भागदौड़

FamilyDramaShort-Stories
Aug 04, 2026
Listen to storyNarrated by VITI
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मुकेश एक संपन्न परिवार से था।

उसकी ज़िंदगी एक तयशुदा दिनचर्या में बंधी हुई थी—हर सुबह घर से ऑफिस और हर शाम ऑफिस से घर। उसके पास दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसकी ज़िंदगी में ठहराव इतना था कि हर दिन पिछले दिन जैसा ही लगता था। मुकेश की शादी को दस साल हो चुके थे। उसकी पत्नी का नाम अनुराधा था। उनके दो बच्चे थे—निया और नव्या। बाहर से देखने पर उनका परिवार हर मायने में खुशहाल लगता था, लेकिन सच यह था कि वे जी नहीं रहे थे, बस ज़िंदगी काट रहे थे। रोज़ वही दिनचर्या, वही ज़िम्मेदारियाँ और वही भागदौड़... समय के साथ उनके रिश्ते में अपनापन कहीं पीछे छूट गया था।

मुकेश एक बड़ी कंपनी में चीफ़ एग्जीक्यूटिव के पद पर कार्यरत था। उसकी ज़िंदगी एक तयशुदा दिनचर्या में बंध चुकी थी—हर सुबह ऑफिस जाना और हर शाम घर लौट आना। वह अपने काम में बेहद ईमानदार और कुशल था, इसलिए उसे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं हुई।

उसके पास एक खुशहाल परिवार था, सम्मान था, अच्छा पद था और धन-दौलत भी। बाहर से देखने वाले हर व्यक्ति को उसकी ज़िंदगी मुकम्मल लगती थी।

लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

मुकेश खुश नहीं था। लोगों की भीड़ के बीच रहकर भी वह भीतर से अकेला था। उसके चेहरे पर मुस्कान तो थी, मगर दिल में एक ऐसी ख़ामोशी थी जिसे कोई सुन नहीं पाता था।

जब भी मुकेश किसी परिवार को अपने बच्चों के साथ हँसते, खेलते और सुकून के पल बिताते देखता, तो उसका दिल भीतर ही भीतर टूट जाता। उसकी आँखें नम हो जातीं। उसके पास भी पत्नी थी, बच्चे थे, सब कुछ था... फिर भी उसे लगता था कि वह अपने ही परिवार से कहीं दूर होता जा रहा है।

भागदौड़ भरी ज़िंदगी ने उससे उसके अपनों के साथ बिताने वाला समय चुरा लिया था। वह रोज़ उनके लिए कमाता था, लेकिन उनके साथ जी नहीं पा रहा था।

एक दिन ऑफिस से लौटने के बाद मुकेश यूँ ही कुछ देर टहलने के लिए छत पर चला गया। न जाने कितने वर्षों बाद उसने अपने लिए कुछ पल निकाले थे।

वह धीरे-धीरे छत पर टहलने लगा। चारों ओर नज़र दौड़ाई तो उसे लगा मानो यह वही छत नहीं, बल्कि कोई अनजान जगह हो। सब कुछ परिचित होकर भी अजनबी-सा लग रहा था।

उसने महसूस किया कि भागदौड़ भरी ज़िंदगी ने उससे सिर्फ़ समय ही नहीं छीना, बल्कि अपने ही घर और उससे जुड़ी छोटी-छोटी खुशियों से भी उसे दूर कर दिया था।

जैसे ही मुकेश छत से नीचे उतरा, अनुराधा ने रसोई से आवाज़ लगाई,

“सुनिए जी, आपकी चाय बन गई है। पहले चाय पी लीजिए, फिर मैं खाना लगा देती हूँ।”

मुकेश बिना कुछ कहे कुर्सी पर जाकर बैठ गया। उसने चाय का कप हाथ में तो लिया, लेकिन उसकी नज़रें कहीं खोई हुई थीं। अनुराधा ने उसकी ख़ामोशी को महसूस तो किया, मगर रोज़ की तरह इस बार भी कुछ नहीं पूछा।

एक दिन मुकेश के ऑफिस की छुट्टी थी। उस दिन वह रोज़ की तुलना में देर से उठा। नींद से उठकर वह सीधे आईने के सामने जाकर खड़ा हो गया।

कुछ पल तक वह ख़ुद को निहारता रहा। फिर उसके होंठों से अनायास निकला—

“क्या... ये मैं हूँ?”

