुम यहाँ तक आई हो... उसे जानने की कीमत बहुत बड़ी है।"
नैना ने उसकी आँखों में देखने की कोशिश की, लेकिन उसका चेहरा अभी भी अँधेरे में छिपा हुआ था।
"अगर तुम्हें सब पता है, तो मुझे यहाँ क्यों बुलाया?" नैना ने दृढ़ स्वर में पूछा।
अजनबी हल्का-सा मुस्कुराया।
"मैंने तुम्हें नहीं बुलाया..."
"फिर किसने?"
उसने गली के आख़िरी सिरे की ओर इशारा किया।
"जिस जगह की तलाश तुम्हें है... उसने।"
नैना ने उस दिशा में देखा।
धुंध के बीच एक विशाल, जर्जर हवेली का लोहे का फाटक दिखाई दे रहा था।
फाटक पर जंग की मोटी परत जमी हुई थी, और उसके ऊपर पत्थर की टूटी हुई पट्टिका पर मुश्किल से कुछ अक्षर पढ़े जा रहे थे।
नैना ने आँखें सिकोड़कर देखा।
उस पर लिखा था—
"रुद्र हवेली"
जैसे ही उसने यह नाम पढ़ा, अचानक तेज़ हवा का झोंका चला।
फाटक अपने-आप चरमराते हुए थोड़ा-सा खुल गया...
और हवेली के भीतर से किसी स्त्री के दर्दभरे रोने की आवाज़ सुनाई दी।
नैना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसने घबराकर उस अजनबी की ओर देखा...
लेकिन वह वहाँ नहीं था।
मानो वह कभी उस गली में आया ही न हो।
नैना कुछ क्षण तक वहीं खड़ी रही। उसकी नज़र बार-बार उस पुराने फाटक पर जा रही थी। हवेली के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे बरगद और पीपल के पेड़ थे, जिनकी टहनियाँ हवा के साथ अजीब-सी आवाज़ें कर रही थीं।
उसने धीरे-धीरे एक कदम आगे बढ़ाया।
तभी उसके मोबाइल की घंटी बज उठी।
स्क्रीन पर फिर वही शब्द उभरे...
"Unknown Caller"
नैना ने बिना देर किए कॉल रिसीव कर ली।
"हेलो... कौन बोल रहा है?"
कुछ सेकंड तक सिर्फ़ हवा की सरसराहट सुनाई देती रही।
फिर एक धीमी लेकिन गंभीर आवाज़ आई।
"हवेली के अंदर मत जाना... अगर अपनी ज़िंदगी से प्यार है तो अभी वापस लौट जाओ।"
"आप कौन हैं? और मुझे बार-बार चेतावनी क्यों दे रहे हैं?"
उधर कुछ पल तक सन्नाटा छाया रहा।
फिर वही आवाज़ बोली...
"हर सवाल का जवाब सही समय पर मिलेगा... लेकिन अगर आज रात तुमने वह दरवाज़ा पार कर लिया, तो लौटकर कभी पहले जैसी नहीं रहोगी।"
इतना कहकर कॉल कट गई।
नैना ने दोबारा कॉल करने की कोशिश की, लेकिन हमेशा की तरह नंबर मौजूद ही नहीं था।
उसने गहरी साँस ली।
सामने दो रास्ते थे।
एक... वापस लौट जाने का।
दूसरा... उस रहस्य की ओर बढ़ने का, जिसने पिछले कई दिनों से उसकी नींद छीन रखी थी।
उसने बिना कुछ सोचे हवेली की ओर कदम बढ़ा दिए।
जैसे-जैसे वह फाटक के करीब पहुँच रही थी, हवा और ठंडी होती जा रही थी।
अचानक आसमान में तेज़ बिजली चमकी।
उसी रोशनी में नैना ने हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की पर किसी को खड़े देखा।
वह एक युवक था...
लंबा कद...
काले कपड़े...
और उसकी नज़रें सीधे नैना पर टिकी हुई थीं।
बिजली की चमक ख़त्म हुई...
और वह परछाईं भी गायब हो गई।
नैना ने घबराकर फिर ऊपर देखा।
खिड़की अब पूरी तरह खाली थी।
उसने मन ही मन खुद को संभाला और फाटक पर हाथ रखा।
फाटक ने ज़ोरदार चरमराहट के साथ अपने आप खुलना शुरू कर दिया...
मानो वह वर्षों से उसी का इंतज़ार कर रहा हो।
लेकिन नैना को नहीं पता था कि हवेली के अंदर उसका इंतज़ार सिर्फ़ एक रहस्य नहीं... बल्कि उसकी अपनी किस्मत कर रही थी।
अध्याय 4 - हवेली के बंद दरवाज़े
हवेली का विशाल लोहे का फाटक धीमी चरमराहट के साथ पूरी तरह खुल गया।
नैना कुछ पल वहीं खड़ी रही। उसके सामने सदियों पुरानी वह हवेली थी, जिसकी दीवारों पर समय की गहरी परतें साफ़ दिखाई दे रही थीं। जगह-जगह उखड़ा हुआ पलस्तर, टूटी हुई खिड़कियाँ और दीवारों पर उगी काई उसे और भी भयावह बना रही थी।
ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका उसके चेहरे से टकराया।
उसने अनायास अपने हाथों को आपस में कस लिया।
चारों ओर ऐसा सन्नाटा था कि उसकी अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
नैना ने हिम्मत जुटाई और धीरे-धीरे हवेली के मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ने लगी।
हर कदम के साथ ऐसा लग रहा था मानो ज़मीन उसके पैरों के नीचे हल्की-हल्की काँप रही हो।
मुख्य दरवाज़े तक पहुँचते ही उसने देखा कि उस पर बेहद पुरानी नक्काशी बनी हुई थी।
बीचों-बीच वही रहस्यमयी लाल निशान उकेरा हुआ था...
जिसे वह पहले चिट्ठी, पीतल की चाबी और बनारस की उस पुरानी दीवार पर देख चुकी थी।
"आख़िर इस निशान का मतलब क्या है?" उसने धीमे स्वर में खुद से कहा।
जैसे ही उसने दरवाज़े को हल्का-सा धक्का दिया...
धड़ाम...!
दरवाज़ा अपने-आप पूरी ताक़त से खुल गया।
अंदर से ठंडी, बर्फ़ जैसी हवा का झोंका बाहर आया।
नैना ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और सावधानी से हवेली के अंदर कदम रखा...
हॉल में चारों ओर धूल की मोटी परत जमी हुई थी। ऐसा लग रहा था मानो वर्षों से यहाँ किसी इंसान ने कदम ही न रखा हो। छत से लटका विशाल झूमर टूटा हुआ था और उसके काँच के टुकड़े फ़र्श पर बिखरे पड़े थे। दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें समय के साथ धुंधली पड़ चुकी थीं, लेकिन उनमें बने चेहरों की आँखें अब भी किसी जीवित इंसान की तरह हर आने-जाने वाले का पीछा करती प्रतीत होती थीं।
नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसके कदमों की आहट पूरे हॉल में गूँज रही थी। हर आवाज़ कई गुना होकर लौट रही थी, जिससे हवेली और भी डरावनी लगने लगी।
अचानक उसकी नज़र एक पुराने पियानो पर पड़ी। उस पर धूल की मोटी परत जमी थी। वह उसके पास गई और उँगली से धूल हटाई।
उसी क्षण...
