मलाल

WomenFamilyDramaMotivationalShort-Stories
Aug 24, 2026
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आज सुधा अपनी अलमारी साफ कर रही थी। पुराने कपड़ों और कुछ बेकार कागज़ों के बीच उसे एक पुरानी-सी फाइल दिखाई दी। उसने फाइल उठाई, उस पर जमी धूल साफ की और जैसे ही उसे खोला, उसके अंदर कुछ ऐसे सपने बंद मिले, जिन्हें उसने कभी बड़ी शिद्दत से देखा था।

एक-एक करके उन कागज़ों को देखते हुए सुधा उन सपनों को याद करने लगी।

वो सपने, जो कभी उसकी आँखों में जिंदा थे, आज उसी फाइल के पन्नों में सिमटकर रह गए थे।

सुधा कुछ देर तक उन्हें देखती रही। उसकी आँखों में नमी थी और दिल में एक अजीब-सा मलाल।

सुधा ने जैसे ही फाइल खोली, सबसे पहले उसकी नजर अपने स्कूल की एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर में उसका बचपन मुस्कुरा रहा था—वही खिलखिलाता चेहरा, आँखों में अनगिनत सपने और चेहरे पर बेफिक्री।

तस्वीर के अगले पन्ने पर दोस्तों के साथ बिताए उन खूबसूरत पलों की तस्वीरें थीं। कभी जो दोस्त हर दिन साथ हुआ करते थे, आज सब अपनी-अपनी दुनिया में रम गए थे।

सुधा तस्वीरों को पलटती रही और सोचती रही—

कभी जिन लोगों के बिना एक दिन भी अधूरा लगता था, आज उनसे मिलने के लिए भी सालों का इंतजार करना पड़ता है।

वह तस्वीरों को देर तक निहारती रही।

शायद जिंदगी भी कितनी अजीब है…

जो पल कभी हमारी पूरी दुनिया हुआ करते थे, वही पल एक दिन किसी बंद फाइल में या किसी शोकेस में सजी तस्वीरों की तरह सिर्फ यादें बनकर रह जाते हैं।

सुधा अब चालीस साल की हो चुकी थी। दो बच्चों की माँ और अपने परिवार की जिम्मेदारियों में पूरी तरह रम चुकी थी। लेकिन उस दिन अलमारी साफ करते हुए जैसे-जैसे वह पुरानी फाइल के पन्ने पलट रही थी, उसकी पूरी जिंदगी उसकी आँखों के सामने किसी चलचित्र की तरह घूमने लगी।

स्कूल की तस्वीर के बाद उसे अपनी हाई स्कूल की मार्कशीट दिखाई दी। उसने उसे हाथ में लिया और कुछ देर तक बिना पलक झपकाए उसे देखती रही।

उस मार्कशीट के पीछे सिर्फ उसके नंबर नहीं थे, बल्कि उसके एक पुराने सपने की शुरुआत भी छिपी थी।

यही वह समय था, जब सुधा ने पहली बार फैशन डिजाइनर बनने का सपना देखा था।

वह अक्सर अपने परिवार से कहा करती थी,

“मैं आगे चलकर फैशन डिजाइनर बनूँगी। आप लोग मुझे वही पढ़ने देंगे, जो मैं पढ़ना चाहती हूँ।”

उस समय उसके भीतर अपने सपने को पूरा करने का जुनून था। उसे लगता था कि उसका परिवार उसका साथ देगा और एक दिन वह अपने नाम से पहचानी जाएगी।

उसे कहाँ पता था कि जिंदगी धीरे-धीरे उसके सपनों के ऊपर जिम्मेदारियों की इतनी परतें चढ़ा देगी कि एक दिन वही सपने किसी पुरानी फाइल में बंद होकर रह जाएँगे।

हाई स्कूल के बाद सुधा ने ग्यारहवीं कक्षा में विज्ञान वर्ग लिया। उसे पढ़ाई में हमेशा से रुचि थी और वह आगे चलकर अपने सपने की ओर बढ़ना चाहती थी।

लेकिन एक दिन उसके घरवालों ने उससे बिना उसकी इच्छा पूछे फैसला सुना दिया—

“तुम आगे गणित वर्ग से पढ़ोगी।”

सुधा ने पहली बार अपने परिवार के इस फैसले के सामने खुद को असहाय महसूस किया। उसने सोचा था कि उसके घर में उसे पूरी आजादी है। वह अक्सर लोगों से कहा करती थी कि उसके परिवार ने उसे कभी किसी चीज के लिए नहीं रोका, उसे जो पढ़ना है, वह पढ़ सकती है।