आईने में उसे अपना चेहरा तो दिख रहा था, लेकिन वह चेहरा थका हुआ था। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे, माथे पर चिंता की लकीरें और चेहरे पर वर्षों से खोई हुई मुस्कान...

उसे पहली बार एहसास हुआ कि भागदौड़ ने उससे सिर्फ़ उसका समय नहीं, बल्कि उसकी पहचान भी छीन ली थी।

मुकेश अपने कॉलेज के दिनों में बहुत हँसमुख लड़का था। वह ज़िंदगी के हर पल को खुलकर जीना चाहता था। उसके चेहरे की मुस्कान जैसे हर किसी का दिन ख़ूबसूरत बना देती थी।

राज और सुहानी उसके सबसे क़रीबी दोस्त थे। समय के साथ मुकेश और सुहानी की दोस्ती प्यार में बदल गई। दोनों ने साथ मिलकर एक सुंदर भविष्य के अनगिनत सपने देखे थे।

जब भी राज मुस्कुराते हुए मुकेश से पूछता, “क्या तुम सच में सुहानी से शादी करोगे?”

मुकेश बिना एक पल सोचे हँसकर कहता,

“हाँ... मैं शादी भी सुहानी से ही करूँगा, और अपने हर सपने को उसके साथ मिलकर पूरा करूँगा।”

राज मुस्कुरा देता। फिर दोनों हँसते-बातें करते हुए अपनी कक्षा की ओर बढ़ जाते। उन्हें क्या पता था कि ज़िंदगी ने उनके लिए कुछ और ही कहानी लिख रखी है।

लेकिन शायद ज़िंदगी ने मुकेश के लिए कुछ और ही लिख रखा था।

परिवार के दबाव और परिस्थितियों के आगे उसे झुकना पड़ा। न चाहते हुए भी उसने अनुराधा से शादी कर ली।

अनुराधा एक अच्छी जीवनसंगिनी थी। वह मुकेश का पूरा ख़याल रखती, उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखती और पूरे मन से परिवार को संभालती थी। उसने अपने रिश्ते में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी।

फिर भी मुकेश के भीतर एक ऐसा खालीपन था, जिसे अनुराधा की मोहब्बत भी भर नहीं पा रही थी। समस्या अनुराधा में नहीं थी, बल्कि उन अधूरे सपनों और बीते हुए रिश्तों में थी, जिन्हें मुकेश आज तक अपने दिल से विदा नहीं कर पाया था।

मुकेश को आज भी वह दिन अच्छी तरह याद था, जब वह पहली बार अनुराधा को देखने उसके घर गया था।

पूरा परिवार बातचीत में व्यस्त था। कुछ ही देर बाद अनुराधा चाय की ट्रे लेकर कमरे में आई। सभी की नज़रें उस पर थीं, लेकिन मुकेश ने एक बार भी उसकी ओर नज़र उठाकर नहीं देखा।

उसका मन वहाँ था ही नहीं। उसका दिल अब भी अतीत की उन यादों में उलझा हुआ था, जहाँ उसने अपनी पूरी ज़िंदगी किसी और के साथ बिताने का सपना देखा था।

शादी के बाद मुकेश और अनुराधा एक ही छत के नीचे, एक ही रिश्ते में बंध गए। समय के साथ दोनों एक-दूसरे के क़रीब भी आए, लेकिन मुकेश के भीतर का खालीपन कभी नहीं भर सका।