पियानो अपने-आप बज उठा।
एक उदास धुन पूरे हॉल में फैल गई।
नैना घबराकर दो कदम पीछे हट गई।
"यह... यह कैसे हो सकता है?" उसने काँपती आवाज़ में कहा।
हवेली में फिर वही गहरा सन्नाटा छा गया।
कुछ पल बाद ऊपर की मंज़िल से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आने लगी।
ठक... ठक... ठक...
हर कदम के साथ नैना की धड़कन तेज़ होती जा रही थी।
उसने मोबाइल की टॉर्च ऊपर की ओर घुमाई।
लकड़ी की पुरानी सीढ़ियाँ अँधेरे में खोई हुई थीं।
लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे कोई अभी-अभी उन सीढ़ियों से नीचे उतर रहा हो।
नैना ने खुद को संभाला और सावधानी से पहली सीढ़ी पर पैर रखा।
सीढ़ी ने ज़ोर से चरमराकर आवाज़ की।
वह रुक गई।
कुछ सेकंड तक उसने साँस भी रोक ली।
फिर हिम्मत करके आगे बढ़ी।
ऊपरी मंज़िल पर पहुँचते ही एक लंबा गलियारा दिखाई दिया। दोनों ओर कई बंद कमरे थे। सभी दरवाज़ों पर जंग लगे पुराने ताले लटक रहे थे।
लेकिन गलियारे के आख़िरी कमरे का दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।
उसी कमरे के भीतर से हल्की पीली रोशनी बाहर आ रही थी।
"क्या वहाँ कोई है?" नैना ने धीमे स्वर में पूछा।
कोई उत्तर नहीं मिला।
उसने धीरे-धीरे उस कमरे की ओर कदम बढ़ाए।
जैसे ही वह दरवाज़े के पास पहुँची, हवा का तेज़ झोंका आया और दरवाज़ा अपने-आप पूरी तरह खुल गया।
कमरे के बीचों-बीच एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।
उस पर कोई बैठा था।
उसका चेहरा अँधेरे में छिपा हुआ था।
नैना के कदम वहीं रुक गए।
"कौन... कौन हो तुम?" उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
कुछ क्षण तक कोई हलचल नहीं हुई।
फिर वह व्यक्ति धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
उसका लंबा कद, काले कपड़े और शांत व्यक्तित्व देखकर नैना अनायास दो कदम पीछे हट गई।
वह धीरे-धीरे रोशनी की ओर बढ़ा।
अब पहली बार उसका चेहरा साफ़ दिखाई दिया।
गहरी आँखें...
साँवला चेहरा...
और होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान।
उसने बिना घबराहट के नैना की ओर देखा और शांत स्वर में कहा—
"आख़िर... तुम आ ही गई।"
नैना हैरान रह गई।
"तुम... मुझे जानते हो?"
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
"मैं तुम्हें आज से नहीं... कई जन्मों से जानता हूँ।"
यह सुनते ही नैना के हाथ से मोबाइल छूटकर ज़मीन पर गिर गया।
उसकी टॉर्च बुझ गई।
पूरा कमरा फिर से अँधेरे में डूब गया।
और उसी अँधेरे में...
किसी स्त्री की दर्दभरी चीख़ पूरी हवेली में गूँज उठी।
चीख़ की आवाज़ पूरी हवेली में गूँजती रही।
नैना के हाथ-पैर सुन्न पड़ गए। उसने घबराकर मोबाइल उठाया और किसी तरह टॉर्च दोबारा जला ली।
कमरे में वही युवक शांत खड़ा था।
उसके चेहरे पर न डर था, न घबराहट।
मानो वह इस आवाज़ का आदी हो।
"ये... ये आवाज़ किसकी थी?" नैना ने काँपते हुए पूछा।
युवक ने कुछ क्षण तक उसकी ओर देखा, फिर खिड़की की तरफ़ बढ़ गया।
बाहर घना अँधेरा था। दूर-दूर तक सिर्फ़ पेड़ों की परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।
"इस हवेली में बहुत-सी आवाज़ें हैं..." उसने धीमे स्वर में कहा, "लेकिन हर आवाज़ के पीछे एक अधूरी कहानी छिपी है।"
"तुम मेरे सवाल का जवाब क्यों नहीं दे रहे?"
युवक ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा।
"क्योंकि कुछ जवाब सुनने का सही समय होता है। अगर सच एक साथ जान लोगी... तो शायद खुद को संभाल नहीं पाओगी।"
नैना का धैर्य टूटने लगा।
"पहेलियाँ मत बुझाओ। साफ़-साफ़ बताओ... तुम कौन हो?"
कुछ पल तक कमरे में गहरा सन्नाटा छाया रहा।
फिर उसने धीमे स्वर में कहा...
"मेरा नाम... रुद्र है।"
यह नाम सुनते ही नैना की आँखें फैल गईं।
"रुद्र...? क्या इस हवेली का नाम तुम्हारे नाम पर है?"
रुद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया।
वह धीरे-धीरे कमरे के एक पुराने संदूक के पास पहुँचा। संदूक पर वर्षों पुरानी धूल जमी हुई थी।
संदूक के ऊपर एक पुरानी तस्वीर रखी थी।
रुद्र ने वह तस्वीर उठाकर नैना की ओर बढ़ा दी।
"इसे ध्यान से देखो।"
नैना ने तस्वीर हाथ में ली।
तस्वीर लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी लग रही थी।
उसमें एक शाही परिवार खड़ा था।
बीच में एक युवा पुरुष...
और उसके ठीक बगल में खड़ी एक युवती...
नैना की साँस जैसे थम गई।
वह युवती बिल्कुल उसी जैसी दिख रही थी।
चेहरा...
आँखें...
यहाँ तक कि मुस्कान भी।
"ये... ये कैसे हो सकता है?" उसके मुँह से मुश्किल से शब्द निकले।
रुद्र ने गंभीर आवाज़ में कहा...
"यही वह सवाल है, जिसका जवाब तुम्हें यहाँ तक खींच लाया है।"
नैना बार-बार तस्वीर और अपने चेहरे को देखने लगी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह सिर्फ़ एक संयोग था...
या सचमुच उसका इस हवेली से कोई गहरा रिश्ता था।
तभी अचानक नीचे हॉल से किसी भारी चीज़ के गिरने की ज़ोरदार आवाज़ आई।
धड़ाम...!
दोनों एक साथ दरवाज़े की ओर मुड़े।
रुद्र का चेहरा पहली बार गंभीर हो गया।
उसने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—
"वो लोग... यहाँ पहुँच चुके हैं।"
नैना ने घबराकर पूछा—
"कौन लोग?"
रुद्र ने बिना जवाब दिए कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया...