लेकिन उस दिन उसका यह भ्रम पहली बार टूटा।

उसे एहसास हुआ कि आजादी सिर्फ उतनी ही थी, जितनी उसके परिवार ने उसके लिए तय की थी।

उसकी इच्छा क्या थी, उसका सपना क्या था—यह पूछना शायद किसी को जरूरी नहीं लगा।

सुधा चुप रही।

शायद यही उसकी जिंदगी का पहला ऐसा मोड़ था, जहाँ उसने अपने मन की बात कहना चाही थी… लेकिन उसकी आवाज उसके ही घर की दीवारों के बीच कहीं दबकर रह गई।

सुधा के पिता, रमेश जी, भी अक्सर लोगों से बड़े गर्व से कहा करते थे,

“मेरी बेटी बहुत अच्छी है।”

और शायद सुधा ने भी पूरी कोशिश की थी कि वह अपने पिता की उस “अच्छी बेटी” की परिभाषा पर खरी उतर सके।

ग्यारहवीं कक्षा उसने पूरी मेहनत से पास कर ली। दोस्तों के साथ हँसते-खेलते, पढ़ते और छोटी-छोटी खुशियाँ बाँटते हुए पता ही नहीं चला कि पूरा साल कब बीत गया।

उस उम्र में अभी इतनी समझ कहाँ थी कि हर छोटी बात के पीछे छिपे बड़े अर्थ को समझ सके। बचपना था, इसलिए उसने घरवालों की बात मान ली।

शायद उसने उस समय अपने मन को यह समझा लिया था कि माता-पिता जो कर रहे हैं, अच्छे के लिए ही कर रहे होंगे।

और धीरे-धीरे वह बात उसके मन से धुंधली भी पड़ गई।

वह अपने दोस्तों के साथ फिर उसी तरह हँसने लगी, पढ़ाई में व्यस्त हो गई और जिंदगी आगे बढ़ती रही।

उसे कहाँ पता था कि कुछ फैसले उस समय भले ही छोटे लगें, लेकिन उनका असर बहुत दूर तक जाता है।

बारहवीं कक्षा सुधा की जिंदगी का एक यादगार पड़ाव थी। उस उम्र की छोटी-छोटी बातें भी आज उसकी यादों में बिल्कुल ताजा थीं।

तीसरे पीरियड में ही लंच से पहले चुपके से टिफिन खोल लेना, दोस्तों के साथ बैठकर पढ़ाई करना, फिर पढ़ाई से ज्यादा अपने भविष्य और सपनों की बातें करना—क्योंकि बारहवीं के बाद तो उन्हें अपने-अपने सपनों की ओर कदम बढ़ाना था।

निहारिका, अंजलि, रीवा और वीणा—सुधा की ये चारों सहेलियाँ उसके लिए बहुत खास थीं। सभी ने बारहवीं की परीक्षा के लिए खूब मेहनत की थी।

लेकिन सुधा और निहारिका की दोस्ती कुछ अलग ही थी। दोनों के बीच एक ऐसा अपनापन था, जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल था। वे सिर्फ सहेलियाँ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सपनों और डर की साथी थीं।

आखिरकार परीक्षा का परिणाम आया।

सुधा और निहारिका दोनों प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुईं।

उस दिन सभी के चेहरे खुशी से खिले हुए थे। उन्हें लग रहा था कि अब असली सफर शुरू होगा।

बारहवीं तक पहुँचते-पहुँचते सुधा को अपने सपने का रास्ता भी साफ दिखाई देने लगा था।

अब उसे बस अपने सपने की ओर एक कदम बढ़ाना था।

सुधा ने बारहवीं के बाद आखिरकार तय कर लिया था कि वह फैशन डिजाइनर बनेगी। इतने सालों से उसके मन में पल रहा सपना अब उसे अपने बिल्कुल करीब दिखाई दे रहा था।

उसने सबसे पहले निहारिका को अपने फैसले के बारे में बताया।

निहारिका ने मुस्कुराते हुए कहा,

“और मैं आईटी फील्ड में जाऊँगी। कुछ अलग करना है मुझे।”

दोनों सहेलियाँ अपने-अपने सपनों को लेकर बहुत उत्साहित थीं। उन्हें लगता था कि अब कोई उन्हें उनके सपनों तक पहुँचने से नहीं रोक सकता।

लेकिन जब सुधा ने घर में अपने मन की बात बताई, तो इस बार भी उसकी इच्छा नहीं पूछी गई।

घरवालों ने साफ कह दिया,

“तुम बी.एससी. करोगी और उसके बाद सरकारी नौकरी की तैयारी करोगी।”