वह अपनी हर ज़िम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाता था—एक अच्छा पति, एक ज़िम्मेदार पिता और अपने परिवार का सहारा बनकर। फिर भी उसके दिल के किसी कोने में एक अधूरापन हमेशा ज़िंदा रहा।

कभी-कभी इंसान के पास सब कुछ होते हुए भी वह उस एक एहसास की कमी महसूस करता है, जिसे न समय भर पाता है और न ही परिस्थितियाँ।

समय बीतता गया। देखते ही देखते साल गुज़रते चले गए। मुकेश और अनुराधा भी ज़िंदगी की भागदौड़ में ऐसे उलझ गए कि कब दिन महीनों में और महीने वर्षों में बदल गए, उन्हें एहसास ही नहीं हुआ।

ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती गईं, सपने पीछे छूटते गए और दोनों बस एक तयशुदा दिनचर्या के साथ जीते रहे। वे साथ तो थे, लेकिन कहीं न कहीं ज़िंदगी को महसूस करना भूल चुके थे।

मुकेश अपनी बेटियों, निया और नव्या, को भी ज़्यादा समय नहीं दे पाता था। सुबह उनके जागने से पहले वह ऑफिस के लिए निकल जाता और रात तक थका-हारा घर लौटता। जब तक उसके पास बैठने का समय होता, तब तक दोनों मासूम बेटियाँ नींद की आगोश में जा चुकी होतीं।

धीरे-धीरे उनके बचपन की अनगिनत छोटी-छोटी यादें मुकेश की भागदौड़ भरी ज़िंदगी से छूटती चली गईं।

एक दिन नव्या के स्कूल से “मेरा परिवार” विषय पर बनाई गई ड्रॉइंग घर आई। अनुराधा मुस्कुराते हुए वह चित्र मुकेश को दिखाने लगी।

मुकेश ने ड्रॉइंग पर नज़र डाली। उसमें अनुराधा, निया और नव्या एक-दूसरे का हाथ थामे मुस्कुरा रही थीं। लेकिन उसकी नज़र बार-बार एक खाली जगह पर जाकर ठहर गई।

वह हल्की मुस्कान के साथ बोला, “अरे बेटा... इसमें पापा कहाँ हैं?”

नव्या ने मासूमियत से जवाब दिया, “पापा, आप तो हमेशा ऑफिस में होते हो ना... इसलिए मैंने आपकी जगह आपका लैपटॉप और बैग बना दिया।”

मुकेश की मुस्कान पल भर में फीकी पड़ गई। उसके हाथ काँपने लगे। उसने फिर से उस चित्र को देखा। सचमुच... जहाँ एक पिता होना चाहिए था, वहाँ सिर्फ़ एक लैपटॉप और एक ऑफिस बैग बना था।

उस दिन पहली बार मुकेश को एहसास हुआ कि वह अपने परिवार के लिए सब कुछ कमाने की कोशिश में, अपने ही परिवार की सबसे कीमती यादों से दूर होता जा रहा था।

उसकी आँखें भर आईं। उसे लगा, भागदौड़ में उसने पैसे तो बहुत कमाए, लेकिन अपनी बेटियों के बचपन के अनमोल पल कहीं पीछे छोड़ दिए।

एक शाम मुकेश अपने घर की छत पर बैठा कॉफी पी रहा था। उसकी नज़र अचानक सड़क पर गई।

एक व्यक्ति अपने दोनों बच्चों को कंधों पर बैठाकर हँसते-खेलते टहल रहा था। बच्चे खिलखिलाकर हँस रहे थे और वह व्यक्ति भी उनके साथ बिल्कुल एक बच्चे की तरह मस्ती कर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो वह अपने बच्चों के साथ अपना खोया हुआ बचपन फिर से जी रहा हो।

मुकेश कुछ देर तक उन्हें देखता रहा। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन अगले ही पल उसकी आँखें नम हो गईं।