और बाहर गलियारे में किसी के भारी कदमों की आहट तेज़ होती चली गई।
तभी किसी ने ज़ोर से दरवाज़े पर दस्तक दी...
धड़... धड़... धड़...
और एक भारी आवाज़ गूँजी—
"रुद्र... हमें पता है, वह लड़की अंदर है।"
"उसे बाहर भेज दो... वरना देर हो जाएगी।"
रुद्र ने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।
उसने धीमे स्वर में कहा...
"उन्होंने मुझे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते अब तुम्हें भी ढूँढ़ लिया..."
नैना हैरानी से उसे देखने लगी।
"लेकिन... तुम हो कौन?"
रुद्र ने उसकी ओर देखा।
"मैं इस हवेली का मालिक नहीं... इसकी कैद में बँधी एक अधूरी आत्मा हूँ।"
अध्याय 5 - हवेली का छिपा हुआ तहखाना
दरवाज़े पर लगातार दस्तक हो रही थी।
धड़... धड़... धड़...
पूरी हवेली उस आवाज़ से काँप उठी।
नैना का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसने घबराकर रुद्र की ओर देखा।
"बाहर... कौन है?" उसने धीमी आवाज़ में पूछा।
रुद्र ने अपनी उँगली होंठों पर रखी और इशारे से उसे बिल्कुल शांत रहने को कहा।
दस्तक अचानक बंद हो गई।
पूरे गलियारे में गहरा सन्नाटा छा गया।
लेकिन अगले ही पल...
दरवाज़े के नीचे से किसी की परछाईं धीरे-धीरे गुज़री।
ऐसा लग रहा था मानो कई लोग कमरे के बाहर खड़े हों।
रुद्र ने दीवार पर टंगी एक पुरानी मशाल उठाई। उसने उसे जलाया तो हल्की पीली रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।
वह नैना के पास आया और धीमे स्वर में बोला...
"अगर इस हवेली का सच जानना है... तो मेरे साथ चलो। लेकिन जो कुछ भी देखोगी, उसके बाद तुम्हारी ज़िंदगी पहले जैसी कभी नहीं रहेगी।"
नैना ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
रुद्र कमरे के एक पुराने लकड़ी के बुकशेल्फ़ के सामने रुका।
उसने शेल्फ़ में रखी एक धूल भरी मूर्ति को धीरे से घुमाया।
घर्र... घर्र...
अचानक पूरी दीवार हिलने लगी...
और उसके पीछे एक संकरा, अँधेरा रास्ता दिखाई दिया।
ठंडी हवा का तेज़ झोंका उस गुप्त रास्ते से बाहर आया।
नैना ने आश्चर्य से रुद्र की ओर देखा।
"ये... ये क्या है?"
रुद्र ने मशाल उठाई और गंभीर स्वर में कहा—
"यही रास्ता उस तहखाने तक जाता है... जहाँ इस हवेली का सबसे बड़ा रहस्य दफ़्न है।"रुद्र ने नैना का हाथ पकड़ा और तेज़ी से कमरे के दूसरे कोने की ओर बढ़ा।
वहाँ एक पुरानी पत्थर की दीवार थी, जिस पर समय के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे। दीवार के बीचों-बीच वही रहस्यमयी लाल चिन्ह बना था, जिसे नैना पहले भी कई जगह देख चुकी थी।
"ये निशान..." नैना बुदबुदाई।
रुद्र ने बिना कुछ कहे उस चिन्ह पर अपना हाथ रखा।
अगले ही पल पूरी दीवार ज़ोर से काँपने लगी।
घर्र... घर्र...
पत्थर धीरे-धीरे एक ओर खिसकने लगे और उनके पीछे अँधेरे में उतरती सँकरी सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं।
"चलो!" रुद्र ने कहा।
दोनों तेज़ी से नीचे उतरने लगे।
ऊपर से किसी भारी चीज़ के टूटने की आवाज़ आई।
ऐसा लगा जैसे कमरे का दरवाज़ा ज़बरदस्ती तोड़ दिया गया हो।
नैना का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
"वो लोग अंदर आ गए?" उसने घबराकर पूछा।
रुद्र ने सिर हिलाया।
"हाँ... लेकिन अभी वे हमें नहीं ढूँढ़ पाएँगे।"
सीढ़ियाँ बहुत लंबी थीं। दीवारों पर नमी जमी हुई थी और हर तरफ़ मिट्टी की गंध फैली हुई थी। हवा इतनी ठंडी थी कि नैना के हाथ काँपने लगे।
कुछ देर बाद वे एक विशाल तहखाने में पहुँचे।
मशाल की रोशनी चारों ओर फैली तो नैना की आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
तहखाने की दीवारों पर सैकड़ों पुराने चित्र बने थे।
कुछ चित्रों में एक शाही परिवार दिखाई दे रहा था...
कुछ में युद्ध...
और कुछ में आग की लपटों से घिरी यही हवेली।
नैना एक-एक चित्र को ध्यान से देखने लगी।
अचानक उसकी नज़र एक बड़ी पेंटिंग पर पड़ी।
उसमें एक युवक तलवार लिए खड़ा था।
उसके चेहरे पर वही गंभीरता...
वही आँखें...
वह बिल्कुल रुद्र जैसा दिख रहा था।
लेकिन उसके पास खड़ी युवती को देखकर नैना की साँस अटक गई।
वह युवती बिल्कुल उसी जैसी थी।
"यह... मैं हूँ?" उसके मुँह से अनायास निकला।
रुद्र उसके पास आकर खड़ा हो गया।
"नहीं... यह तुम नहीं हो।" उसने शांत स्वर में कहा।
नैना ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
"फिर यह लड़की बिल्कुल मेरी तरह क्यों दिखती है?"
रुद्र कुछ पल तक चुप रहा।
"क्योंकि उसकी आत्मा और तुम्हारा रिश्ता... सिर्फ़ एक संयोग नहीं है।"
नैना उलझ गई।
मैं कुछ समझी नहीं।
क्या तुम ये कहना चाहते हो कि मेरा इस हवेली से कोई संबंध है?
रुद्र ने सीधे जवाब देने के बजाय तस्वीर की ओर देखा।
"हर सवाल का जवाब अभी नहीं मिल सकता। समय आने पर सब कुछ खुद तुम्हारे सामने आ जाएगा।"
नैना ने तस्वीर को फिर ध्यान से देखा। उसका दिल कह रहा था कि यह सिर्फ़ एक समान चेहरा नहीं था... इस तस्वीर में कोई ऐसा सच छिपा था, जो उसकी पूरी ज़िंदगी बदल सकता था।
नैना ने तस्वीर से अपनी नज़रें हटाईं, लेकिन उसके मन में उठ रहे सवाल शांत होने का नाम नहीं ले रहे थे।
"अगर यह मैं नहीं हूँ... तो फिर यह मेरे जैसी क्यों दिखती है?" उसने धीमे स्वर में पूछा।
रुद्र ने तहखाने की दीवार पर बनी एक पुरानी आकृति की ओर देखा।
"कुछ चेहरे समय बदलने पर भी नहीं बदलते... क्योंकि उनका रिश्ता सिर्फ़ इस जन्म से नहीं होता।"
"क्या तुम पुनर्जन्म की बात कर रहे हो?" नैना ने अविश्वास से पूछा।
रुद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया।
वह धीरे-धीरे तहखाने के बीच बने एक पत्थर के चबूतरे तक गया। चबूतरे पर एक पीतल का छोटा-सा संदूक रखा था, जिस पर वर्षों की धूल जमी हुई थी।
उसने सावधानी से संदूक खोला।
अंदर एक चाँदी का कंगन रखा था।
कंगन पर बेहद बारीक अक्षरों में एक नाम उकेरा हुआ था...