सुधा कुछ पल चुप रही।

उसे लगा जैसे उसके सामने फिर वही दीवार खड़ी हो गई हो, जिससे वह बचपन से टकराती आ रही थी।

दूसरी ओर, निहारिका के सपने भी आसान नहीं थे। वह आईटी फील्ड में जाना चाहती थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति उसके रास्ते में आ गई। पढ़ाई और आगे की जरूरतों का खर्च उठाना उसके परिवार के लिए आसान नहीं था।

जिस मंजिल की तरफ दोनों सहेलियाँ साथ चलने का सपना देख रही थीं, जिंदगी ने दोनों के रास्ते अलग-अलग कर दिए।

सुधा का सपना परिवार की इच्छा के नीचे दब गया था, और निहारिका का सपना आर्थिक मजबूरी के नीचे।

सुधा के परिवार की भी अपनी मजबूरियाँ थीं। उनका कहना था कि उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे सुधा को किसी दूसरे शहर भेजकर उसकी पढ़ाई का खर्च उठा सकें।

सुधा ने उस दिन पहली बार अपने सपने से ज्यादा अपने परिवार की परिस्थितियों को समझने की कोशिश की। उसे पता था कि उसके माता-पिता जानबूझकर उसके सपने नहीं तोड़ रहे थे, बल्कि उनकी अपनी सीमाएँ थीं।

इसलिए उसने अपने मन को समझाया और बी.एससी. में दाखिला ले लिया।

शायद उसे लगा था कि यह सिर्फ कुछ सालों की बात है। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह कोई रास्ता निकाल लेगी और अपने सपने को फिर से जी पाएगी।

निहारिका ने भी परिस्थितियों को समझते हुए बी.एससी. में दाखिला ले लिया।

दोनों सहेलियाँ एक बार फिर एक ही राह पर थीं।

बस इस बार उनकी आँखों में पहले जैसी चमक नहीं थी।

सपने अभी मरे नहीं थे…

बस उन्होंने उन्हें कुछ समय के लिए एक तरफ रख दिया था।

सुधा बी.एससी. में दाखिला तो ले चुकी थी, लेकिन उसका मन उस पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था। वह हर दिन कॉलेज जाती, किताबें खोलती, पढ़ाई करती, लेकिन उसके भीतर कहीं न कहीं वही पुराना सपना अब भी जिंदा था।

फैशन डिजाइनिंग का सपना बार-बार उसके मन में लौट आता।

निहारिका भी अपनी पढ़ाई और भविष्य को लेकर उलझी हुई थी। दोनों ने किसी तरह बी.एससी. का एक साल पूरा किया, लेकिन शायद वह राह उनके लिए थी ही नहीं।

आखिरकार दोनों ने बी.एससी. छोड़ने का फैसला किया और बी.ए. में दाखिला ले लिया।

एक बार फिर दोनों सहेलियाँ साथ थीं।

उन्हें लगा कि शायद यही सही रास्ता है।

लेकिन सुधा के मन में कहीं एक सवाल अब भी बाकी था—

“क्या मैं कभी अपने उस सपने तक पहुँच पाऊँगी, जिसे मैंने इतनी आसानी से छोड़ दिया था?”

सुधा के मन में एक और बहुत बड़ा डर था—शादी का डर।

वह शादी के खिलाफ नहीं थी, लेकिन वह अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चाहती थी। वह अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थी, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी और सबसे बढ़कर, अपनी आजादी को खोना नहीं चाहती थी।

लेकिन उसके परिवार ने उसकी इस इच्छा को शायद कभी उतनी गंभीरता से नहीं समझा।

ग्रेजुएशन के पहले साल से ही घर में उसकी शादी की बातें शुरू हो गईं।

कभी कोई रिश्ता आता, कभी किसी रिश्तेदार का जिक्र होता तो कभी उससे कहा जाता—

“अब शादी के बारे में भी सोचना चाहिए।”

सुधा हर बार किसी न किसी बहाने से बात टाल देती।

उसके लिए शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं थी। उसके मन में यह डर था कि कहीं शादी के बाद उसकी अपनी पहचान, उसके सपने और उसकी आजादी उससे दूर न हो जाएँ।

वह अक्सर सोचती—

“क्या शादी के बाद भी मैं वही सुधा रह पाऊँगी, जो अपने सपनों के बारे में सोचती थी?”

और शायद इसी सवाल का जवाब उसे खुद भी नहीं पता था।

सपनों का बार-बार टूटना और शादी का डर, कब सुधा के भीतर एक विद्रोह बन गया, उसे खुद भी पता नहीं चला।

वह अक्सर अकेले में सोचती—

क्या अच्छी लड़की होने का मतलब यही होता है कि वह अपने सपनों और इच्छाओं को मार दे?