उसने मन ही मन सोचा—

“ज़रूरी नहीं कि ज़िंदगी हमारी हर इच्छा पूरी करे। कुछ सपने अधूरे रह जाते हैं, और उन्हें स्वीकार करना ही पड़ता है। लेकिन इस भागदौड़ में... मैंने तो अपने ही बच्चों का बचपन पीछे छोड़ दिया।”

उस पल मुकेश को पहली बार समझ आया कि पैसे कमाने की दौड़ में वह उन पलों से दूर हो गया था, जो ज़िंदगी की असली दौलत थे। उस दिन उसने मन ही मन ठान लिया कि अब वह सिर्फ़ अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के साथ भी जिएगा।

कुछ दिनों बाद निया को तेज़ बुखार हो गया। हमेशा की तरह मुकेश ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था, लेकिन जैसे ही उसने निया का तपता हुआ माथा छुआ, उसके कदम वहीं रुक गए।

उसने बिना एक पल सोचे अपने ऑफिस में छुट्टी की सूचना दे दी।

पूरा दिन वह निया के सिर पर ठंडी पट्टियाँ रखता रहा, समय पर दवा देता, उसे कहानियाँ सुनाता और उसके पास बैठा रहता। कई वर्षों बाद निया ने अपने पापा को पूरे दिन अपने साथ देखा था।

शाम को जब बुखार थोड़ा कम हुआ, निया ने मुस्कुराते हुए मुकेश का हाथ पकड़ लिया और धीमे से बोली,

“पापा... आज आप ऑफिस नहीं गए?”

मुकेश ने उसकी ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा,

“नहीं बेटा... आज मेरे लिए सबसे ज़रूरी काम तुम्हारे पास रहना था।”

निया की छोटी-सी मुस्कान ने मुकेश को वह सुकून दिया, जो उसे वर्षों की भागदौड़ में कभी नहीं मिला था।

यह सब देखकर अनुराधा की आँखें नम हो गईं। उसने चुपचाप मुकेश को निया के पास बैठे देखा। वर्षों बाद उसने उसके चेहरे पर सुकून देखा था।

उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही मुकेश है, जो कभी काम के अलावा किसी और चीज़ के लिए समय नहीं निकाल पाता था। आज वही मुकेश अपनी बेटी को दवा पिला रहा था, उसके सिर पर हाथ फेर रहा था और उसके साथ बैठकर मुस्कुरा रहा था।

अनुराधा के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।

शायद पहली बार उसे लगा कि उनका घर सिर्फ़ एक साथ रहने की जगह नहीं रहा, बल्कि फिर से एक परिवार बन रहा है। अब मुकेश सिर्फ़ ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा रहा था, बल्कि अपने अपनों के साथ जीना भी सीख रहा था।

तभी मुकेश की नज़र अनुराधा पर पड़ी। उसकी आँखों में खुशी और वर्षों का दर्द एक साथ छलक रहा था।

मुकेश धीरे-धीरे उसके पास गया और बिना कुछ कहे उसे गले लगा लिया।

कुछ पल की ख़ामोशी के बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा,

“अनुराधा... मुझे माफ़ कर दो। मैं घर की ज़िम्मेदारियाँ निभाने में इतना उलझ गया कि अपनों के साथ जीना ही भूल गया। अब मैं वादा करता हूँ कि चाहे काम कितना भी ज़रूरी क्यों न हो, मैं अपने परिवार के लिए समय ज़रूर निकालूँगा। क्योंकि अब समझ आया है कि घर सिर्फ़ कमाए हुए पैसों से नहीं, साथ बिताए हुए पलों से बसता है।”

अनुराधा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस मुस्कुराते हुए मुकेश का हाथ थाम लिया। उस एक स्पर्श में शिकायतें भी थीं, माफ़ी भी थी और एक नई शुरुआत की उम्मीद भी।

उस दिन के बाद मुकेश की ज़िंदगी की भागदौड़ खत्म नहीं हुई, लेकिन उसने उस भागदौड़ में अपने परिवार का हाथ कभी नहीं छोड़ा।

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Neetu its
1 weeks ago

nice story 😀