"वैदेही"
रुद्र ने वह कंगन नैना की ओर बढ़ाया।
"इसे अपने हाथ में पहनकर देखो।"
नैना कुछ पल झिझकी, फिर उसने कंगन अपनी कलाई में पहन लिया।
जैसे ही कंगन उसकी कलाई को छुआ...
पूरा तहखाना तेज़ रोशनी से भर गया।
नैना की आँखों के सामने अजीब-अजीब दृश्य घूमने लगे।
एक भव्य महल...
शहनाइयों की आवाज़...
सफ़ेद और लाल जोड़े में सजी एक युवती...
और उसके सामने खड़ा वही युवक...
रुद्र।
दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे मुस्कुरा रहे थे।
अचानक दृश्य बदल गया।
चारों ओर आग की लपटें उठने लगीं।
लोग चीख रहे थे।
तलवारों की टकराने की आवाज़ गूँज रही थी।
वही युवती रोते हुए रुद्र की ओर भाग रही थी...
लेकिन इससे पहले कि वह उसके पास पहुँचती, किसी ने पीछे से उस पर वार कर दिया।
"नहीं...!"
नैना चीखते हुए वर्तमान में लौट आई।
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं और माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं।
कंगन अब भी उसकी कलाई में था।
"मैंने... यह सब कैसे देखा?" उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
रुद्र की आँखों में पहली बार उम्मीद की एक हल्की-सी चमक दिखाई दी।
यह सिर्फ़ एक सपना नहीं था..."
"तो फिर क्या था?"
रुद्र ने गहरी साँस ली।
"यह उन यादों की पहली झलक थी... जिन्हें समय भी मिटा नहीं पाया।"
उसी क्षण तहखाने के बाहर फिर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
इस बार वह पहले से कहीं ज़्यादा करीब थी।
रुद्र तुरंत सतर्क हो गया।
उसने मशाल बुझा दी।
तहखाना फिर अँधेरे में डूब गया...
और उस अँधेरे में दो लाल चमकती आँखें धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगीं।
नैना की साँसें थम-सी गईं।
उसने अँधेरे में ध्यान से देखने की कोशिश की, लेकिन उन लाल आँखों के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
अचानक...
एक धीमी गुर्राहट पूरे तहखाने में गूँज उठी।
नैना अनायास रुद्र के पीछे छिप गई।
"वो... क्या है?" उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
रुद्र ने बिना उसकी ओर देखे कहा,
"शांत रहो... और चाहे कुछ भी हो जाए, मेरी अनुमति के बिना एक कदम भी आगे मत बढ़ाना।"
लाल आँखें अब बिल्कुल उनके सामने थीं।
धीरे-धीरे अँधेरे से एक विशाल काले भेड़िये की आकृति उभरने लगी।
उसका शरीर साधारण भेड़ियों से कहीं बड़ा था। गर्दन के चारों ओर लंबे काले बाल थे और उसकी आँखें अंगारों की तरह चमक रही थीं।
लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि उसके गले में वही लाल निशान बना हुआ था, जो हवेली के दरवाज़े और चाबी पर उकेरा गया था।
भेड़िया गुर्राया...
फिर अचानक उसकी नज़र नैना पर टिक गई।
कुछ पल के लिए पूरा तहखाना बिल्कुल शांत हो गया।
रुद्र धीरे-धीरे उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
"रास्ता छोड़ दो..." उसने दृढ़ स्वर में कहा।
भेड़िये ने सिर झुकाया, जैसे वह रुद्र को पहचानता हो।
लेकिन अगले ही पल उसकी नज़र फिर नैना पर गई और वह बेचैन होकर पीछे हटने लगा।
नैना हैरानी से यह सब देख रही थी।
"यह... मुझसे डर रहा है?"
रुद्र ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
नहीं... यह तुम्हें पहचानने की कोशिश कर रहा है।"
"पहचानने की?"
"इस हवेली का हर रहस्य, हर पत्थर और हर पहरेदार उस दिन का इंतज़ार कर रहा था... जब तुम यहाँ लौटोगी।"
इतना सुनते ही भेड़िया अचानक ज़ोर से दहाड़ा।
उसकी दहाड़ से तहखाने की छत से धूल झड़ने लगी।
उसी समय दूर कहीं एक घंटी अपने-आप बज उठी।
टन... टन... टन...
रुद्र का चेहरा गंभीर हो गया।
"समय ख़त्म हो रहा है..."
"किस बात का समय?" नैना ने घबराकर पूछा।
रुद्र ने तहखाने के सबसे अँधेरे कोने की ओर देखा।
वहाँ पत्थर की दीवार पर धीरे-धीरे एक दरार उभर रही थी।
उस दरार से काला धुआँ बाहर निकलने लगा...
और उसी धुएँ के बीच किसी की ठंडी, डरावनी हँसी गूँज उठी।
"आख़िर... तुम लौट ही आई, वैदेही..."
यह नाम सुनते ही नैना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसने घबराकर रुद्र की ओर देखा...
लेकिन इस बार रुद्र की आँखों में पहली बार डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
अध्याय 6 - वैदेही का रहस्य
"आख़िर... तुम लौट ही आई, वैदेही..."
वह आवाज़ पूरे तहखाने में गूँज उठी।
नैना के शरीर में सिहरन दौड़ गई। उसने घबराकर चारों ओर देखा, लेकिन वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था। काला धुआँ धीरे-धीरे पूरे तहखाने में फैलने लगा।
"कौन हो तुम?" नैना ने काँपती आवाज़ में पूछा।
जवाब में फिर वही ठंडी हँसी सुनाई दी।
"इतनी जल्दी सब जान जाओगी... तो खेल ख़त्म हो जाएगा।"
रुद्र तुरंत नैना के सामने आकर खड़ा हो गया।
उसकी आँखें उसी काले धुएँ पर टिकी थीं।
"सामने आओ!" रुद्र ने तेज़ आवाज़ में कहा।
कुछ क्षण तक सन्नाटा छाया रहा।
फिर काला धुआँ एक जगह इकट्ठा होने लगा। धीरे-धीरे उसमें एक इंसानी आकृति बनने लगी। उसने काला लबादा पहन रखा था और उसका चेहरा धुएँ से ढका हुआ था।
उसकी आँखें अंगारों की तरह लाल थीं।
नैना अनायास दो कदम पीछे हट गई।
"याद है, रुद्र?" वह रहस्यमयी आकृति बोली। "मैंने कहा था... एक दिन वह खुद चलकर तुम्हारे पास आएगी।"
रुद्र की मुट्ठियाँ कस गईं।
"उसका नाम वैदेही नहीं... नैना है।"
आकृति ज़ोर से हँसी।
"नाम बदल देने से किस्मत नहीं बदलती।"
नैना दोनों की बातें सुनकर पूरी तरह उलझ चुकी थी।
"कोई मुझे बताएगा भी कि आखिर हो क्या रहा है?"