क्या अपने लिए आवाज न उठाना ही अच्छाई है?

क्या हर गलत बात को चुपचाप मान लेना ही एक अच्छी लड़की की पहचान है?

सुधा के मन में इन सवालों का शोर बढ़ता जा रहा था।

जिस लड़की ने हमेशा अपने पिता को यह कहते सुना था कि “मेरी बेटी बहुत अच्छी है,” वही लड़की अब पहली बार अपनी अच्छाई की परिभाषा पर सवाल उठा रही थी।

उसे समझ आने लगा था कि शायद दूसरों की खुशी के लिए खुद को लगातार पीछे करते रहना अच्छाई नहीं है।

और एक दिन उसने आईने में खुद को देखा और मन ही मन कहा—

“Don’t be a good girl, Sudha…

Don’t be a good girl.”

शायद उसी दिन उसके भीतर की वह लड़की, जो हमेशा सबकी उम्मीदों पर खरी उतरने की कोशिश करती रही थी, पहली बार अपने लिए जीने की हिम्मत जुटा रही थी।

लेकिन सुधा यह भी जानती थी कि बाहर की दुनिया से लड़ना उसके लिए उतना मुश्किल नहीं था, जितना अपने ही घरवालों से लड़ना।

वह किसी अजनबी के सामने अपने लिए आवाज उठा सकती थी, गलत बात का विरोध कर सकती थी, लेकिन जब बात अपनों की आती, तो उसके शब्द जैसे उसके भीतर ही कहीं अटक जाते।

आखिरकार सुधा और निहारिका ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर ली। दोनों के रास्ते अब एक बार फिर आगे बढ़ने वाले थे। दोनों ने तय किया कि अब वे मास्टर डिग्री करेंगी।

निहारिका ने किसी दूसरे कॉलेज में दाखिला ले लिया और सुधा ने भी अपनी आगे की पढ़ाई के लिए एक अलग जगह चुन ली।

कॉलेज अलग हुए तो मुलाकातें कम होने लगीं। पहले जो बातें हर दिन होती थीं, अब कभी-कभी होने लगीं। फिर कभी-कभी से कई दिनों का अंतर आने लगा।

दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त होती चली गईं।

शायद उन्हें तब एहसास भी नहीं था कि दोस्ती में दूरी सिर्फ रास्तों की नहीं होती… कभी-कभी वही दूरी रिश्तों के बीच भी जगह बना देती है।

और शायद यही दूरी धीरे-धीरे उनकी दोस्ती में भी दरार डालने वाली थी।

सुधा ने तय कर लिया था कि वह मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद पीएच.डी. करेगी। इस बार उसने अपने भविष्य को लेकर एक सपना नहीं, बल्कि एक पूरा रास्ता सोच लिया था।

लेकिन एक बार फिर उसके सामने उसका परिवार खड़ा था।

हर रोज शादी की बातें सुनते-सुनते वह पहले ही परेशान हो चुकी थी। ऊपर से जब उसने अपनी आगे की पढ़ाई और पीएच.डी. की बात की, तो घरवालों ने उसकी इच्छा के बजाय उसके लिए एक और रास्ता तय कर दिया—

“पीएच.डी. की जगह बी.एड. कर लो।”

उस दिन सुधा को न जाने क्यों बहुत हारा हुआ महसूस हुआ।

उसे लगा जैसे वह जितनी बार अपने लिए कुछ तय करती है, उतनी ही बार परिस्थितियाँ उसके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं।

एक तरफ उसके मन में पीएच.डी. करने का सपना था और दूसरी तरफ परिवार की उम्मीदें।

वह चुप थी।

उसी समय निहारिका ने उसे समझाते हुए कहा,

“मुझे तो टीचर बनना है, इसलिए मैं बी.एड. करूँगी। लेकिन अगर तुम बी.एड. नहीं करना चाहती हो, तो मत करो। अपने मन की पढ़ाई करो।”

सुधा ने निहारिका की बात सुनी, लेकिन इस बार भी उसके भीतर वही पुराना डर था।

अपनों के सामने अपने लिए खड़े होने का डर।

शायद इसी डर ने उसे एक बार फिर चुप रहने पर मजबूर कर दिया।

सुधा ने मन मारकर बी.एड. की प्रवेश परीक्षा दी और उसका चयन एक कॉलेज में हो गया। लेकिन परिणाम आने के बाद भी उसके भीतर कोई खुशी नहीं थी।