रुद्र ने उसकी ओर देखा। इस बार उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा शांत थी।
"अब सच छिपाने का कोई मतलब नहीं।"
वह धीरे-धीरे तहखाने की सबसे पुरानी दीवार के पास गया। वहाँ एक विशाल चित्र बना था।
चित्र में एक राजसी महल, उसके सामने खड़े सैकड़ों सैनिक और बीच में एक युवक और एक युवती दिखाई दे रहे थे।
युवती बिल्कुल नैना जैसी थी।
रुद्र ने चित्र की ओर देखते हुए कहा—
"आज से एक सौ अट्ठाईस साल पहले... इस हवेली में एक ऐसा वादा किया गया था, जो कभी पूरा नहीं हो सका।"
नैना बिना पलक झपकाए उसकी बात सुनती रही।
"उस युवती का नाम... वैदेही था।"
नैना ने काँपते हाथों से उस चित्र को छुआ।
"यह कैसे मुमकिन है? उसका चेहरा... मेरी तरह ही क्यों है?"
"वह सिर्फ़ तुम्हारी जैसी नहीं दिखती थी... वह तुम्हारा ही पिछला जन्म थी।"
यह सुनते ही नैना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"नहीं... यह सच नहीं हो सकता।"
रुद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।
नैना ने काँपते हाथों से उस चित्र को छुआ।
"यह कैसे मुमकिन है? उसका चेहरा... मेरी तरह ही क्यों है?"
रुद्र ने गहरी साँस ली।
"क्योंकि कुछ कहानियाँ मौत पर ख़त्म नहीं होतीं... वे समय के साथ फिर से शुरू होती हैं।"
नैना की आँखों में अब भी अविश्वास था।
"तो... क्या तुम कहना चाहते हो कि मैं वैदेही का पुनर्जन्म हूँ?"
रुद्र कुछ पल चुप रहा।
"मैं तुम्हें किसी बात पर विश्वास करने के लिए मजबूर नहीं करूँगा। लेकिन सच अपने निशान कभी नहीं मिटाता।"
इतना कहकर उसने तहखाने के बीच बने पत्थर के चबूतरे की ओर इशारा किया।
वहाँ एक गोल पत्थर लगा था, जिस पर कई प्राचीन मंत्र खुदे हुए थे।
उस पत्थर के बीचों-बीच एक छोटी-सी जगह बनी थी... बिल्कुल उसी आकार की, जैसी वह पीतल की चाबी थी जो नैना को मिली थी।
नैना की धड़कन तेज़ हो गई।
उसने धीरे-धीरे अपना बैग खोला।
उसने अंदर हाथ डाला और कपड़े में लिपटी वह पुरानी पीतल की चाबी बाहर निकाली।
"क्या... यही वह चाबी है?" उसने पूछा।
रुद्र ने सिर हिलाया।
"हाँ। इस हवेली का सबसे बड़ा रहस्य इसी के पीछे छिपा है।"
नैना ने काँपते हाथों से चाबी उठाई।
जैसे ही वह उसे पत्थर के बने उस छेद के पास ले गई...
चाबी अपने-आप चमकने लगी।
पूरे तहखाने में सुनहरी रोशनी फैल गई।
दीवारों पर बने सभी चिन्ह एक साथ जगमगा उठे।
ज़मीन हल्के-हल्के काँपने लगी।
अचानक दूर से एक भयानक गर्जना सुनाई दी।
गुर्ररर...!
नैना घबराकर पीछे हट गई।
"यह कैसी आवाज़ थी?"
रुद्र का चेहरा गंभीर हो गया।
"वह जाग चुका है..."
"कौन?"
रुद्र ने पहली बार डर भरी नज़रों से तहखाने के सबसे अँधेरे कोने की ओर देखा।
"जिसे हमने इतने वर्षों से बंद करके रखा था..."
उसी क्षण काले धुएँ से वही रहस्यमयी आकृति फिर प्रकट हुई।
इस बार उसकी हँसी पहले से कहीं ज़्यादा डरावनी थी।
"बहुत देर कर दी, रुद्र..."
"अब श्राप टूटने वाला है... और इस बार कोई भी उसे रोक नहीं पाएगा।"
यह सुनते ही तहखाने की दीवार में एक लंबी दरार पड़ गई।
दरार के भीतर से तेज़ लाल रोशनी बाहर निकलने लगी...
और उसी रोशनी में किसी विशाल आकृति की परछाईं धीरे-धीरे दिखाई देने लगी।
नैना ने अनजाने में रुद्र का हाथ कसकर पकड़ लिया।
उसके होंठ काँप रहे थे।
"रुद्र... आखिर उस दरार के पीछे क्या है?"
रुद्र ने बिना पलक झपकाए उसी ओर देखते हुए धीमे स्वर में कहा—
"हमारा सबसे बड़ा दुश्मन..."
नैना ने काँपती आवाज़ में पूछा,
"कौन है वह?"
रुद्र कुछ पल तक चुप रहा।
उसकी नज़रें अब भी उस लाल रोशनी से भरी दरार पर टिकी थीं।
फिर उसने धीमे स्वर में कहा—
"उसका नाम... विक्रांत है।"
"विक्रांत?"
"एक समय वह मेरा सबसे भरोसेमंद मित्र था। लेकिन लालच और शक्ति की चाह ने उसे राक्षस बना दिया।"
नैना ध्यान से उसकी हर बात सुन रही थी।
"वह इस हवेली के नीचे छिपी उस शक्ति को अपने अधिकार में लेना चाहता था, जो सदियों से यहाँ सुरक्षित रखी गई थी।"
"कैसी शक्ति?"
रुद्र ने उत्तर देने से पहले गहरी साँस ली।
"ऐसी शक्ति... जो जीवन और मृत्यु के बीच की सीमाएँ भी मिटा सकती है।"
नैना की आँखें फैल गईं।
"क्या ऐसी शक्ति सचमुच हो सकती है?"
"हर रहस्य किताबों में नहीं लिखा होता, नैना। कुछ रहस्य समय खुद छिपाकर रखता है।"
इतने में दरार और चौड़ी हो गई।
उसके भीतर से निकलती लाल रोशनी पूरे तहखाने में फैलने लगी।
अचानक दीवारों पर बने सभी प्राचीन मंत्र चमक उठे।
पूरा तहखाना काँपने लगा।
छत से छोटे-छोटे पत्थर गिरने लगे।
रुद्र ने तुरंत नैना का हाथ पकड़ लिया।
"हमें यहाँ से अभी निकलना होगा!"
दोनों तेज़ी से पीछे हटे।
लेकिन तभी...
दरार के भीतर से एक काला हाथ धीरे-धीरे बाहर निकला।
उसके लंबे नुकीले नाखून पत्थर को ऐसे चीर रहे थे, मानो वह मिट्टी हो।
नैना के मुँह से चीख निकल गई।
"रुद्र...!"
रुद्र ने अपनी पूरी शक्ति से नैना को पीछे खींच लिया।
अगले ही पल वह काला हाथ वापस अँधेरे में समा गया।
लेकिन जाते-जाते एक भारी आवाज़ पूरे तहखाने में गूँज उठी...
"मैं लौट आया हूँ... और इस बार मुझे कोई नहीं रोक पाएगा।"
रुद्र का चेहरा पहली बार पूरी तरह बदल गया।
उसने गंभीर स्वर में कहा—
"अब हमारे पास सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा है..."
नैना ने घबराकर पूछा—
"कौन-सा रास्ता?"
रुद्र ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा...
"तुम्हें अपना पूरा अतीत याद करना होगा... क्योंकि विक्रांत को हराने की चाबी सिर्फ़ तुम्हारी यादों में छिपी है।"
यह सुनकर नैना बिल्कुल स्तब्ध रह गई।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह एक साधारण लड़की थी...
या सचमुच सदियों पुराने अधूरे इतिहास का हिस्सा।
उसी पल तहखाने की आख़िरी मशाल भी अपने-आप बुझ गई...
और चारों ओर फिर से गहरा अँधेरा छा गया।
लेकिन नैना को नहीं पता था कि उसकी खोई हुई यादें सिर्फ़ विक्रांत को हराने का रास्ता नहीं थीं... बल्कि उनमें एक ऐसा सच छिपा था, जो रुद्र की किस्मत हमेशा के लिए बदलने वाला था।
अध्याय 7 - अधूरी मोहब्बत का अंतिम सच
तहखाने में चारों ओर गहरा अँधेरा छाया हुआ था।
नैना की साँसें तेज़ चल रही थीं। उसे सिर्फ़ अपनी धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
अचानक...
उसकी कलाई में पहना चाँदी का कंगन तेज़ी से चमकने लगा।
पूरे तहखाने में सुनहरी रोशनी फैल गई।
रुद्र ने हैरानी से नैना की ओर देखा।
"शुरू हो गया..." उसने धीमे स्वर में कहा।
"क्या शुरू हो गया?" नैना घबराकर बोली।
रुद्र ने जवाब नहीं दिया।
अगले ही पल नैना की आँखों के सामने एक-एक करके अतीत के दृश्य उभरने लगे।
उसे एक भव्य राजमहल दिखाई दिया।
चारों ओर दीपों की रोशनी थी।
शहनाइयाँ बज रही थीं।
महल के आँगन में सैकड़ों लोग किसी उत्सव की तैयारी कर रहे थे।
भीड़ के बीच एक युवती लाल रंग के शाही वस्त्र पहने खड़ी थी।
उसके चेहरे पर वही मासूम मुस्कान थी...
जो आज नैना के चेहरे पर थी।
"वैदेही..." किसी ने पुकारा।
युवती मुस्कुराकर पीछे मुड़ी।
सामने रुद्र खड़ा था।
उसने वैदेही की ओर हाथ बढ़ाया।
"मैंने तुमसे वादा किया था..."
"इस जन्म में भी... और अगले हर जन्म में भी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूँगा।"
वैदेही मुस्कुराई और उसने अपना हाथ रुद्र के हाथ में रख दिया।
उसी क्षण...
पूरा दृश्य अचानक बदल गया।
आसमान काले बादलों से भर गया।
महल के बाहर तलवारों की टकराने की आवाज़ गूँजने लगी।
लोग चीखते हुए इधर-उधर भागने लगे।
महल में आग लग चुकी थी।
वैदेही घबराकर रुद्र की ओर दौड़ी।
"रुद्र...!"
लेकिन तभी...
अँधेरे से एक काली परछाईं बाहर आई।
उसके हाथ में चमकती तलवार थी।
उसने बिना चेतावनी रुद्र पर वार कर दिया...
और उसी पल नैना की आँखें खुल गईं।
उसकी साँसें बेकाबू थीं।
आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
वह काँपती आवाज़ में बोली—
"मुझे... सब याद आने लगा है..."
रुद्र कुछ पल तक चुपचाप नैना को देखता रहा।
उसकी आँखों में वर्षों का दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था।
"तुम्हें क्या याद आया?" उसने धीमे स्वर में पूछा।
नैना ने काँपते हुए कहा,
"मैंने देखा... महल में आग लगी थी। चारों तरफ़ चीख-पुकार थी। तुम मेरे सामने थे... और फिर किसी ने तुम पर हमला कर दिया।"
रुद्र ने धीरे से सिर झुका लिया।
"हाँ... वही हमारी कहानी का आख़िरी दिन था।"
"लेकिन वह आदमी कौन था?"
रुद्र की आँखों में गुस्सा उतर आया।
"विक्रांत..."
"उसे सिर्फ़ इस हवेली की शक्ति नहीं चाहिए थी। वह वैदेही को भी अपनी रानी बनाना चाहता था।"
नैना के चेहरे पर घृणा साफ़ दिखाई देने लगी।
"और जब वैदेही ने उसे ठुकरा दिया..."
रुद्र ने बात पूरी की,
"... तो उसने बदला लेने की ठान ली।"
कुछ पल के लिए तहखाने में फिर सन्नाटा छा गया।
रुद्र धीरे-धीरे उस पत्थर के चबूतरे तक गया और उस पर हाथ रखा।
अचानक चबूतरे के ऊपर धुएँ जैसी एक चमक उठी।
उस चमक में अतीत का दृश्य फिर दिखाई देने लगा।
विक्रांत अपने सैनिकों के साथ हवेली पर हमला कर रहा था।
रुद्र तलवार लेकर उसका सामना कर रहा था।
दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया।
तलवारों की टक्कर से चिंगारियाँ उड़ रही थीं।
वैदेही बार-बार दोनों को रोकने की कोशिश कर रही थी।
लेकिन विक्रांत की आँखों पर सत्ता का जुनून सवार था।
अचानक उसने धोखे से रुद्र पर वार किया।
रुद्र घायल होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
"रुद्र!" वैदेही चीखते हुए उसकी ओर दौड़ी।
लेकिन तभी विक्रांत ने उसके सामने एक भयानक रखा।
"अगर इसे बचाना चाहती हो... तो मेरे साथ चलो।"
वैदेही ने बिना एक पल सोचे इंकार कर दिया।
उसने रुद्र का हाथ कसकर पकड़ लिया।
यह देखकर विक्रांत क्रोध से पागल हो उठा।
उसने हवेली के नीचे छिपी रहस्यमयी शक्ति को जगाने का प्रयास किया।
पूरा महल काँपने लगा।
दीवारें टूटने लगीं।
चारों ओर आग फैल गई।
महल में मौजूद एक वृद्ध साधु आगे आए।
उन्होंने ऊँचे स्वर में मंत्रोच्चार शुरू किया।
फिर उन्होंने घोषणा की—
"जब तक सच्चा प्रेम फिर से इस हवेली में नहीं लौटेगा, तब तक रुद्र की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी... और विक्रांत का अंधकार भी समाप्त नहीं होगा।"
दृश्य अचानक समाप्त हो गया।
नैना की आँखों से आँसू बहने लगे।
अब उसे समझ आ चुका था...