उसका मन बार-बार यही कह रहा था कि वह बी.एड. नहीं करना चाहती।

लेकिन परिवार का दबाव इतना था कि आखिरकार उसने बी.एड. में दाखिला ले लिया।

उसने पढ़ाई शुरू कर दी। रोज कॉलेज जाती, किताबें खोलती, पढ़ती और परीक्षाएँ देती। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता था, लेकिन उसके भीतर कुछ भी सामान्य नहीं था।

उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था।

फिर भी वह करती रही।

क्योंकि अब उसके पास लड़ने की ताकत नहीं बची थी।

एक समय था जब सुधा अपने भविष्य को लेकर बड़े-बड़े सपने देखा करती थी। फैशन डिजाइनर बनने का सपना, पीएच.डी. करने का सपना और अपनी पहचान बनाने का सपना…

लेकिन अब उसने सपने देखना ही छोड़ दिया था।

शायद बार-बार अपने सपनों को टूटते देखने के बाद इंसान सपने देखना नहीं छोड़ता…

वह बस उनसे उम्मीद करना छोड़ देता है।

सुधा की जिंदगी चल रही थी, लेकिन उसे ऐसा लगता था जैसे वह अपनी जिंदगी जी ही नहीं रही।

जैसे यह जिंदगी उसकी थी ही नहीं।

बी.एड. पूरा करने के बाद सुधा ने धीरे-धीरे अपने परिवार से दूरी बनानी शुरू कर दी। वह घर में ही रहती थी, लेकिन अब किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी।

जो सुधा कभी छोटी-छोटी बातों पर घर में हँसती थी, दोस्तों के साथ घंटों बातें करती थी, वही अब ज़्यादातर चुप रहती।

घर में कोई उससे कुछ पूछता तो वह बस उतना ही जवाब देती, जितना जरूरी होता।

यहाँ तक कि उसने निहारिका से भी बात करना लगभग बंद कर दिया था।

निहारिका कई बार उसे फोन करती, संदेश भेजती, लेकिन सुधा के पास कहने के लिए कुछ नहीं होता था।

असल में उसके भीतर बहुत कुछ था, लेकिन वह किसी से कुछ कह नहीं पाती थी।

अब वह न शिकायत करती थी, न अपने सपनों की बात करती थी और न ही भविष्य के बारे में सोचती थी।

वह बस शांत रहती थी।

इतनी शांत कि कभी-कभी उसके अपने लोग भी समझ नहीं पाते थे कि उस खामोशी के पीछे कितनी सारी अधूरी बातें दबी हुई हैं।

सुधा ने छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। वह चाहती थी कि अपने छोटे-मोटे खर्चों के लिए उसे हर बार परिवार के सामने हाथ न फैलाना पड़े।

शुरुआत में उसके पास कुछ ही बच्चे आए। वह उन्हें पढ़ाती, उनकी कॉपियाँ जाँचती और उनकी छोटी-छोटी गलतियाँ ठीक करवाती।

इन बच्चों के साथ समय बिताते हुए उसे अच्छा लगता था। शायद इसलिए नहीं कि उसे पढ़ाना पसंद था, बल्कि इसलिए कि इन बच्चों के बीच रहकर उसे कुछ देर के लिए अपनी ही उलझनों से दूर रहने का मौका मिल जाता था।

ट्यूशन से मिलने वाले थोड़े-से पैसों से वह अपनी छोटी-छोटी जरूरतें पूरी कर लेती।

कमाई बहुत कम थी, लेकिन उन पैसों में उसे एक चीज मिलती थी—

अपने ऊपर थोड़ा-सा अधिकार।

अब उसे अपनी छोटी-सी जरूरत के लिए किसी से पूछना नहीं पड़ता था।

एक दिन सुधा ने आखिरकार अपने परिवार के सामने साफ कह दिया—

“मुझे शादी नहीं करनी।”

इस बार वह चुप नहीं रही। उसने बहुत विरोध किया। उसने अपनी बात समझाने की कोशिश की, अपने डर के बारे में बताया और कहा कि वह अभी शादी के लिए तैयार नहीं है।

लेकिन इस बार भी उसकी एक नहीं चली।

घरवालों ने अपना फैसला सुना दिया था।

सुधा ने बहुत कोशिश की, बहुत समझाया, बहुत विरोध किया… लेकिन हर बार उसे यही महसूस हुआ कि उसकी इच्छा से ज्यादा महत्व परिवार के फैसले का है।

आखिरकार उसे समझ आ गया कि अब उसकी जिंदगी का अगला फैसला भी उसके हाथ में नहीं था।

उसे शादी करनी पड़ेगी।

उस रात सुधा बहुत देर तक जागती रही।

उसके सामने उसकी पूरी जिंदगी घूम रही थी—स्कूल की तस्वीरें, दोस्तों के साथ बिताए दिन, फैशन डिजाइनर बनने का सपना, पीएच.डी. करने की इच्छा… और फिर एक-एक करके उन सभी सपनों का उससे दूर होते जाना।

अब उसके पास सिर्फ एक सवाल था—

“क्या मेरी जिंदगी में कभी कोई ऐसा फैसला होगा, जो सच में मेरा होगा?”