यह सिर्फ़ किसी और की कहानी नहीं थी।
किसी न किसी रूप में वह स्वयं भी उस अधूरी कहानी का हिस्सा थी।
उसी समय तहखाने में एक ज़ोरदार धमाका हुआ।
धड़ाम...!
पत्थर की दीवार टूट गई।
घने काले धुएँ के बीच से एक विशाल आकृति धीरे-धीरे बाहर निकलने लगी...
रुद्र ने अपनी तलवार मजबूती से थाम ली।
उसने नैना की ओर देखा और कहा...
"अब फ़ैसला होने का समय आ गया है..."
काले धुएँ से घिरी वह विशाल आकृति धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी।
कुछ ही क्षणों में उसका चेहरा दिखाई दिया।
तेज़ लाल आँखें...
काले वस्त्र...
और होंठों पर एक घमंडी मुस्कान।
"आख़िरकार..." वह ठहाका लगाते हुए बोला, "इतने वर्षों का इंतज़ार आज ख़त्म हुआ।"
नैना ने काँपते स्वर में पूछा,
"क्या... यही विक्रांत है?"
रुद्र ने बिना उसकी ओर देखे उत्तर दिया,
"हाँ... यही वह व्यक्ति है जिसने हमारी ज़िंदगी तबाह कर दी थी।"
विक्रांत ज़ोर से हँसा।
"ज़िंदगी?" उसने व्यंग्य से कहा।
"तुम तो सदियों पहले मर चुके हो, रुद्र। अब तुम्हारे पास बचा ही क्या है?"
रुद्र की आँखों में गुस्से की आग भड़क उठी।
"सच्चा प्रेम कभी नहीं मरता, विक्रांत।"
"और यही तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी है!" विक्रांत गरजा।
इतना कहते ही उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
पूरा तहखाना काले धुएँ से भरने लगा।
पत्थर की दीवारें काँपने लगीं।
नैना को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक रही हो।
तभी उसकी कलाई में पहना चाँदी का कंगन फिर से चमक उठा।
इस बार पहले से भी ज़्यादा तेज़।
रोशनी पूरे तहखाने में फैल गई।
विक्रांत अचानक पीछे हट गया।
"नहीं..." उसने क्रोध से चीखते हुए कहा।
"यह असंभव है!"
नैना की आँखों के सामने फिर एक आख़िरी दृश्य उभरा।
उसने देखा...
आग से घिरे महल में वैदेही रो रही थी।
उसने घायल रुद्र का हाथ पकड़कर कहा था—
"अगर इस जन्म में हम साथ नहीं रह सके... तो मैं लौटूँगी। चाहे कितने भी जन्म लेने पड़ें... मैं अपना वादा ज़रूर निभाऊँगी।"
दृश्य समाप्त होते ही नैना की आँखों से आँसू बह निकले।
अब उसे सब कुछ याद आ चुका था।
उसने रुद्र की ओर देखा।
"मैंने अपना वादा नहीं भुलाया था..."
रुद्र की आँखें नम हो गईं।
सदियों का इंतज़ार जैसे उसी पल ख़त्म हो गया।
लेकिन विक्रांत ने क्रोध में दहाड़ लगाई।
"यह कभी पूरा नहीं होगा!"
वह पूरी शक्ति के साथ उनकी ओर बढ़ा...
और तहखाने की दीवारें एक-एक करके टूटने लगीं।
विक्रांत की हँसी पूरे तहखाने में गूँज उठी।
"रुद्र... तुम आज भी उतने ही कमज़ोर हो। तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत ही तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी है।"
रुद्र ने शांत स्वर में कहा,
"अगर प्रेम कमजोरी है... तो मुझे इस कमजोरी पर गर्व है।"
विक्रांत का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।
उसने अपना हाथ हवा में उठाया।
अचानक काला धुआँ भँवर की तरह घूमने लगा।
कुछ ही क्षणों में उस धुएँ से कई भयानक साए बाहर निकल आए।
उनकी आँखें लाल थीं और हाथों में जंग लगी तलवारें चमक रही थीं।
नैना घबराकर पीछे हट गई।
"ये... ये कौन हैं?"
रुद्र ने तलवार सीधी करते हुए कहा,
"ये विक्रांत की श्रापित सेना है। सदियों से उसकी आज्ञा का पालन कर रही है।"
विक्रांत मुस्कुराया।
"देखते हैं... आज तुम्हारा प्रेम जीतता है या मेरी शक्ति।"
इतना कहते ही उसने हाथ आगे बढ़ाया।
सारी श्रापित आत्माएँ एक साथ रुद्र की ओर झपट पड़ीं।
तहखाने में तलवारों के टकराने की आवाज़ गूँज उठी।
टन्न...!
रुद्र पूरी ताकत से उनका सामना करने लगा।
उधर नैना की नज़र अचानक उसी पत्थर के चबूतरे पर पड़ी।
चबूतरे पर रखी डायरी अपने-आप खुल गई...
और उसके पन्ने तेज़ हवा में अपने-आप पलटने लगे।
आख़िरी पन्ने पर सुनहरे अक्षरों में एक पंक्ति चमक रही थी—
"श्राप का अंत तलवार से नहीं... सच्चे प्रेम के अंतिम वचन से होगा।"
नैना ने वह पंक्ति पढ़ी तो उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
"रुद्र... रुको! हमें लड़ाई नहीं... श्राप को तोड़ना होगा!"
नैना ने काँपते हाथों से डायरी उठाई।
उसने आख़िरी पन्ने को दोबारा पढ़ा।
नीचे छोटे अक्षरों में एक और पंक्ति लिखी थी—
"जिस दिन प्रेम, त्याग और सत्य एक साथ खड़े होंगे... उसी दिन अंधकार का अंत होगा।"
नैना की धड़कन तेज़ हो गई।
उसे अचानक वैदेही की आख़िरी याद पूरी तरह लौट आई।
उसे याद आया कि मरने से ठीक पहले वैदेही ने उस प्राचीन शक्ति को गलत हाथों में जाने से रोकने के लिए अपने रक्त से एक रक्षा-मंत्र पूरा किया था।
लेकिन वह मंत्र अधूरा रह गया था।
इसी कारण न तो रुद्र की आत्मा मुक्त हो सकी और न ही विक्रांत का अंत हुआ।
नैना ने दृढ़ नज़रों से रुद्र की ओर देखा।
"अब मुझे समझ आ गया है... हमें क्या करना होगा।"
रुद्र ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
"तुम्हें सब याद आ गया?"
नैना ने धीरे से सिर हिला दिया।
"हाँ... वैदेही अपना वादा पूरा नहीं कर पाई थी। लेकिन इस जन्म में मैं उस अधूरे वादे को पूरा करूँगी।"
विक्रांत ज़ोर से हँसा।
"बहुत देर हो चुकी है!"
उसने अपनी पूरी शक्ति से एक काला ऊर्जा-गोला नैना की ओर फेंका।
रुद्र बिना एक पल गँवाए उसके सामने आ गया।
ऊर्जा का भयानक प्रहार सीधे रुद्र पर हुआ।
पूरे तहखाने में तेज़ धमाका गूँज उठा।
धुएँ का गुबार छँटा तो रुद्र घुटनों के बल ज़मीन पर था।
उसकी आकृति पहले से कहीं अधिक धुंधली दिखाई देने लगी।
नैना घबराकर उसकी ओर दौड़ी।
"रुद्र...!"
रुद्र ने मुश्किल से मुस्कुराते हुए कहा...
अभी हमारी लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है... रुद्र की बात सुनते ही नैना ने अपने आँसू पोंछ लिए।
उसने गहरी साँस ली और डायरी के आख़िरी पन्ने पर लिखा मंत्र पढ़ना शुरू किया।
जैसे-जैसे उसके होंठों से शब्द निकलते गए, पूरे तहखाने में सुनहरी रोशनी फैलने लगी।
दीवारों पर बने प्राचीन चिन्ह एक-एक करके चमक उठे।
विक्रांत के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी।
"नहीं...!" वह गुस्से से गरजा।
"यह मंत्र दोबारा नहीं पढ़ा जा सकता!"
उसने पूरी शक्ति से नैना को रोकने की कोशिश की, लेकिन इस बार उसके चारों ओर एक चमकता हुआ सुरक्षा-कवच बन चुका था।
विक्रांत के हर वार उस कवच से टकराकर लौट रहे थे।
रुद्र ने अपनी बची हुई ताकत जुटाई और उठ खड़ा हुआ।
उसने तलवार कसकर पकड़ ली।
"अब यह लड़ाई ख़त्म होगी, विक्रांत!"
दोनों एक-दूसरे की ओर बिजली की गति से दौड़े।
तलवारें टकराईं।
टन्न...!
एक तेज़ चमक पूरे तहखाने में फैल गई।
कई वारों के बाद विक्रांत ने छल से रुद्र को पीछे धकेल दिया।
वह नैना की ओर बढ़ा।
"अगर वैदेही फिर से नहीं रहेगी... तो श्राप कभी नहीं टूटेगा!"
इतना कहकर उसने नैना पर हमला करने के लिए हाथ उठाया।
लेकिन उसी क्षण रुद्र उसके सामने आ गया।
वार सीधे रुद्र पर पड़ा।
नैना चीख उठी।
"रुद्र...!"
रुद्र लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
उसकी आत्मा की चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी।
नैना दौड़कर उसके पास पहुँची।
उसने रुद्र का हाथ अपने हाथों में ले लिया।
रुद्र ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"इस बार... मैं अपना वादा निभा सका..."
नैना की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
उसने आँखें बंद कीं और मंत्र की आख़िरी पंक्ति पूरे विश्वास के साथ बोल दी।
अचानक...
पूरा तहखाना सुनहरी रोशनी से भर गया।
एक प्रचंड प्रकाश-स्तंभ आसमान की ओर उठा।
विक्रांत दर्द से चीखने लगा।
उसके चारों ओर फैला काला धुआँ धीरे-धीरे जलकर राख बनने लगा।
"नहीं...! यह नहीं हो सकता...!"
उसकी आवाज़ पूरे तहखाने में गूँजती रही।
और अगले ही पल वह प्रकाश में विलीन हो गया।
सदियों पुराना श्राप आखिरकार टूट चुका था।
तहखाने में फिर से शांति छा गई।
जो अँधेरा सदियों से उस हवेली पर छाया हुआ था, वह धीरे-धीरे मिटने लगा।
दीवारों पर बने प्राचीन चिन्ह अपनी चमक खोने लगे।
नैना की नज़र तुरंत रुद्र पर गई।
वह अब भी ज़मीन पर बैठा था, लेकिन उसकी आकृति धीरे-धीरे पारदर्शी होती जा रही थी।
"रुद्र... यह क्या हो रहा है?" नैना ने घबराकर पूछा।
रुद्र हल्का-सा मुस्कुराया।
"श्राप टूट चुका है... अब मेरी आत्मा को भी मुक्ति मिल रही है।"
नैना की आँखों से आँसू बह निकले।
"नहीं... मैं तुम्हें फिर से नहीं खो सकती।"
रुद्र ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
"तुमने मुझे नहीं खोया, नैना... तुमने मुझे आज़ाद किया है।"
कुछ पल दोनों बिना कुछ कहे एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर रुद्र ने धीमे स्वर में कहा—
"हर प्रेम कहानी का अंत साथ रहना नहीं होता... कुछ प्रेम कहानियाँ किसी की मुक्ति बन जाती हैं।"
नैना के होंठ काँप उठे।
"क्या हम फिर कभी मिलेंगे?"
रुद्र ने आसमान की ओर देखा।
उसके चेहरे पर वर्षों बाद सुकून दिखाई दे रहा था।
"अगर किस्मत ने चाहा... तो ज़रूर। लेकिन इस बार किसी श्राप के कारण नहीं... बल्कि एक नई शुरुआत के लिए।"
इतना कहते ही रुद्र के चारों ओर सुनहरी रोशनी फैलने लगी।
उसकी आकृति धीरे-धीरे प्रकाश में बदलने लगी।
नैना ने आख़िरी बार उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की...
लेकिन उसकी उँगलियों से सिर्फ़ रोशनी फिसलकर गुज़र गई।
कुछ ही क्षणों बाद...
रुद्र पूरी तरह उस प्रकाश में विलीन हो गया।
पूरा तहखाना शांत हो गया।
नैना अकेली खड़ी थी।
उसने आँखें बंद कीं और हल्की-सी मुस्कान के साथ फुसफुसाई—
"इस बार... हमारा वादा अधूरा नहीं रहेगा।"
उसी समय हवेली की टूटी हुई खिड़कियों से सुबह की पहली किरण भीतर आई।
सदियों से बंद पड़े दरवाज़े अपने-आप खुलने लगे।
हवेली पर छाया अँधेरा हमेशा के लिए समाप्त हो चुका था।
नैना ने आख़िरी बार पीछे मुड़कर उस जगह को देखा जहाँ रुद्र खड़ा था।
वहाँ अब सिर्फ़ एक चाँदी का कंगन रखा था।
उसने उसे उठाकर अपनी हथेली में कस लिया।
फिर एक गहरी साँस लेकर हवेली से बाहर निकल गई।
गंगा के घाट पर पहुँचते ही सूरज की पहली किरणें पानी पर बिखर गईं।
नैना के चेहरे पर दर्द भी था और सुकून भी।
उसे पता था कि एक कहानी समाप्त हुई है...
लेकिन शायद किसी नई कहानी की शुरुआत भी यहीं से होने वाली है।

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