सुधा की पूरी रात करवटें बदलते हुए बीत गई। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसके मन में न जाने कितने सवाल थे, लेकिन किसी सवाल का जवाब उसके पास नहीं था।

कुछ ही दिनों बाद सुधा के लिए एक लड़का देखा गया।

घरवालों ने रिश्ता तय कर दिया।

सुधा ने न तो उस लड़के की तस्वीर देखी, न उसके बारे में कुछ जानने की कोशिश की। उसने न हाँ कही, न ना।

क्योंकि अब उसके भीतर अपनी इच्छा जैसी कोई चीज बची ही नहीं थी।

जिस लड़की ने कभी अपने भविष्य के लिए बड़े-बड़े सपने देखे थे, वह अब अपने भविष्य के बारे में सोचती ही नहीं थी।

उसने अपने मन को समझा लिया था कि शायद जिंदगी ऐसी ही होती है—जो मिलता है, उसे स्वीकार कर लो और आगे बढ़ते रहो।

अब सुधा को कुछ पाना नहीं था।

उसे बस जिंदगी काटनी थी।

सुधा की शादी विनय से हो गई।

विनय एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। स्वभाव से वह शांत और सुलझा हुआ इंसान था। वह अपनी जिम्मेदारियों को समझता था और बात-बात पर किसी से उलझने वाला व्यक्ति नहीं था।

सुधा ने भी बिना किसी सवाल के इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया था। शायद इसलिए नहीं कि वह इस रिश्ते से खुश थी, बल्कि इसलिए कि अब उसके भीतर किसी फैसले के लिए लड़ने की इच्छा ही नहीं बची थी।

शादी की रस्में पूरी हुईं और सुधा अपने मायके से विदा होकर विनय के घर आ गई।

उसके साथ उसके कपड़े, कुछ सामान और पुरानी यादों से भरी वही फाइल भी थी।

जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हो चुका था।

लेकिन सुधा को नहीं पता था कि इस नए अध्याय में उसके लिए क्या लिखा है।

शादी के बाद धीरे-धीरे विनय और सुधा एक-दूसरे को समझने लगे। विनय सुधा के स्वभाव को समझने की कोशिश करता था। वह शांत रहती थी, कम बोलती थी और अपने बारे में शायद ही कभी कुछ बताती थी।

विनय को सुधा की यह खामोशी हमेशा खटकती थी। वह अक्सर सोचता कि आखिर सुधा के मन में क्या चलता रहता है।

एक दिन उसने बातों-बातों में पूछा—

“सुधा, तुम्हारे क्या सपने थे?”

सुधा कुछ पल चुप रही।

विनय ने फिर पूछा—

“तुम्हारी कोई हॉबी? तुम्हें क्या पसंद है? तुम्हारा फेवरेट एक्टर कौन है?”

सुधा ने बिना उसकी तरफ देखे बस इतना कहा—

“मुझे कुछ पसंद नहीं है।”

विनय उसकी बात सुनकर चुप हो गया।

लेकिन उसके मन में एक सवाल और गहरा हो गया—

“ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी इंसान को कुछ भी पसंद न हो?”

उसे नहीं पता था कि सुधा को कभी बहुत कुछ पसंद था।

बस, उसने इतने सालों में अपनी पसंद करना ही छोड़ दिया था।

विनय ने सुधा को समझने की बहुत कोशिश की। वह चाहता था कि सुधा उसके साथ अपने मन की बातें साझा करे, अपने पुराने दिनों के बारे में बताए, अपने सपनों और अपनी पसंद के बारे में बात करे। लेकिन सुधा हर बार बात को टाल देती।

एक दिन विनय ने फिर उससे पूछा—

“सुधा, बताओ तो सही… तुम्हारी जिंदगी में पहले क्या था? तुम्हारे सपने क्या थे? तुम्हें क्या पसंद था?”

सुधा कुछ देर शांत रही। फिर उसने विनय की ओर देखा और धीमी आवाज में कहा—

“मेरी जिंदगी के पिछले पन्ने मत पलटो, विनय। मैं तुम्हें बस वही बताती हूँ, जो मैं बताना चाहती हूँ।”

विनय उसकी बात सुनकर चुप हो गया।

उसने पहली बार महसूस किया कि सुधा के अतीत में शायद कुछ ऐसा है, जिसे वह किसी के साथ बाँटना नहीं चाहती।

उसने आगे कोई सवाल नहीं किया।

लेकिन उसके मन में सुधा को लेकर जिज्ञासा और बढ़ गई थी।

देखते-देखते शादी के तीन साल बीत गए। इस बीच सुधा और विनय की जिंदगी में एक नन्ही-सी बेटी आई। उन्होंने उसका नाम रूही रखा।

रूही के आने के बाद सुधा के चेहरे पर फिर से थोड़ी मुस्कान लौटने लगी थी। उसकी छोटी-छोटी शरारतें और मासूम बातें सुधा के दिन को खुशियों से भर देती थीं।

सुधा अपना अतीत भूली नहीं थी, बस उसने उसे कुछ समय के लिए अपने मन के किसी कोने में दबा दिया था।

अब उसकी दुनिया में विनय और रूही थे।

विनय भी सुधा की खामोशी को समझने लगा था। उसने अब उससे उसके अतीत के बारे में पूछने की जिद छोड़ दी थी। वह जानता था कि कुछ पन्ने ऐसे होते हैं, जिन्हें इंसान तभी खोलता है जब उसका मन तैयार हो।

तीनों अपनी छोटी-सी दुनिया में खुश थे।

सुधा को लगता था कि शायद अब उसकी जिंदगी इसी तरह चलती रहेगी।

उसे क्या पता था कि कुछ साल बाद एक पुरानी फाइल उसके सामने फिर से उसके उन पन्नों को खोलने वाली थी, जिन्हें वह सालों पहले बंद कर चुकी थी।

रूही धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। उसकी मासूम बातें और छोटी-छोटी शरारतें घर में हमेशा रौनक बनाए रखती थीं।

कुछ समय बाद सुधा ने एक बेटे को जन्म दिया। बेटे के आने से विनय और सुधा की खुशियाँ और बढ़ गईं।

विनय ने अपने बेटे को गोद में लेते हुए सुधा की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा—

“अब हमारा परिवार पूरा हो गया।”

सुधा भी मुस्कुरा दी।

उस पल उसके पास किसी चीज की कमी नहीं थी। एक पति, एक बेटी, एक बेटा और अपना छोटा-सा परिवार।

विनय और सुधा दोनों अपने बच्चों के साथ बहुत खुश थे।

सुधा ने अपने पुराने सपनों को कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया था और अब उसकी दुनिया उसके बच्चों के इर्द-गिर्द सिमट गई थी।

उसे लगता था कि शायद यही उसकी जिंदगी है… और अब उसे इसी में खुश रहना सीखना है।

बेटे का नाम उन्होंने अद्विक रखा।

विनय ने नाम सुनते ही मुस्कुराकर सुधा से कहा—

“इतने अच्छे-अच्छे नाम कहाँ से ले आती हो, सुधा?”

सुधा हल्के से हँस दी।

फिर उसकी नजर रूही और अद्विक पर गई। दोनों को देखते हुए उसके चेहरे पर एक अलग ही सुकून था।

उसने अपने दोनों बच्चों को देखा और मन ही मन सोचा—

“शायद मेरी जिंदगी के जो सपने पूरे नहीं हो पाए, उनकी सारी खुशियाँ अब इन दोनों में बस गई हैं।”

उसने अद्विक को प्यार से अपनी गोद में लिया और रूही को अपने पास बुला लिया।

उस पल सुधा को लगा कि उसकी दुनिया भले ही उसके सपनों जैसी नहीं बनी, लेकिन इन दोनों बच्चों ने उसकी जिंदगी में एक नई वजह जरूर भर दी थी।

फिर सुधा और विनय दोनों बच्चों की परवरिश में व्यस्त हो गए। रूही और अद्विक उनकी दुनिया का केंद्र बन चुके थे। उनकी छोटी-छोटी खुशियाँ ही अब सुधा की सबसे बड़ी खुशी थीं।

लेकिन सुधा के मन के किसी कोने में एक डर अब भी जिंदा था।

वह अक्सर अपने बच्चों को खेलते हुए देखती और सोचती—

“जो मेरे साथ हुआ, अगर कभी इनके साथ भी ऐसा हुआ तो?”

उसे डर था कि कहीं बड़े होकर रूही और अद्विक भी अपने सपनों को दूसरों की इच्छाओं के नीचे दबाने के लिए मजबूर न हो जाएँ।

वह नहीं चाहती थी कि उसके बच्चों को कभी यह महसूस हो कि उनके सपने किसी और के फैसले से छोटे हैं।

इसलिए सुधा ने मन ही मन एक फैसला कर लिया था—

“मैं अपने बच्चों को कभी अपने अधूरे सपनों का बोझ नहीं दूँगी। उन्हें वही करने दूँगी, जो उनका मन कहेगा।”

शायद वह अपने लिए नहीं लड़ पाई थी, लेकिन अब वह अपने बच्चों के सपनों के लिए लड़ना चाहती थी।

उसी दिन न जाने क्यों सुधा के मन में अलमारी साफ करने का ख्याल आया।

रूही और अद्विक को स्कूल भेजने के बाद वह घर के काम निपटाकर अलमारी के सामने जा खड़ी हुई। उसने धीरे-धीरे अलमारी खोली और सामान को एक तरफ करने लगी।

तभी उसकी नजर एक पुरानी-सी फाइल पर पड़ी।

सुधा के हाथ वहीं रुक गए।

वह कुछ पल उस फाइल को देखती रही। जैसे उसे पहचानने में उसे थोड़ा वक्त लग रहा हो।

फिर उसने फाइल बाहर निकाली।

उस पर जमी धूल को अपने हाथ से साफ किया।

और जैसे ही उसने उसे खोला—

उसके सामने उसकी पूरी जिंदगी के पुराने पन्ने खुलने लगे।

विनय की आवाज सुनते ही सुधा जैसे अपने पुराने खयालों से अचानक बाहर आ गई।

“सुधा…”

वह कुछ पल के लिए बिल्कुल स्थिर खड़ी रही। उसकी आँखों में आँसू थे और हाथ अब भी उसी पुरानी फाइल पर था।

उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछने की कोशिश की, लेकिन इस बार भावनाएँ उससे छिप नहीं सकीं।

उसके मन में बस एक ही सवाल घूम रहा था—

“क्या नसीब था मेरा?

कभी कुछ भी तो मेरे मन का नहीं हुआ…”

तभी विनय ने उसे रोते हुए देख लिया।

वह उसके पास आया और चिंता से पूछा—

“सुधा, तुम रो क्यों रही हो? क्या चल रहा है तुम्हारे मन में?”

सुधा ने विनय की ओर देखा।

कई सालों से बंद पड़े शब्द जैसे आज उसके होंठों तक आकर रुक गए थे।

उसके सामने उसकी पूरी जिंदगी थी…

और हाथ में थी—

वही पुरानी फाइल।

सुधा ने अपनी आँखों से आँसू पोंछे। कुछ पल तक वह उस पुरानी फाइल को देखती रही। फिर विनय की ओर देखा।

विनय ने धीरे से पूछा,

“सुधा, क्यों रो रही हो? क्या चल रहा है तुम्हारे मन में?”

सुधा कुछ नहीं बोली।

उसने बस फाइल को अपने सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

विनय ने फिर पूछा,

“सुधा… कुछ तो कहो।”

सुधा ने सिर झुका लिया।

कुछ पल की खामोशी के बाद उसके होंठों से बस एक शब्द निकला—

“मलाल…”

विनय उसे देखता रह गया।

और सुधा अपनी पुरानी फाइल के पन्नों में कहीं बहुत पीछे छूट चुकी उस लड़की को देखती रही… जो कभी अपने सपनों के लिए जीना चाहती थी।

स्कूल से बच्चे लौट आए। सुधा ने जैसे ही रूही और अद्विक को देखा, उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

दोनों को अपने पास बुलाकर उसने प्यार से देखा और कहा—

“तुम दोनों अपने सारे सपने पूरे करना। मैं तुम्हें कभी किसी सपने से दूर नहीं करूँगी।”

वह कुछ पल चुप रही। फिर दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली—

“बस इतना याद रखना… जिंदगी में जो करना चाहो, उसे पूरी शिद्दत से करना, ताकि एक दिन तुम्हें पीछे मुड़कर अपनी जिंदगी को देखकर किसी बात का मलाल न रहे।”

सुधा की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उन आँसुओं में सिर्फ दर्द नहीं था।

शायद उनमें एक सुकून भी था।

क्योंकि वह अपनी जिंदगी को तो नहीं बदल सकती थी…

लेकिन वह अपने बच्चों की जिंदगी में अपने अधूरे सपनों जैसा कोई मलाल नहीं आने देना चाहती थी।

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